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घाघ भड्डरी की स्वास्थ्य पर सम्पूर्ण कहावतें

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घाघ व भड्डरी की कहावतें प्रसिद्ध हैं, जहां घाघ ने नीति, खेती व स्वास्थ्य संबंधी कहावतें कहीं है वहीं भड्डरी ने ज्योतिष, वर्षा आदि से संबंधित कहावतें कहीं हैं, यदि हम घाघ का अर्थ खोजते हैं तो घाघ किसी हठी, जिद्दी व्यक्ति को कहा जाता है, वहीं यदि हम भड्डरी के अर्थ को देखते हैं तो इसका शाब्दिक अर्थ भंडार का अध्यक्ष होता है, वैसे ये एक हिन्दू जाति में लगाया जाने वाला ‘‘सरनेम’’ भी है। बताया जाता है कि घाघ कवि का पूरा नाम देवकली दुबे था, ये जाति से ब्राह्मण थे। इनके दो पुत्र थे। ये भी कहा जाता है कि घाघ कवि की कविताएं/कहावतों से अकबर भी अत्यंत प्रभावित था और उसके परिणाम स्वरूप घाघ को ‘‘चौधरी’’ की उपाधि दी तथा बहुत सा धन-जमीन पुरस्कार में दिये थे।
आज के आलेख में हम केवल घाघ भड्डरी की स्वास्थ्य संबंधी कहावतें अर्थ सहित पढ़ेंगे। जो निश्चित ही आपके ज्ञान में वृद्धि के साथ-साथ आपके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखेगी।

घाघ भड्डरी की स्वास्थ्य पर सम्पूर्ण कहावतें

खाय कै मूतै सो वै बाॅंऊ, काहे वैद बसावे गाऊॅं।

घाघ कहते हैं कि भोजन करने के बाद पेशाब करके बायी करवट सोने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, घाघ की इस कहावत की योग व आयुर्वेद विज्ञान भी समर्थन करता है।

पहिले जागै पहिले सोवै जो वह सोचे वही होवै।

घाघ कहते हैं कि रा़ित्र में जल्दी सोने से व प्रातःकाल में जल्दि उठने से बुद्धि तीव्र होती है, और हमारी विचार शक्ति भी बढ़ जाती है हम जो भी पाने की कल्पना करते हैं वो हमें प्राप्त होने की संभावना रहती है।
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प्रातकाल खटिया से उठि के पिये तुरन्ते पानी।
वाके घर मा वैद ना आवै बात घाघ कै जानी।।

प्रातःकाल उठते ही जल पीकर जो व्यक्ति शौच जाता है वह हमेशा स्वस्थ रहता है, उनके घर में डाक्टर के आने की आवश्यकता नहीं रहती।

गाय दुहे बिन छाने लावै, गरमागरम तुरंत चढ़ावै।
बाढ़ै बल और बुद्धी भाई, घाघ कहे यह सच्ची गाई।।

घाघ कहते हैं कि गाय का धारोष्ण दूध यानि गाय के थनों से सीधा पिया जाने वाला दूध पीने से बल और बुद्धि बढ़ती है यह बात बिल्कुल सच्ची है।

आलस कभौ न करिये यार, चाहे काम परे हों हजार।
मल की शंका तुरत मिटावै, वही सभी सुख पुनि पुनि पावै।।

घाघ कहते हैं कि यदि शौच की इच्छा हो रही है तो सारे जरूरी काम छोड़कर पहले शौच जाना चाहिए, ऐसा करने वाला व्यक्ति सदा सुखी रहता है।

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मेहनत करै जो दंड उठाय, कहै घाघ यह ब्योरा गाय।
कभी बीमार पड़ै नहीं भाय, वहिके बाद जो दूध जमाय।।

घाघ ने बताया कि मुग्दर (एक प्रकार का भारतीय व्यायाम करने का उपकरण) का व्यायाम करने के बाद जो दूध पीता है वह व्यक्ति कभी बीमार नहीं पड़ता।

ज्यादा खाय जल्द मर जाय, सुखी रहे जो थोड़ा खाय।
रहे निरोगी जो कम खाय, बिगरे काम न जो गम खाय।।

घाघ कहते हैं कि जो व्यक्ति अधिक खाता है वो जल्दी ही मर जाता है, थोड़ा खाने वाला सुखी व निरोगी रहता है, जैसे कम खाने से निरोगी रहते हैं वैसे ही संतोष रखने से अपने काम नहीं बिगड़ते।

जाको मारा चाहिए बिन मारे बिन घाव।
वाको यही बताइये घुंइया पूरी खाव।।

घाघ कहते हैं कि यदि किसी से शत्रुता हो तो उसे अरबी की सब्जी और पूड़ी खाने की सलाह देनी चाहिए। इसके सेवन करने से वह जल्दी अस्वस्थ होकर मरने योग्य हो जायेगा, कोई अन्य उपाय नहीं करना होगा। क्यांकि अरबी की सब्जी और पूड़ी कब्ज करते हैं इसलिए यदि वह लगातार उन्हें खायेगा तो उसे कब्ज हो जायेगी।

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क्वार करैला चैत गुड़, भादौं मूली खाय।
पैसा खरचै गांठ का, रोग बिसावन जाय।।

घाघ बताते हैं कि क्वार के महीने में करेला, चैत के महिने में गुड़ और भादौं के महिने में मूली खाना हानिकारक है इन महिनों में इन्हें नहीं खाना चाहिए। इन्हे खाने से शरीर में रोग लग जाते हैं और डाक्टर के पास जाने से पैसा भी खर्च होता है।

चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ में पंथ अषाढ़ में बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वारे दूध न कातिक मही

मगह न जारा पूष घना, माघे मिश्री फागुन चना।
घाघ उपरोक्त बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि चैत (मार्च-अप्रेल) में गुड़, बैसाख (अप्रेल-मई)  में तेल, जेठ (मई-जून) में यात्रा, आषाढ़ (जून-जौलाई) में बेल, सावन (जौलाई -अगस्त)  में हरे साग, भादौं (अगस्त-सितम्बर)  में दही, क्वार (सितम्बर-अक्तूबर)  में दूध, कार्तिक (अक्तूबर-नवम्बर) में छाछ, अगहन (नवम्बर-दिसम्बर) में जीरा, पूस (दिसम्बर-जनवरी) में धनियां, माघ (जनवरी-फरवरी) में मिश्री और फागुन (फरवरी-मार्च)  में चने खाना हानिप्रद होता है।



सावन हरैं भादौं चीता, क्वार मास गुड़ खाहू मीता।
कातिक मूली अगहन तेल, पूस में करे दूध सो मेल।
माघ मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रात नहाय।
चैत मास में नीम सेवती, बैसाखहि में खाय बसमती
जेठ मास जो दिन में सोवे, ताको जुर अषाढ़ में रोवे।
घाघ ने लिखा है कि सावन में हर्रैं, भादों में चीता, क्वार में गुड़, कार्तिक में मूली, अगहन में तेल, पूस में दूध, माघ में खिचड़ी, फाल्गुन में प्रातः स्नान, चैत में नीम की कोपलें, बैशाख में चावल खाने और जेठ के महीने की दोपहर में सोने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है उसे बुखार नहीं आता।
संकलन-संजय कुमार गर्ग 

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चाणक्य ने बताया, कौन सी स्त्री चतुर होती है !

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नीतियों पर अनेक ग्रंथ भारतीय साहित्य परंपरा में प्राप्त होते हैं, जैसे चाणक्य नीति, विदुर नीति, भृतहरि नीति, घाघ व भण्डरी की नीति व सुभाषितानी के नीति श्लोक आदि। इन सभी नीतियों पर मैंने आलेख लिखें हैं जिनके लिंक आपको यही पर मिल जायेंगे। चाणक्य नीति पर मेरा ये नया आलेख "कौन सी स्त्री चतुर होती है" आपके सम्मुख प्रस्तुत है-

चाणक्य बताते हैं कि ‘‘यह निश्चय है कि आयु, कर्म, धन, विद्या, मृत्यु-ये पाचों बातें जब जीव (मनुष्य) मां के गर्भ में होता है, तभी लिख दी जाती हैं।’’ (4,1)

चाणक्य बताया कि ‘‘तप अकेले में, गाना तीन से, पढ़ना दो से, चार से रास्ता चलना, पांच से खेती करना और बहुतों से युद्ध भली-भांति होता है।’’ (4,12)

महात्मा चाणक्य कहते हैं कि निम्न को त्याग देना चाहिए ‘‘प्रीतिहीन समाज, दयारहित धर्म, विद्या रहित गुरू का त्याग उचित है। जो स्त्री क्रोध प्रगट करती हो उसको भी त्याग देना उचित है।’’ (4,16)

चाणक्य बताते हैं कि निम्न का शत्रु कौन है ‘‘पण्डितों के लिए मूर्ख, दरिद्री मनुष्यों के लिए धनी, विधवा स्त्रियों के लिए सुहागन और कुल वधुओं के लिए कुलटा शत्रु होती है।’’ (5,6)

कोटिल्य बताते हैं कि कौन सी वस्तु कब नष्ट हो जाती है ‘‘दूसरों के हाथों में पड़कर लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार आलस्य आने से विद्या नष्ट हो जाती है, कम बीज से खेत नष्ट सा रहता है और बिना सेनापति के सेना नष्ट हो जाती है।’’ (5,7) प्रिय पाठकों इससे मिलता जुलता श्लोक सुभाषितानि में भी आया है-‘‘अपनी पैन, पुस्तक और पत्नि किसी अन्य को दी जाये तो वह वापस नहीं आती अर्थात उसे गया हुआ ही समझना चाहिए और यदि दैवयोग से वापस आ भी जाती है तो कलम टूटी हुई, पुस्तक फटी हुई व पत्नि मर्दन की हुई होती है।’’

महात्मा कोटिल्य बताते हैं कि दान दरिद्रता का, शील दुर्गति का, बुद्धि अज्ञान का तथा सद्भावना भय का नाश करती है।’’ (5,11)

चाणक्य बताते हैं कि ‘‘काम (विषय भोग) से बढ़कर कोई व्याधि नहीं, मोह से बढ़कर कोई शत्रु नहीं, क्रोध से बढ़कर कोई अग्नि नहीं और ज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं होता।’’ (5,12)

चाणक्य समझाते हैं कि-‘‘यह यथार्थ है कि मनुष्य अकेला ही मोक्ष पाता है, वह अकेला ही जन्म लेता है, सुख-दुख भोगकर अकेला ही मर जाता है और अधिक पाप करने पर वह नरक को भी अकेला ही भोगता है।’’ (5,13)

