नशा पिला के गिराना तो सब को आता है....


(1)
सदियों   की   दिल  की धड़कन है उनकी जागती आंखों में
ये जो फलक*  पर हंसमुख, चंचल  जगमग-जगमग तारे हैं
एक  जरा सी भूल  पे  हम  को  इतना  तो  बदनाम न कर
हम  ने  अपने    घाव   छूपा   कर  तेरे    काज   संवारे  हैं
कुछ  बातें,  कुछ  रातें,  कुछ   बरसातें,  अपना  सरमाया*
माजी*    के    अंधियारे   में   ये    जलते   दीप  हमारे  हैं
एक  जहां*  की  खोज में  अपने प्यार की नगरी छोड़ आए
और   जमाना  ये  समझा,  हम  प्यार  की  बाजी  हारे  हैं।
*आकाश * पूंजी *अतीत *संसार 
-’जमील’ साहब

(2)
अदा   आई,   जफा   आई,   गरूर  आया,  हिजाब आया
हजारों    आफतें    लेकर   हसीनों     का   शबाब  आया
बे-गम   किस   तरह  गुजरी, बे-गम  इस तरह गुजरी
न तुम आये, न चैन आया, न मौत आई, न ख्वाब आया।
-’नूह’ नारबी 

(3)  
वो आलम* है कि मुंह फेरे हुए आलम* निकलता है
शबे-फुर्कत* के  गम झेले हुयों का दम निकलता है
इलाही खैर हो, उलझन पे उलझन  बढ़ती जाती है
न मेरा दम, न उनके गेसुओं* का खम निकलता है
कयामत  ही  न हो जाए, जो  पर्दे से निकल आओ
तुम्हारे  मुंह  छुपाने  में तो ये आलम निकलता है।
*स्थिती *संसार *जुदाई की रात *केशों के पेच
-सफी लखनवी

(4)
कुछ  पहले-पहले   आज   न   दुनिया   छली  गयी
सुमनों  के   मुख   पर  सदा  धूल   ही   मली  गयी
बांहे फैलाकर पुलिनों ने, सरिता  से मांगा आलिंगन
प्रिय  आज  नहीं, वह  कल-कल  कहती चली गयी।
-शिवमंगल सिंह सुमन

(5)
हर  लम्हा  जैसे  भोर  का  टूटा  हुआ   सपन
हर  सांस  जैसे  फांस  की रह-रह  उठे  चुभन
इस जिन्दगी को दोस्त  कुछ ऐसे जिया हूं  मैं
जैसे  धुएं  की  बांह  में  सहमी  हुई   किरन।
-रामानन्द दोषी 

(6)
नशा  पिला  के  गिराना तो सब  को  आता  है
मजा तो  जब है कि गिरतों  को थाम ले साकी
जो  बादाक  थे   पुराने   वो   उठते  जाते  हैं
कही    से   आबे-बका-ए-दवाम*    ले    साकी
कटी  है  रात  तो   हंगामा-गुस्तरी*  में   तेरी
सहर  करीब  है  अल्ला  का   नाम ले  साकी। 
 *बिझौने के हंगामे *अमृत *सुबह
-इकबाल साहब

(7)
तू आतिशे-दोजख का   खतावार कि मैं
तू  सबसे   बड़ा  मुनिहदो-एय्यार कि मैं
  अल्लाह  को भी  बता  दिया हूरो-फरोश 
ऐ शेख!  बता  तू  है  गुनहगार  कि  मैं
-अर्श मल्सियानी
संकलन-संजय कुमार गर्ग

वास्तुशास्त्र से धन संबंधी समस्याओं को सुलझायें!

