चन्द्र ग्रह का वास्तु-ज्योतिषीय-हस्तरेखीय वर्णन

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चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है, पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी 3,84,000 किमी है। चन्द्रमा का गुरूत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण का 1/6 है। यानि ऐसी वस्तु जिसे पृथ्वी पर उठाना भी कठिन है, वहीं वस्तु चन्द्रमा पर एक गेंद की भांति हवा में उछाली जा सकती है। यह स्वयं प्रकाशित नहीं होते वरन् सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। चन्द्रमा प्रतिदिन पिछले दिन की अपेक्षा 53 मिनट देरी से उदय होते हैं। चन्द्रमा की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही पृथ्वी पर ज्वार-भाटा आते है। चन्द्रमा के उदय होने में प्रतिदिन 53 मिनट का अंतर होता है अतः ज्वार-भांटा भी एक स्थान पर पिछले दिन की अपेक्षा 53 मिनट देरी से आता है। माना किसी स्थान पर समुद्र में दोपहर 12 बजे ज्वार-भाटा आया है तो कल यानि अगले दिन ज्वार-भाटा 12 बजकर 53 मिनट पर आयेगा। इसी प्रकार आने वाले दिनों में इसका समय बढ़ता चला जायेगा। चन्द्रमा का आकार पृथ्वी के आकार का एक चौथाई है। सूर्य के बाद यह सबसे ज्यादा चमकदार ग्रह हैं। यह पृथ्वी की परिक्रमा 27 दिन 6 घंटे में पूरी करता है। इनकी औसत गति एक मिनट में एक अंश होती है।

चन्द्र का पौराणिक विवरण-

श्रीमद्भागवत के अनुसार चन्द्रदेव महर्षि अत्रि और अनसूया के पुत्र हैं। इनको सर्वमय कहा गया है। ये सोलह कलाओं से युक्त हैं। भगवान कृष्ण ने इन्हीं के वंश में अवतार लिया था। इसलिए भगवान श्री कृष्ण चन्द्र की सोलह कलाओं से युक्त थे। चन्द्रदेव का रंग गौर है। इनके वस्त्र, अश्व और रथ तीनों श्वेत रंग के हैं, ये सुन्दर रथ पर एक कमल के आसन पर बैठे हैं। इन्होंने सुन्दर सोने का मुकुट धारण किया हुआ है व गले में सोने की माला है। इनके हाथ में गदा तथा दूसरे हाथ से प्राणिमात्र को आशिर्वाद दे रहे हैं।

पौराणिक कथा-

हरिवंश पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने चन्द्र देव को बीज, औषधि, जल और ब्राह्मणों का राजा बनाया। इनका विवाह महाराज दक्ष की 27 पुत्रियों से हुआ था। ये 27 नक्षत्रों अश्विनी, भरणी, कृतिका आदि के रूप में जानी जाती हैं। इनके पुत्र का नाम बुध है जो तारा से उत्पन्न हुए हैं। ये 27 दिन में 27 नक्षत्रों पर भ्रमण करते हैं। पुराणों के अनुसार चन्द्रदेव का रथ वाहन है इस रथ में तीन चक्र हैं। इस रथ में दस घोड़े जुते रहते हैं, इन घोड़ों के नेत्र, कान श्वेत होने के साथ-साथ, इन घोड़ों का वर्ण भी श्वेत है।

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चन्द्र का वास्तु के अनुसार विवरण-

चन्द्र देव वास्तु में वायव्य दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह दिशा कालपुरूष के घुटने एवं हाथों की कोहिनी का प्रतिनिधित्व करती है। यदि जन्मकुण्डली के हिसाब से देखें तो पांचवा व छठा भाव वायव्य कोण का प्रतीक माना जाता है। पश्चिम-उत्तर दिशा के मध्य स्थापित यह दिशा वायव्य व्यवहारों के परिवर्तन में मित्र व शत्रुओं का कारण बन जाती है। अर्थात यह दिशा हमारे जीवन में शत्रुओं व मित्रों का प्रतिनिधित्व करती है। इस दिशा का प्रभाव घर की महिला सदस्यों के साथ-साथ तीसरी संतान पर भी पड़ता है। मुकदमें में हार-जीत पर भी यह दिशा प्रभाव डालती है। यह दिशा जहां अतुलित धन-सम्पत्ति का स्वामी बना सकती हैं वहीं दिवाला भी निकाल सकती है। वायव्य दिशा निवासी को साधु-सन्यासी, दार्शनिक तक बना सकती है।