चाणक्य बताते हैं कि कौन चालाक होता है और कौन सी स्त्री चतुर होती है! ‘‘स्त्रियों में मालिन (माली की पत्नि)  चतुर होती है, मनुष्यों में नाई चालाक होता है, पक्षियों में कव्वा धूर्त होता है, और पशुओं में गीदड़ धूर्त होता है।’’ (5,21)

चाणक्य बताते हैं पांच कौन हैं जो पिता के समान होते हैं ‘‘अन्न देने वाला, विद्या पढ़ाने वाला, जन्म देने वाला, भय से रक्षा करने वाला और यज्ञोपवीत देने वाला गुरू ये पांच पिता ही कहे जाते हैं।’’ (5,22)

चाणक्य आगे बताते हैं कि इन स्त्रियों को माता ही समझना चाहिए ‘‘राजा की स्त्री, मित्र की स्त्री, गुरू की स्त्री और माता व सास, इन पांचों को माता ही मानना चाहिए।’’ (5,23)

नीतिज्ञ कौटिल्य बताते हैं किसके पाप को कौन भोगता है ‘‘अपने राष्ट्र द्वारा किये हुए पाप का राजा, राजा से हुए पाप को राजपुरोहित, शिष्य से हुए पाप को गुरू और स्त्री द्वारा किये गये पाप को पति भोगता है।’’ (6,10)

महान नीतिज्ञ चाणक्य कहते हैं कि इनके बीच होकर कभी नहीं चलना चाहिए अर्थात इनके झगड़े के बीच में कभी नहीं आना चाहिए ‘‘पति और पत्नि, ब्राह्मण और अग्नि, नौकर और स्वामी, हल और बैल, व दो ब्राह्मण, इनके बीच होकर कभी नहीं चलना चाहिए।’’ (7,4)

चाणक्य समझाते हैं कि इन सब को कभी पैरों से स्पर्श नहीं करना चाहिए ‘‘अग्नि, गुरू, ब्राह्मण, गौ, कुमारी (कन्या), वृद्ध और बालक इनको पैर से नहीं छूना चाहिए।’’ (7,5)

चाणक्य बताते हैं कि जो जितना साहस दिखाता है उतना ही फल उसे प्राप्त होता है ‘‘यदि सिंह की मांद के पास कोई मनुष्य जाता है तो हाथी के गाल की हड्डी का मोती पाता है, और यदि कोई गीदड़ की मांद के पास जाता है तो बछड़े की पूंछ और गधे के चमड़े का टुकड़ा पाता है।’’ (7,17)

चाणक्य बताते हैं कि आत्मा कहां निवास करती है ‘‘जैसे फूल में गन्ध, तिल में तेल, काठ में आग, दूध में घी, ईख में गुड़ रहता है वैसे ही देह में आत्मा रहती है।’’ (7,20)

किन व्यक्तियों को विदुर के अनुसार गवाह न बनायें...
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विदुर बताते हैं, कौन से व्यक्ति अपनी आयु पूर्ण नहीं कर पाते!

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‘विदुर नीति’ महाभारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है। इसमें महात्मा विदुर ने राजा धृतराष्ट्र को कल्याण करने वाली अनेक बातें बतायी थीं। महाभारत में उद्योगपर्व के 33 वें से 40 वें अध्याय तक आठ अध्याय इसी प्रसंग से संबंधित हैं। इन आठ अध्यायों में महात्मा विदुर ने राजा धृतराष्ट्र को नीति, धर्म, सत्य, परोपकार, राजधर्म आदि के बारे में बड़े ही सुन्दर व मार्मिक ढ़ंग से समझाया है। विदुर नीति पर मैं पहले ही पांच आलेख लिख चुका हूं जिनके लिंक आपको इसी पोस्ट में मिल जायेंगे। इस छठे आलेख में नये श्लोकों को सम्मिलित किया गया है पहले आलेखों के श्लोकों को इस पोस्ट में सम्मिलित नहीं किया गया है। आइये पढ़ते हैं महात्मा विदुर का नीति संबंधी ज्ञान-

विदुर बताते हैं, कौन से व्यक्ति अपनी आयु पूर्ण नहीं कर पाते!


विदुर कहते हैं कि ‘‘जो मनुष्य जैसा बर्ताव करे, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए, यही नीति धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपटपूर्ण बर्ताव करें और अच्छा बर्ताव करने वालों के साथ अच्छा बर्ताव ही करना चाहिए।’’ (5, 7)

विदुर बताते हैं कि ‘‘बुढ़ापा रूप का, आशा धैर्य का, मृत्यु प्राणों का, असूया धर्माचरण का, काम लज्जा का, नीच पुरूष की सेवा आचरण का, क्रोध लक्ष्मी का और अभिमान सर्वस्व का नाश कर देता है।’’ (5, 8)

धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा जब वेदों में पुरूष को सौ वर्ष की आयु वाला बताया है तो वह किस कारण से अपनी आयु पूर्ण नहीं कर पाता है? महाराज विदुर ने उत्तर दिया-राजन! ‘‘अत्यंत अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता और मित्र से द्रोह ये छः तीखी तलवारें देह धारियों की आयु को काटती हैं। ये ही मनुष्य का वध करती हैं, मृत्यु नहीं।’’ (5, 9-10-11)

विदुर बताते हैं-‘‘जो अपने ऊपर विश्वास करने वाली स्त्री के साथ समागम करता है, जो गुरू स्त्रीगामी है, ब्राहमण होकर शुद्र की स्त्री से संबंध रखता है, शराब पीता है तथा जो बड़ों पर हुक्म चलाने वाला है, दूसरों की जीविका नष्ट करने वाला है, ब्राह्मण से सेवा कार्य कराने वाला है और जो शरणागत के साथ हिंसा करने वाला है-ये सब के सब ब्रह्महत्यारे के समान हैं, इनका संग हो जाने पर प्रायश्चित करना चाहिए, ऐसी वेदों की आज्ञा है।’’ (5, 12-13)