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Vastu and Money
धन वो धुरी है जिसके चारों ओर सारा संसार गति करता है, बिना धन के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। अर्थशास्त्र ने जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताऐं रोटी-कपड़ा और मकान बतायी हैं, इनकी प्राप्ति भी बिना धन के संभव नहीं है, हम कह सकते हैं अर्थ किसी भी व्यक्ति या देश का अर्थशास्त्र थोड़े ही समय में बना या बिगाड़ सकता है। प्रबुद्ध पाठकजनों!! इस संसार में दो प्रकार के व्यक्ति बहुधा पाये जाते हैं एक वे जिनके पास धन की कमी नहीं है, वे धन को संभालने के लिये चिंतित रहते हैं, दूसरे प्रकार के वे व्यक्ति होते हैं जिनके पास जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भी पर्याप्त धन नहीं है, मेरा आलेख उन व्यक्तियों के लिये है जिनके पास पर्याप्त मात्रा में धन नहीं है और वे धन प्राप्ति के लिये प्रयासरत हैं। इस निर्धन वर्ग में भी दो प्रकार के व्यक्ति हैं एक वे जो कर्महीन, भाग्यवादी और मेहनत से जी चुराने वाले हैं, वे चाहते हैं कि मुझे बिना प्रयास के केवल टोने-टोटके द्वारा धन प्राप्त हो जाये और हम धनी हो जाये, दूसरा वर्ग उन व्यक्तियों का है जो मेहनती, लग्नशील और पुरूषार्थी होने के बाद भी धन की कमी से जुंझ रहा हैं और किसी कारण वश मां लक्ष्मी उनसे रूष्ट हैं, मेरा आलेख केवल और केवल इन्हीं पुरूषार्थी और कर्मठ व्यक्तियों के लिये समर्पित है। मैं इस आलेख में यह बताने का प्रयास करूंगा कि आपके धन की कमी से जुंझने के ये कारण तो नहीं हैं? यदि हैं! तो इन कारणों को कैसे दूर किया जाये-

* वास्तु के अनुसार उत्तर दिशा (north) धन (money) की दिशा है इसके स्वामी कुबेर हैं, यह दिशा धन के साथ-साथ उस घर की स्त्रियों  का भी प्रतिनिधित्व करती है, कदाचित् इसलिये धन की देवी नारी, लक्ष्मी हैं कोई पुरूष देव नहीं है।

* धन के आगमन के लिये आवश्यक हैं कि किसी भी घर मेें उत्तर (north) दिशा की ओर पर्याप्त स्थान खाली हो, उस ओर कमरों की खिड़कियां हो साथ ही उत्तर दिशा की दिवारें दक्षिण (south) दिशा की दीवारों से नीची हों, इससे घर में धन का आवागमन होता है और उस घर की स्त्रियां भी स्वस्थ व चरित्रवान होती हैं।

लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
* घर के पानी की निकासी उत्तर से होकर ईशान (NE) दिशा की ओर जाये तो यह धन के आवागमन के लिये अत्यंत शुभ स्थिती होती है।

* उत्तराभिमुखी (north faced) घर में धन का आवागमन बहुत तीव्र गति से होता है।

* किसी घर के उत्तर दिशा में ऊंचा मकान हो या पड़ोसी ने मकान अपने मकान से ऊंचा बना लिया हो तो ऐसे घर में धन का आवागमन धीरे-धीरे अवरूद्ध हो जाता है। इसके उपाय के लिये किसी वास्तुविद् से मकान के नक्शे के साथ सम्पर्क करना चाहिये।

* यदि ईशान दिशा आगे बढ़ी हुई है तो यह धन के आवागमन आदि के लिये अत्यंत अच्छी स्थिती है।

* ईशान दिशा के समीप जल, तालाब, कुंआ, नहर आदि हो तो यह धन सम्पत्ति दायक है।

* यदि किसी घन के ईशान कोण में रसोई घर है तो यह स्थिती निश्चित ही आर्थिक हानि करेगी।

* यदि दक्षिणी मुखी भूखण्ड में दक्षिण की ओर अत्यधिक खाली जगह हो तो यह स्थिती धन की हानि करायेगी।
लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
यदि ईशान दिशा अन्य सभी दिशाओं से निम्न है तो अत्यन्त हितकारी है। यह सभी प्रकार की सुख संपदा देती है। यदि इसके विपरित ईशान को अन्य सभी दिशाओं से ऊंचा कर दिया जाये तो सुख संपदा के धीरे-धीरे समाप्त होने की पूरी संभावना है। 

* धन रखने की सेफ या तिजोरी को दक्षिण दिशा में रखें परन्तु उसकी अलमारियां हमेशा उत्तर की ओर खुलनी चाहिये।