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चन्द्रमा का ज्योतिषीय विवरण-

नवग्रहों में चन्द्र को रानी की उपाधि दी गयी है। चन्द्रमा को फारसी में महताब और अंगेजी में मून और हिन्दी में शशि, राकेश, हिमांशु, सारंग आदि नामों से भी जाना जाता है। यह वायव्य दिशा के स्वामी हैं, स्त्री रूप हैं और सौम्य ग्रह माने जाते हैं। ये जन्मकुण्डली में जिस भाव पर बैठते हैं वहां से सातवें भाव पर पूर्ण दृष्टि रखते हैं। ये सूर्य, बुध को अपना मित्र तथा राहु को अपना शत्रु मानते हैं। मंगल, गुरू, शुक्र व शनि से समभाव रखते हैं। कर्क इनकी स्वराशि है। ये वृष राशि में उच्च के तथा वृश्चिक राशि में नीच के होते हैं। चन्द्र द्विस्वभाव के ग्रह हैं यानि अकेले ही पाप और शुभ दोनों फलदायी बन जाते हैं। ये वैश्य जाति के माने जाते हैं और अपरान्ह में बलि होते हैं। रिश्तों में ये माता का प्रतिनिधित्व करते हैं। राजपाठ में ये रानी के पद को सुशोभित करते हैं। चन्द्रमा जल तत्व के ग्रह हैं। कुण्डली में इनसे जल, कफ, पाण्डुता आदि बीमारियों के साथ-साथ मानसिक बीमारियों का भी अध्ययन किया जाता है। छोटी यात्रा व विदेश यात्रायों आदि का कारण भी चन्द्रमा ही होते हैं। शीघ्रगामी व पृथ्वी के सबसे निकट ग्रह होने के कारण गोचर में मानव शरीर पर इनका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। ये ‘‘चन्द्रमा मनसो जातः’’ मन के कारक ग्रह हैं यानि जातक के मन पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं तथा शरीर में मानव-रक्त-परिभ्रमण का इनसे विशेष संबंध है। चांदी इनकी प्रिय धातु है और ये मोती में निवास करते हैं। इसलिए मोती के लिए अंगूठी चांदी की ही बनायी जाती है। इनकी महादशा 10 वर्ष की होती है।

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हस्तरेखा में चन्द्र का स्थान-

हथेली में कन की उंगली यानि लिटिल फिंगर के सबसे नीचे, भाग्य रेखा के बायीं ओर तथा मणिबंध के ऊपर का क्षेत्र चन्द्र क्षेत्र या चन्द्र पर्वत कहलाता है। जिनके हाथ में चन्द्र पर्वत पूरी तरह उभरा हुआ होता है वे प्रकृति प्रेमी तथा सौन्दर्य प्रेमी होते हैं। ऐसे जातक वास्तविक जीवन से हटकर स्वप्नलोक में ही विचरण करते हैं। जिनके हाथों में इसका अभाव होता है वे व्यक्ति कठोर ह्दय तथा पूर्णतः भौतिकवादी होते हैं। चन्द्र रेखा धनुष के आकार की होती है, यह चन्द्र क्षेत्र से प्रारम्भ होकर बुध पर्वत (लिटिल फिंगर के नीचे का क्षेत्र) तक जाती है। यह रेखा कम लोगों के हाथों में देखने को मिलती है। चन्द्र पर्वत से ही हम जीवन में यात्राओं तथा शारीरिक बीमारियों के बारे में अध्ययन करते हैं।

चन्द्र ग्रह के जपनीय मंत्र-


वैदिक मंत्र-

 इमं देवा असपन्तंसुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठयाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय।
इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानाॅंराजा।।

पौराणिक मंत्र-

दधिशड्तुषाराभं    क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्।।

बीज मंत्र-

ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः

सामान्य मंत्र-

ॐ सों सोमाय नमः

इनमें से किसी एक मंत्र का श्रद्धापूर्वक एक निश्चित संख्या में नित्य जाप करना  चाहिए। जप की कुल संख्या 11000 तथा समय संध्याकाल है।


प्रिय पाठकों आपको ये आलेख कैसा लगा कमैंटस करके बताना ना भूलें, कोई त्रुटि, कमी या रह गयी हो तो अवश्य बतायें ताकि इस श्रृंखला के नये आलेख में मैं वह कमी दूर कर सकूं।  

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 

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