विदुर बताते हैं कि कौन से व्यक्ति स्वर्गगामी होते हैं-बड़ों की आज्ञा मानने वाला, नीतिज्ञ, दाता, यज्ञ शेष अन्न भोजन करने वाला, हिंसा रहित, अनर्थकारी कार्यों से दूर रहने वाला, कृतज्ञ, सत्यवादी और कोमल स्वभाव वाला विद्वान स्वर्गगामी होते हैं।’’ (5, 14)


ऋषिवर आगे कहते हैं कि हे राजन! सदा प्रिय वचन बोलने वाले मनुष्य तो सहज में ही मिल सकते हैं, किन्तु जो अप्रिय होता हुआ हितकारी हो, ऐसे वचन के बोलने वाले और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ होते हैं।’’ जो धर्म का आश्रय लेकर तथा स्वामी को यह प्रिय लगेगा या नहीं लगेगा-इसका विचार छोड़कर अप्रिय होने पर भी हित की बात कहता है, उसी से राजा को सच्ची सहायता मिलती है।’’ (5, 16-17)

विदुर बताते हैं कि ‘‘कुल की रक्षा के लिए एक मनुष्य का, ग्राम की रक्षा के लिए कुल का, देश की रक्षा के लिए एक गांव का और आत्मा के कल्याण के लिए सारी पृथ्वी का त्याग कर देना चाहिए।’’ (5, 17) बिल्कुल ऐसी ही बात चाणक्य नीति के अध्याय 3 के 10 वें श्लोक में भी कही गयी है।

विदुर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि ‘‘सावधान मनुष्य विश्वास करके सायंकाल में कभी किसी दूसरे अविश्वस्त मनुष्य के घर न जाये, रात को छिपकर चैराहे पर न खड़ा हो और राजा (बलवान व्यक्ति) जिस स्त्री को ग्रहण करना चाहता हो उसे प्राप्त करने का यत्न न करें।’’ (5, 28)


महात्मा विदुर बताते हैं कि निम्न के साथ लेन-देन (रूपये पैसे का लेनदेन) का व्यवहार न करें-‘‘अधिक दयालु राजा, व्यभिचारिणी स्त्री, राजकर्मचारी, पुत्र, भाई, छोटे बच्चों वाली विधवा, सैनिक और जिसका अधिकार छीन लिया गया हो, पुरूष इन सबके साथ लेन-देन का व्यवहार न करें।’’ (5, 30)

विदुर बताते हैं कि नित्य स्नान करने से क्या लाभ मिलते हैं-‘‘नित्य स्नान करने वाले मनुष्य को बल, रूप, मधुर स्वर, उज्ज्वल वर्ण, कोमलता, सुगन्ध, पवित्रता, शोभा, सुकुमारता और सुन्दर स्त्रियां ये दस लाभ प्राप्त होते हैं।’’ (5, 33)

विदुर बताते हैं कि कम भोजन करने से निम्न लाभ प्राप्त होते हैं-‘‘आरोग्य, आयु, बल और सुख तो मिलते ही हैं, उसकी संतान सुन्दर होती है तथा ‘यह बहुत खाने वाला है’ ऐसा कहकर लोग उस पर आक्षेप नहीं करते।’’ (5, 35)

विदुर आगे कहते हैं कि ‘‘जो अर्थ की पूर्ण सिद्धि चाहते हो, उसे पहले धर्म का ही आचरण करना चाहिए। जैसे स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता, उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।’’ (5, 48)

विदुर इसी बात का आगे बढ़ाते हुये कहते हैं कि ‘‘जो क्रोध और हर्ष के उठे हुए वेग को रोक लेता है और आपत्ति में भी धैर्य को नहीं खो बैठता, वहीं राजलक्ष्मी का अधिकारी होता है।’’ (5, 51)

संकलन-संजय कुमार गर्ग 

चाणक्य ने बताया कौन वास्तव में भाई है!

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चाणक्य ने बताया कौन वास्तव में भाई है!


चाणक्य नीति पर अनेक आलेख मैंने पोस्ट किये हैं वे आलेख ज्ञान व नीति की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं उन्हें भी पढ़कर आप अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकते हैं। जिनके लिंक आपको इसी आलेख में मिल जायेंगे। ये नया आलेख "चाणक्य ने बताया कौन वास्तव में भाई है" आपके सम्मुख प्रस्तुत है-

चाणक्य कहते हैं कि कैसे देश में निवास नहीं करना चाहिए-‘‘जिस देश में सत्कार, जीविका, विद्या प्राप्ति का लाभ और बंधु-बांधव नहीं हैं ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहिए।’’ (1,9)

चाणक्य के अनुसार किसे बन्धु समझना चाहिए-‘‘बीमार पड़ने पर, दुःख पहुंचने पर, अकाल के समय, बैरियों से कष्ट पड़ने पर, राजा, कचहरी और मर्घट में जो सहायता देता है वहीं बन्धु समझा जाना चाहिए।’’ (1,12)