* यदि घर में आपकी कोई टंकी लीक कर रही है अर्थात उससे पानी टपकता रहता है तो इसे फोरन ठीक करा दे, ये भी आर्थिक नुकसान दे सकती हैं।


युद्धिष्ठर के एक प्रश्न के उत्तर में श्री कृष्ण ने दरिद्रता रोकने के उपाय बताये हैं-वे बताते हैं कि जिस घर में गाय के घी का दीपक जलाया जाता है व उसके घी का ही भोग प्रसाद चढ़ाया जाता है उस घर में दरिद्रता नहीं रहती, घर में आये मेहमान को सबसे पहले पानी देने से भी अशुभ ग्रहों के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।

 पुराणों  में शहद को बहुत महत्व दिया गया है, यदि शहद को घर में रखा जाये तो उससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है। उसी प्रकार चंदन का तिलक लगाने व घर में चन्दन रखने से भी व्यक्ति के पापों का नाश होता है, तथा उसकी सुगन्ध नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर देती है।

* घर में कबाड़ या रददी ज्यादा समय तक इकटठा न करके रखे, इसे जल्दी-जल्दी घर से बाहर करते रहे, वास्तु में कबाड़ व रददी समान आर्थिक विपन्नता का बहुत बड़ा कारण माना जाता है।

* सायं को दिन छिपते ही घर के पूजा घर व तुलसी जी के पेड़ के नीचे दीया अवश्य जलाना चाहिये, यदि घर के पूजा घर में थोड़ी देर पूजा की जा सके तो ओर अच्छा है।

* पक्षियों के लिये अपनी छत पर नियमित रूप से दाना-पानी का प्रबन्ध करें, व्यापार में यदि लगातार घाटा हो रहा है तो उसके निदान का यह प्रसिद्ध उपाय है।

लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
* झाडू जिससे हम घर की सफाई करते हैं उसे दिन में सफाई करने के बाद छूपा कर रख देना चाहिये, और रात्रि में उसे खुले स्थान या घर के मुख्य चौक में रख देना चाहिये।

* आफिस  से,  दुकान से या अपने काम से घर लौटते समय घर में कुछ ना कुछ लेकर आना चाहिये, चाहे तो उस दिन का अखबार ही क्यों ना हो।

* काम से घर लौटते समय अपनी पत्नि को कुछ रूपये दस, बीस या कम-ज्यादा नियमित रूप से चालीस दिन तक रोज दे, धन के आवागमन का यह भी एक अच्छा उपाय है

[पाठकगण! यदि उपरोक्त विषय पर कुछ पूछना चाहें तो कमेंटस कर सकते हैं, या मुझे मेल कर सकते हैं! वास्तु के लिये प्रोफेसनल सेवायें भी उपलब्ध हैं, इसकी जानकारी आप मुझे मेल करके प्राप्त कर सकते हैं।  -लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com]

प्यास वो दिल की बुझाने कभी.....मुक्तक और रुबाइयाँ !