महात्मा चाणक्य कहते हैं कि-‘‘श्लोक का नित्य प्रति पड़ना चाहिए, यदि पूरा नही तो आधा और यदि आधा नही तो चौथाई  तो अवश्य पढ़ें। इस प्रकार दान और अध्ययन आदि शुभ कार्यों के द्वारा दिन को अच्छी प्रकार से बिताना चाहिए।’’ (2,13)

चाणक्य कहते हैं कि निम्न हमें बिना आग के जलाते हैं-‘‘स्त्री से वियोग, दुष्टों की सभा में जाना, अपने जनों से अपमान, कर्जा, खोटे लोगों व राजा की सेवा और गरीबी हमें आग के बिना ही जलाते हैं।’’ (2,14)

कोटिल्य बताते हैं कि किसका बल कौन सा है-‘‘ब्राह्मण का बल विद्या, राजा (क्षत्रिय) का बल सेना, वैश्य का बल धन और सुख प्राप्त करना और शुद्रों का बल इनकी सेवा करना है।’’ (2,16)

महात्मा कोटिल्य बताते हैं कि कौन किसको कब छोड़ देता है-‘‘प्रजा शक्तिहीन राजा को, पक्षी फलहीन पेड़ को, वेश्या धनहीन मनुष्य को और भोजन के बाद अतिथि घर को छोड़ देता है।’’ (2,17)

चाणक्य बताते हैं कि किसके साथ कौन शोभा देता है-‘‘बराबर वालों से मित्रता शोभा देती है, राजाओं की नौकरी शोभा देती है, व्यापार में व्यवहार शोभा देता है, और घर के अंदर सुन्दर स्त्री शोभा देती है।’’ (2,20)

चाणक्य समझाते हैं कि-‘‘कन्या को श्रेष्ठ कुल में देना चाहिए, पुत्र का विद्वान बनाना चाहिए, शत्रु को बुरे व्यसनों में फंसाना चाहिए और मित्र को धर्म के कार्यों में लगाना चाहिए।’’ (3,3)

चाणक्य विद्याहीन मनुष्य के बारे में बताते हैं कि-’’विद्याहीन मनुष्य श्रेष्ठ कुल में जन्म लेकर तथा रूप यौवन संपन्न होते हुए भी उसी प्रकार शोभा को प्राप्त नहीं होता, जिस प्रकार गन्धहीन टेसू का फूल अच्छा नहीं लगता।’’ (3,8)

चाणक्य बताते हैं कि किसको क्या शोभा देता है-‘‘कोयल का मीठा स्वर ही उसकी शोभा है, कुरूप मनुष्य की विद्या ही शोभा है, तपस्वियों को क्षमा करना ही शोभा देता है और पातिव्रत्य का धर्म स्त्री को शोभा देता है।’’ (3,9)

नीतिज्ञ कुटिल बताते हैं किसको कब छोड़ देना चाहिए-‘‘कुल की रक्षा के लिए एक को छोड़ देना चाहिए, ग्राम की रक्षा के लिए एक कुल को छोड़ देना चाहिए और देश के हित के लिए ग्राम को छोड़ देना चाहिए तथा आत्मा के लिए पृथ्वी को ही छोड़ देना चाहिए।’’ (3,10)

महान नीतिज्ञ चाणक्य कहते हैं कि ‘अति सर्वत्र वर्जित’ होना चाहिए क्योंकि-‘‘अति सुन्दरता के कारण सीता का हरण हुआ, अति गर्व करने के कारण रावण मारा गया और बहुत दान देने के कारण बलि को पाताल जाना पड़ा, इसी से उनका मान घटा। इसी कारण ‘‘अति’’ को सब जगह छोड़ देना चाहिए।’’ (3,12)

चाणक्य समझाते हैं कि निम्न परिस्थितियों में भाग जाना ही श्रेष्ठ है-अकाल पड़ने पर, उपद्रव (दंगा) उठने पर, शत्रु के आक्रमण करने पर, बुरे लोगों का साथ होने पर जो भाग जाता है वहीं जीवित रहता है।’’ (3,19)

चाणक्य निम्न मनुष्यों का जन्म व्यर्थ मानते हैं-‘‘जो मनुष्य जन्म पाकर भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनमें से कुछ भी नहीं रखते उनका जन्म लेने का फल केवल मृत्यु ही होता है।’’ (3,20)

चाणक्य कहते हैं कि लक्ष्मी कहां निवास करती हैं-‘‘जहां अन्न भरपूर एकत्र रहता है, जहां मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहां स्त्री-पुरूषों में कलह (झगड़ा) नहीं होता, वहां लक्ष्मी जी अपने आप ही विराजमान होकर शोभा देती हैं।’’ (3,21)

चाणक्य पुत्र के संबंध में एक महत्वपूर्ण शिक्षा देते हुए कहते हैं कि-‘‘पुत्र का पांच वर्ष तक प्रेम करना चाहिए, और फिर दस वर्ष तक यानि पन्द्रह साल का होने तक उसे ताडना में रखें उस पर कड़ी निगरानी रखें, इसके पश्चात सोलह वर्ष का होने के बाद पुत्र के साथ एक मित्र जैसा व्यवहार करें।’’ (3,18)
संकलन-संजय कुमार गर्ग
किन व्यक्तियों को विदुर के अनुसार गवाह न बनायें...
विदुर के अनुसार आठ गुण पुरूषों की ख्याति बढ़ा देते हैं !
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विदुर बताते हैं, किन मनुष्यों के सारे काम सिद्ध होते हैं!

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मैंने इससे पहले भी चार पोस्ट विदुर नीति पर प्रकाशित की हैं जिनका लिंक नीचे दिया गया है। इस आलेख में मैंने नीतिज्ञ, महात्मा विदुर के अन्य श्लोकों को सम्मिलित किया है जो पहले प्रकाशित पोस्ट में नहीं है। चलिए पढ़ते हैं महात्मा विदुर का महान नीति संबंधी ज्ञान-


किन मनुष्यों के सारे काम सिद्ध होते हैं!


विदुर कहते हैं कि "मनुष्य अकेला पाप करता है और उस पाप की कमायी ये बहुत से लोग सुख भोगते हैं, सुख भोगने वाले तो पाप से छूट जाते हैं परन्तु उसका कर्ता यानि करने वाला उस पाप का भागी होता है।" (1, 47)

विदुर बताते हैं कि कौन सी व्यक्तियों की रात्रि में क्या स्थिती होती है ‘‘सौतवाली स्त्री, जूए में हारे हुए जुआरी और भार ढोने से व्यथित शरीर वाले मनुष्य की रात में जो स्थिति होती है, वहीं स्थिति उल्टा निर्णय करने वाले व्यक्ति (न्यायाधीश) की भी होती है।"(3, 31)

विदुर कहते हैं कि "जैसे-जैसे व्यक्ति कल्याण के कार्यों में मन लगाने लगता है, वैसे-वैसे उसके सारे अभिष्ट सिद्ध होने लगते हैं, इसमें जरा भी संदेह नहीं है।" (3, 42)

विदुर बताते हैं कौन सा मनुष्य कष्ट को प्राप्त होता है-"गुणों में दोष देखने वाला, मर्म पर आघात करने वाला, निर्दयी, शत्रुता करने वाला और शठ मनुष्य पाप का आचरण करता हुआ शीघ्र ही महान कष्ट को प्राप्त करता है।" (3, 64)

विदुर बताते हैं कि ‘अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक गुरू हैं, दुष्टों के शासक राजा हैं और छिपे-छिपे पाप करने वालों के शासक सूर्य पुत्र यमराज हैं।’’(3, 71)

ऋषिवर आगे कहते हैं कि "ऋषि, नदी, महात्माओं के कुल तथा स्त्रियों के दुष्चरित्र का मूल नहीं जाना जा सकता।" (3, 72)

विदुर बताते हैं कि "दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं गाली न दें, क्षमा करने वाले को रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है और उसके पुण्य को भी हर लेता है।’’(4,5)

विदुर कहते हैं कि "जैसे वस्त्र जिस रंग में रंगा जाये वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असज्जन, तपस्वी अथवा चोर की सेवा करता है तो वह उसी के वश में हो जाता है, उस पर उन्हीं का रंग चढ़ जाता है।" (4, 10)

वाणी के संबंध में विदुर कहते हैं कि "बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है, यानि मौन की अपेक्षा भी दूना लाभप्रद है। सत्य भी यदि प्रिय बोला जाये तो यह तीसरी विशेषता है और वह भी यदि धर्मसम्मत कहा जाय जो यह वचन की चैथी विशेषता है।"(4, 12)

विदुर बताते हैं कि कौन हर्ष-शोक से परे हो जाता है "जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता, न दूसरों को जीतने की इच्छा करता है, न किसी के साथ बैर करता और न दूसरों को चोट पहुंचाना चाहता है, जो निन्दा प्रशंसा में समान भाव रखता है, वह हर्ष-शोक से परे हो जाता है।"(4, 15)

विदुर सेवा करने के विषय में बताते हैं "जो अपनी उन्नति चाहता है, वह उत्तम पुरूषों की ही सेवा करें, समय आ पड़ने पर मध्यम पुरूषों की भी सेवा कर ले, परन्तु अधम पुरूषों की सेवा कदापि न करें।" (4, 20)

विदुर आगे कहते हैं कि "मनुष्य बार-बार मरता है और जन्म लेता है, बार-बार हानि उठाता है और बढ़ता है, बार-बार स्वयं दूसरों से याचना करता है और दूसरे उससे याचना करते हैं तथा बार-बार वह दूसरों के लिए शोक करता है और दूसरे उसके लिए शोक करते हैं। सुख-दुख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि, और जीवन-मरण-ये बारी-बारी से सबको प्राप्त होते रहते हैं, इसलिए धीर पुरूष को इनके लिये हर्ष और शोक नहीं करना चाहिए।’’(4, 46-47)

विदुर बताते हैं कि "सम्यक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्य कर्म और अच्छी तरह से की गयी तपस्या के अंत में सुख की वृद्धि होती है।" (4, 54)

विदुर बताते हैं "नित्य सींचकर बढ़ायी हुई पतली लताऐं बहुत होने के कारण बहुत वर्षों तक नाना प्रकार के झोंके सहती हैं, यह बात सत्पुरूषों के विषय में भी समझनी चाहिए। वे दुर्बल होने पर भी सामूहिक शक्ति से बलवान हो जाते हैं। भारतश्रेष्ठ! धृतराष्ट्र! जलती हुई लकड़ियां अलग-अलग होने पर धुआं फेंकती हैं और एक साथ होने पर प्रज्ज्वलित हो उठती है। इसी प्रकार जातिबन्धु भी फूट होने पर दुःख उठाते हैं और एकता होने पर सुखी रहते हैं।" (4, 59-60)