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प्यास वो दिल की बुझाने कभी.....
(1)
गैर क्या  जानिये  क्यों  मुझको  बुरा  कहते हैं
आप   कहते  हैं  जो  ऐसा  तो  बजा  कहते  हैं
वाकई   तेरे   इस  अन्दाज  को  क्या  कहते हैं
ना  वफा  कहते हैं  जिसको  ना जफा  कहते हैं
हो जिन्हे शक, वो करें और खुदाओं  की तलाश
हम  तो  इन्सान को दुनिया का खुदा कहते हैं।
-फिराक गोरखपुरी
(2)
हंगामा है क्यों  बरपा,  थोड़ी  सी  जो पी ली है
डाका  तो  नहीं   डाला,  चोरी  तो  नहीं  की  है
ना-तजुर्बाकारी  से   वाइज*  की  ये   बाते   हैं
इस  रंग  को  क्या  जाने,  पूछो तो कभी पी है
हर  जर्रा  चमकता  है,   अनवर-ए-इलाही*  से
हर सांस ये कहती है, कि हम हैं तो खुदा भी है।
*धर्मगुरू *देवीय प्रकाश 
-अकबर इलाहाबादी
(3)
प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया ही भी नहीं
कैसा  बादल  है  जिसका   कोई   साया  भी नहीं
बेरूखी  इससे   बड़ी   और   भला    क्या   होगी
एक  मुददत  से  हमें  उसने   सताया   भी  नहीें
रोज  आता  है  दर-ए-दिल  पे   वो   दस्तक  देने
आज  तक  हमने   जिसे  पास  बुलाया  भी  नहीं
सुन  लिया   कैसे   खुदा  जाने   जमाने   भर  ने
वो  फंसाना  जो  कभी   हमने  सुनाया  भी नहीं।
-कतील शिफाई
(4)
दूर  से  दूर  तलक   एक   भी  दरख्त  न  था
तुम्हारे घर का  सफर  इस  कदर सख्त  न था
इतने  मसरूफ  थे  हम  जाने  की  तैयारी  में,
खड़े  थे  तुम  और  तुम्हें  देखने का वक्त न था
उन्ही  फकीरों  ने   इतिहास   बनाया  है   यहां,
जिन पे इतिहास को लिखने के लिये वक्त न था
शराब  कर  के  पिया  उसने  जहर  जीवन भर,
हमारे शहर  में "नीरज" सा  कोई मस्त न था।
-गोपाल दास नीरज
(5)
दो  चार  बार  हम जो कभी हँस-हँसा   लिए
सारे  जहाँ  ने  हाथ  में  पत्थर   उठा   लिए,
रहते   हमारे   पास   तो    ये   टूटते    जरूर
अच्छा  किया  जो  आपने  सपने  चुरा लिए,
जब  हो  सकी  न बात तो हमने  यही  किया
अपनी  गजल  के  शेर  कहीं  गुनगुना  लिए,
अब  भी  किसी  दराज  में मिल जाएँगे तुम्हें
वो खत जो तुम्हें दे न सके लिख लिखा लिए।
- कुँअर बेचैन
संकलन-संजय कुमार गर्ग

एक 'लुटेरी' रात !! (रोमांच-कथा)

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एक 'लुटेरी' रात !! (रोमांच-कथा)