एकता के संबंध में विदुर आगे कहते हैं कि "यदि वृक्ष अकेला है तो वह बलवान, दृढ़भूत तथा बहुत बड़ा होने पर भी एक क्षण में आंधाी के द्वारा बलपूर्वक शाखाओं सहित धराशायी किया जा सकता है। किन्तु जो बहुत से वृक्ष एक साथ रहकर समूह के रूप में खड़े हैं, वे एक दूसरे के सहारे बड़ी से बड़ी आंधी को भी सह सकते हैं।" (4, 62-63)

विदुर बताते हैं कि कौन अवध्य (न मारने योग्य) होते हैं "ब्राह्मण, गौ, कुटुम्बी, बालक, स्त्री, अन्नदाता और शरणागत ये सभी अवध्य होते हैं।"

संकलन-संजय कुमार गर्ग 

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घाघ भड्डरी की खेती के संबंध में कहावतेें

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घाघ और भण्डरी पर मैंने पहले भी तीन ब्लाॅग बनाये थे, जिनमें एक घाघ भण्डरी की कहावतें, दूसरा था घाघ व भण्डरी की कृषि व मौसम संबंधी कहावतें तथा तीसरा था घाघ व भण्डरी की मिश्रित कहावतें, इन तीनों आलेखों में मैंने घाघ की विभिन्न कहावतों को संग्रहित किया था। आज मैं आपके लिए घाघ व भण्डरी की खेती से संबंधित कहावतों का संग्रह लेकर आया हूं जो निश्चित ही आपके ज्ञान में वृद्धि करेगा। 
आइये देखते हैं, घाघ भड्डरी की खेती के संबंध में कहावतेें-

बाॅंध कुदारी खुरपी हाथ, लाठी हॅंसिया राखै साथ।
काटै घास और खेत निरावै, सो पूरा किसान कहलावै।।

घाघ कहते हैं कि वही किसान वास्तव में सच्चा किसान है जो खुरपी और फावड़ा हाथ में रखता है। लाठी और हंसिया हाथ में रखे और साथ-साथ खेत में उपजी घास काटता रहे और खेत निराता रहे।

धान पानी उखेरा, तीनों पानी के चेरा।
सांक, आलू और खीरा, तीनों पानी के कीरा।।

घाघ कहते हैं कि धान, पान, ईख, सांक, आलू और खीरे की खेती के लिए अधिक पानी चाहिए। अतः यदि किसान के पास पानी की पर्याप्त व्यवस्था है तभी इनकी खेती करनी चाहिए।

गहिर न जोते बोवे धान, सोघर कुठिला भरै किसान।

भड्डरी कहते हैं कि धान के खेत का गहरा नहीं जोतना चाहिए, धान बो देनी चाहिए, इससे अच्छी फसल होती है।

गेहूं बोवे चना दरारे, धान गहे मक्की निराये।
ऊख कसाये पानी दिखाये।।

भड्डरी व घाघ आगे कहते हैं कौन सी खेती को कैसे बोने से अच्छी खेती होती है, गेहूं का खेत अधिक जोतने से, चने का खेत खोंटने से, धान को बार-बार पानी देने से, मक्का निराने से, ईख बोने (गोड़ने) तथा पानी देने से अच्छी उपज होती है।

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घाघ व भड्डरी बताते हैं कि कौन सी फसल को कब काटना चाहिए-

चना अधपका जौ पका काटै, गेहूं बाली लट के काटै।

चना अधपका होने पर काटे लें, जौं भली भांति पकने पर कांटे और गेहूं को जब कांटे जब उसकी बाली लटक जायें।

पछुआ हवा उसावे जोई, घाघ कहै घुन कबहूं न होई।

घाघ-भड्डरी कहते हैं कि जो भी अनाज पछुआ हवा में ओसाया जाता है, उस अनाज में घुन नहीं लगता।

एक हर हत्या दो हर काज, तीन हर खेती चार हर राज।

घाघ व भड्डरी बताते हैं कि एक हल की खेती बवाल है, दो हल की खेती काम चलाने वाली होती है, तीन हल की खेती से अच्छी खेती होती है और चार हल की खेती से किसान राजसुख प्राप्त करता है।

जौ गेहूं बोवै सेर पचीसौ, मटर के बीघा सेर तीसौ।
बोवे चना पसेरी तीन तीन सेर बीघा जुवारी कीन।
दो सेर मेंथी अरहर मास डेढ़ सेर बिगहाबीज कपास।
पांच पसेरी बिगहा धान तीन पसेरी जड़हन आन।
सवा सेर सावां का मान तिल्ली सरसों अंजल जान।
बर्रे कोदो सेर बुआवै, डेढ़ सेर लै तीसी नावै।
डेढ़ सेर बजरा बजरी सावां, कोदों काकुनि सवैया बोवा
यहि विधि खेती करै किसान, दूने लाभ की खेती जान।

घाघ व भड्डरी बताते हैं कि किसान को एक बीघा खेत में कितने बीज डालने चाहिए-एक बीघा खेत में गेहूं जौ पच्चीस सेर, मटर तीस सेर, चना पन्द्रह सेर, ज्वार तीन सेर, अरहर, मेथी, उर्द दो सेर, कपास डेढ़ सेर, धान पच्चीस सेर, जड़हन पन्द्रह सेर, साॅंवा सेर भर, तिल्ली और सरसों मुट्ठी भर, बर्रे और कोदौ काकुनि एक सेर के हिसाब से बोने वाले किसान को ही दूना लाभ होता है।

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क्वार कातिकै हल को जोते। भरै कोठार आय वह सोते।