रात काफी हो गयी थी, सौरभ के शहर को जाने वाली बसें बन्द हो गयी थी, रोडवेज अड्डे पर लम्बे-मार्ग (लांग रूट) की एकमात्र बस थी, सौरभ चालक-परिचालक से काफी निवेदन करके उस बस में बैठ पाया था, वो भी इस शर्त पर कि बाई-पास पर ही उतार दिया जायेगा। सौरभ टिकट लेकर सीट पर जा बैठा और अपना बैग नीचे रख दिया। वह पूस की एक सर्द रात थी। कुछ ही देर में गाड़ी रवाना हो गयी। दिन भर की भागदौड़ से थके सौरभ की आंखे लग गई। 
अचानक सौरभ को किसी ने तेजी से झिझोड़ा। वह एकदम चैंक कर उठा, ‘‘क्या मेरा शहर आ गया? (सौरभ ने सोचा कि परिचालक ने उसे शहर आने पर उठाया है) पर तुम बोल कैसेऽऽऽऽऽऽ‘‘ उसके शब्द गले में ही अटक कर रह गये, उसने देखा कि एक आदमी उसके सिर पर तमंचा लिये खड़ा था। ‘‘निकाल तेरे पास क्या है ?‘ सौरभ ने उसे अपनी जेब से पैसे निकाल कर दे दिये, सौरभ की घड़ी भी उसने ले ली।
कुल मिलाकर वो 5 लुटेरे थे। सबके मुंह पर कपड़े बन्धे थे उनमें से एक ड्राइवर के पास पिस्तौल लिए खड़ा था। बाकि सब यात्रियों से रूपये, पैसे, कीमती सामान छीनकर एक गन्दे से थैले में भरते जा रहे थे। जो भी आनाकानी करता उस पर फौरन हमला कर देते, एक आदमी ने हिम्मत दिखाई तो उस पर भी हमला करके उसे घायल कर दिया। कुल मिलाकर बस का वातावरण भयावह हो गया था। बस के बाहर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था, ऐसा लगता था कि बस किसी जंगल में खड़ी थी। सौरभ को भरी सर्दी में पसीना आने लगा।
सुरक्षा की दृष्टि से सौरभ ने अपना मोबाइल पहले ही बैग में रख दिया था, चूंकि उसमें किताबें इत्यादि ज्यादा थी, इसलिए फोन पर उनकी निगाह नहीं पड़ी थी। 
अचानक सौरभ के फोन की घंटी बज उठी, जो पूरी बस में गूंज गयी, एक बदमाश उसकी ओर बढ़ा, और उसके बैग से फोन निकाल लिया, सौरभ ने उसके हाथ से फोन ले लिया, और उस लुटेरे से कहा- मुझे इसमें से सिम निकाल लेने दो, परन्तु वो उसे समय देने के लिए तैयार नहीं था, उसने तमंचा सौरभ के सिर पर दे मारा।
इस छिना-झपटी में एक ओर बदमाश उसकी तरफ बड़ा, सौरभ ने मोबाइल हाथ से छोड़ दिया,
दूसरा बदमाश अचानक बोला ‘‘गुरूजीन (गुरू जी का) फोन उल्टा दे दे, -तिल्ली।‘‘
पहले बदमाश ने उसे घूरते हुए सौरभ को मोबाइल वापस दे दिया-सौरभ आश्चर्यचकित था।
दरअसल सौरभ एक विद्यालय में शिक्षक था जिसमें आसपास के गांवों के काफी बच्चे पड़ते थे और वह विद्यालय उसी क्षेत्र के आसपास था जहां से होकर उस बस को जाना था।
अपने सूजे हुये सिर पर हाथ रखे, सौरभ फोन लेकर सीट पर बैठ गया, अचानक उसके मस्तिष्क में कुछ कौंधा और वह सीट से उछल कर खड़ा हो गया। सौरभ ने उनसे कहा भाई! मेरा फोन भी ले जाओ, तुम पता नहीं कौन हो जो मुझे ‘गुरू जी‘ कह रहे हो, मैं तुम्हे नहीं जानता? यदि आप को वापस ही करना है तो सबका सामान वापस करो, नहीं तो आप मेरा फोन भी ले जाओ, यदि आपने ऐसा नहीं किया तोे सब यात्री मुझे आपका साथी समझेगेें, और मेरी खैर नही। सौरभ एक सांस में घबराता हुआ बोलता चला गया।
‘‘यदि आाप नहीं माने तो मैं भी आपके साथ इसी जंगल में उतर जाऊंगा, यात्रियों और पुलिस से पीटने से तो यही बेहतर है।‘‘ सौरभ ने घबराहट से आ रहे पसीने पौंछते हुये उनसे कहा।
डकैतों ने कुछ देर आपस में बातें की, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे, अचानक उनमें झगड़ा प्रारम्भ हो गया और आपस में पिस्तौले तन गयी, सभी यात्री घबरा गये, तभी उनमें से एक ने जो उनका ‘‘सरदार‘‘ लगता था उनका बीच-बचाव करवाया, उन्हे शान्त किया और सौरभ से बोला-
‘‘मास्दर जी तमने म्हारे गरोह में फूट डाल दी है, म्हारे दो आदमी चाहै हैं कि समान उल्टा दे दे और दो मना करें हैं, अब या समान देना ह या लेना, या मेरे ऊपर ह। या के लये तमे मेरे एक प्रसन का जवाब देना पडेगा, का तम राजी हो।‘‘
भाई साहब! तुम ‘‘यक्ष‘‘ हो सकते हो पर मैं ‘‘युद्धिष्ठर‘‘ नहीं हूंँ-सौरभ ने धीरे से कहा! 
परन्तु यदि आपके प्रश्न का उत्तर देने से यात्रियों का समान बच सकता है तो मैं आपके प्रश्नों का उत्तर देने के लिये तैयार हूंँ-सौरभ ने डरते-डरते धीरे से कहा!
सरदार, गब्बर सिंह की तरह जोर से हंसा और बोला-‘‘तम तो घबरारिये हो मास्दर जी‘‘ मैं तो उस मास्दर की समझ देखनीं चाहूं हूं जा ने म्हारे गरोह मा फूट डाली ह‘‘
‘‘ठीक है भाई साहब! पूछो‘‘ सौरभ की हिम्मत बढ़ सी गयी थी।
‘‘मास्दर जी! हम का बस या बता दो कि या गाड़ी का मुंह किस दिशा में कू है। कोनो मशीन का परयोग नहीं करना है।‘‘ 
यह कहते हुए उसने अपनी जेब से शराब की एक थैली निकाली और मुंह की तरफ से थोड़ा सा ‘ढ़ाटा‘ (चेहरे पर ढका कपड़ा) हटाया और थैली को आम की तरह चूस कर, गाड़ी के बोनट पर बैठ गया। 
सौरभ ने कहा ठीक है, खिड़की खोलो, मुझे आसमान की ओर देखने दो, मैं अभी बता देता हूंँ।
वा कैसे? सरदार बोला!
लेखक-संजय कुमार गर्ग (sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
सप्तऋषि मंडल (सात तारों का समूह) हमेशा उत्तर दिशा की ओर इंगित करता है। दूसरा इस समय आकाश में ‘शतभिषा नक्षत्र’ भी दिखाई दे रहा होगा वह भी उत्तर दिशा को दर्शाता है, उन्हे देख कर मैं आसानी से आपको दिशा बता सकता हूंँ!-सौरभ ने आत्मविश्वास से कहा।
रूको!!!!! सरदार बोला, ‘‘आसमान की माई देखके त कोई भी दिशा का, टेम भी बता सकता ह।‘‘
‘‘तम मुझ आसमान में देखे बगैर, आसपास देख के दिशा बताओ।‘‘ मैं भी देखन चाहूं तम मास्दर हो या ऐसे ही काम चलाउ सरकार! और तम टेम की चिन्ता न करियों जहां या गाड़ी खड़ी ह, वहा से 10-10 कोस ते कोई आबादी ना ह, बस जंगल ह-कहते हुये सरदार ने एक बीड़ी सुलगाई और बस के बोनट पर पलोथी लगा कर बैठ गया।
सौरभ ने थोड़ा सोचा, सभी यात्री उसकी ओर आशा की दृष्टि से देख रहे थे।
ठीक है! आप मुझे अपनी टार्च दीजिये और मुझे बाहर देखने दें-सौरभ ने हिम्मत करते हुये उनसे कहा।
सौरभ ने ड्राईवर को सीट से हटाकर उसकी खिड़की खोल दी, पके हुये अमरूदों की खुशबू गाड़ी में भर गयी वह एक अमरूद का बाग था, जहां गाड़ी खड़ी थी। सौरभ ने टार्च मारकर अमरूदों का निरीक्षण किया, वह कुछ आश्वस्त था, फिर उसने बाग के अन्दर टार्च मारी, शक्तिशाली टार्च की रोशनी से सारे बाग में प्रकाश फैल गया। सामने एक मजार थी, मजार का मिनट भर निरीक्षण कर सौरभ पूरी तरह आश्वस्त हो गया था, उसने खिड़की बन्द कर दी और सरदार से बोला-
भाई जी! गाड़ी का मुंह पश्चिम दिशा में है और पीठ पूर्व में!
सरदार का चेहरा खिल गया और बोला- 
अब या बताओ तम ने कैसे पता करा या तम तुक्का लगा रिये हो।
सौरभ ने बताया-सबसे पहले मैंने अमरूदों का निरीक्षण किया, फल सबसे पहले व सबसे ज्यादा पूर्व दिशा की ओर से पकता है, अतः अमरूद को देखकर मैं थोड़ा आश्वस्त था, परन्तु मजार को देखकर मैं पूरी तरह आश्वस्त हो गया क्योंकि मजार का सिर हमेशा उत्तर दिशा में और पैर दक्षिण दिशा में होते हैं।
मास्दर जी तम वास्तव में गुरू हो, हम अपनी लूट छोड़ते हैं और तमे सलाम करते हैं-सरदार ने खुश होकर कहा, फिर अपने साथियों को इशारा किया और वे लूट का माल बस में छोड़कर जंगल में गायब हो गये। 
सौरभ जल्दी-जल्दी ड्राइवर को बस का रास्ता समझाने लगा, यात्रियों ने उसे प्रसन्नता से गोदी में उठा लिया।
                        लेखक-संजय कुमार गर्ग (sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
(प्रस्तुत कहानी काल्पनिक घटनाक्रम पर आधारित है। पात्रों के नाम,स्थान आदि सभी काल्पनिक हैं।)

चाणक्य के अनुसार किन कार्यो में कभी संतोष न करें!

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चाणक्य नीति
"यथा राजा तथा प्रजा" की उक्ति आपने काफी सुनी होगी, इसी उक्ति पर चाणक्य लिखते हैं-"धर्मात्मा राजा की प्रजा भी धर्मात्मा होती है और पापी राजा की प्रजा भी पापी होती है। सब विद्वान लोग यही कहते हैं कि जैसा राजा वैसी प्रजा"।।07/13।।

चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने अच्छे बुरे कर्मो का फल भोगना ही पड़ता है-"जैसे हजारों गायों में भी वत्स अपनी माता के पास ही जाता है वैसे ही प्रारब्ध बन कर हमें खोज ही लेती है" ।।14/12।।

चाणक्य कहते हैं कि-"मनुष्य को अपनी स्त्री, भोजन और धन इन तीनों में संतोष करना चाहिये, अध्ययन, जप, और दान इन तीनों में कभी संतोष नहीें करना चाहिये"।।18/12।।

चाणक्य साधुजनों की प्रशंसा करते हुये लिखते हैं कि-"युग के अन्त में सुमेरू चल पड़ता है, कल्प के अन्त में सातों समुद्र भी मर्यादा को छोड़ देते हैं परन्तु साधुजन कभी भी विचलित नहीं होते"।।20/13।।

महात्मा चाणक्य शरीर की महिमा का वर्णन करते हुये कहते हैं कि-"स्वस्थ शरीर की महिमा बहुत बड़ी है, क्योंकि वह बार-बार नहीं मिलता। मित्र, स्त्री, धन और जायदाद चाहे तो कई हजार मिल सकते हैं"।। 3/14।।

चाणक्य कहते हैं कि निम्न कार्य थोड़ा करने पर भी बहुत फैल जाते हैं-"दुर्जन मनुष्य से एकांत में वार्ता, सुपात्र को दान देना, जल में तेल, और बुद्धिमान में शास्त्र ज्ञान, यदि थोड़ा भी हो तो भी वह अधिक फैल जाता है"।।5/14।।

चाणक्य कहते हैं कि निम्न ज्ञान स्थायी नहीं होता-"धर्म कथा के अन्त में और श्मशान में मनुष्य को जो ज्ञान होता है यदि वह सदा बना रहे तो कौन संसार के बन्धनों में बंधा रह सकता है अर्थात सब मुक्त हो जाये, अर्थात ये ज्ञान स्थायी नहीं होता"।।5/14।।

चाणक्य मनुष्य की मानसिक स्थिति का सुन्दर वर्णन करते हुये कहते हैं-जोे जिसके मन में समाया हुआ है वह दूर रहते भी दूर नहीं रहता और जो जिसके मन में नहीं बसता वह अति निकट रहता हुआ भी दूर ही रहता है"।। 9/14।।

कौटिल्य अपनी कुटिल नीति पर श्लोक लिखते हुये कहते हैं कि जिसका अप्रिय करना हो उसके साथ कैसा व्यवहार करें-"जिसका अप्रिय करने की इच्छा हो उससे सदा प्रिय वचन बोलना चाहिये। शिकारी मृग का शिकार करने के लिये प्रिय गीत गाकर ही उसका शिकार करता है"।।10/14।।

निम्न के अधिक निकट न अधिक दूर जाने की सलाह चाणक्य देते हैं-"आग, स्त्री, राजा और गुरू, इनसे दूर रहने पर ये कुछ फल नहीं देते और बहुत समीप आने पर ये नाश कर देेते हैं, अतः इनसे न निकट ही रहना चाहिये और न अधिक दूर ही जाना चाहिये"।।11/14।।

निम्न से सदा सावधान रहने की सलाह महात्मा चाणक्य देते हैं-"आग, पानी, स्त्री, मूर्ख, सांप और राजा इन छहों का सदा ध्यान रखना चाहिये, अर्थात इनसे सदा सावधान रहना चाहिये, क्योंकि ये सेवा करते-करते ही उल्टे फिर जाते हैं, अर्थात प्रतिकूल होकर प्राण हर लेते हैं"।।12/14।।
(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)
                       -संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)