घाघ व भड्डरी कहते हैं कि जो किसान क्वार और कार्तिक माह में हल जोतता है उसके भंडार अवश्य ही अनाज से भर जायेंगे।

बीघा बायर होय, बांध जो होय बंधाए।
भरा भुसैला होय, बबुर जो होय बुवाए।
बढ़ई बसै समीप, वसूला बाढ़ धराए।
पुरखिन होय सुजान, विया बोउनिहा बनाए।
बरद बगौघा होय, बदिरया चतुर सुहाए।
बेटवा होय सपूत, कहे बिन करे कराए।।

घाघ व भड्डरी बताते हैं कि कौन सा किसान भाग्यशाली होता है। जिस किसान के पास खेत का पूरा चक हो, खेत की सिंचाई के लिए बांध (नहर) बंधे हुए हों, चारे की कमी न हो, बबूल के पेड़ खेतों में खड़े हों, समीप ही बढ़ई रहता हो व उसके पास औजार तेज धार लगे हों, घर की मालकिन चतुर हो, बीजों को संभाल के रखे, बढ़िया नस्ल के बैल हों, हरवाया समझदार हो, परिश्रम से काम करता हो, किसान का बेटा सुपुत्र हो, बिना कहे सुने काम में लगा रहे तथा नौकरों को भी लगाये रखे। ऐसा किसान बड़ा भाग्यशाली होता है।
संकलन-संजय कुमार गर्ग 

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चाणक्य के अनुसार किन कार्यो में कभी संतोष न करें!

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चाणक्य नीति
"यथा राजा तथा प्रजा" की उक्ति आपने काफी सुनी होगी, इसी उक्ति पर चाणक्य लिखते हैं-"धर्मात्मा राजा की प्रजा भी धर्मात्मा होती है और पापी राजा की प्रजा भी पापी होती है। सब विद्वान लोग यही कहते हैं कि जैसा राजा वैसी प्रजा"।।07/13।।

चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने अच्छे बुरे कर्मो का फल भोगना ही पड़ता है-"जैसे हजारों गायों में भी वत्स अपनी माता के पास ही जाता है वैसे ही प्रारब्ध बन कर हमें खोज ही लेती है" ।।14/12।।

चाणक्य कहते हैं कि-"मनुष्य को अपनी स्त्री, भोजन और धन इन तीनों में संतोष करना चाहिये, अध्ययन, जप, और दान इन तीनों में कभी संतोष नहीें करना चाहिये"।।18/12।।

चाणक्य साधुजनों की प्रशंसा करते हुये लिखते हैं कि-"युग के अन्त में सुमेरू चल पड़ता है, कल्प के अन्त में सातों समुद्र भी मर्यादा को छोड़ देते हैं परन्तु साधुजन कभी भी विचलित नहीं होते"।।20/13।।

महात्मा चाणक्य शरीर की महिमा का वर्णन करते हुये कहते हैं कि-"स्वस्थ शरीर की महिमा बहुत बड़ी है, क्योंकि वह बार-बार नहीं मिलता। मित्र, स्त्री, धन और जायदाद चाहे तो कई हजार मिल सकते हैं"।। 3/14।।

चाणक्य कहते हैं कि निम्न कार्य थोड़ा करने पर भी बहुत फैल जाते हैं-"दुर्जन मनुष्य से एकांत में वार्ता, सुपात्र को दान देना, जल में तेल, और बुद्धिमान में शास्त्र ज्ञान, यदि थोड़ा भी हो तो भी वह अधिक फैल जाता है"।।5/14।।

चाणक्य कहते हैं कि निम्न ज्ञान स्थायी नहीं होता-"धर्म कथा के अन्त में और श्मशान में मनुष्य को जो ज्ञान होता है यदि वह सदा बना रहे तो कौन संसार के बन्धनों में बंधा रह सकता है अर्थात सब मुक्त हो जाये, अर्थात ये ज्ञान स्थायी नहीं होता"।।5/14।।

चाणक्य मनुष्य की मानसिक स्थिति का सुन्दर वर्णन करते हुये कहते हैं-जोे जिसके मन में समाया हुआ है वह दूर रहते भी दूर नहीं रहता और जो जिसके मन में नहीं बसता वह अति निकट रहता हुआ भी दूर ही रहता है"।। 9/14।।

कौटिल्य अपनी कुटिल नीति पर श्लोक लिखते हुये कहते हैं कि जिसका अप्रिय करना हो उसके साथ कैसा व्यवहार करें-"जिसका अप्रिय करने की इच्छा हो उससे सदा प्रिय वचन बोलना चाहिये। शिकारी मृग का शिकार करने के लिये प्रिय गीत गाकर ही उसका शिकार करता है"।।10/14।।

निम्न के अधिक निकट न अधिक दूर जाने की सलाह चाणक्य देते हैं-"आग, स्त्री, राजा और गुरू, इनसे दूर रहने पर ये कुछ फल नहीं देते और बहुत समीप आने पर ये नाश कर देेते हैं, अतः इनसे न निकट ही रहना चाहिये और न अधिक दूर ही जाना चाहिये"।।11/14।।

निम्न से सदा सावधान रहने की सलाह महात्मा चाणक्य देते हैं-"आग, पानी, स्त्री, मूर्ख, सांप और राजा इन छहों का सदा ध्यान रखना चाहिये, अर्थात इनसे सदा सावधान रहना चाहिये, क्योंकि ये सेवा करते-करते ही उल्टे फिर जाते हैं, अर्थात प्रतिकूल होकर प्राण हर लेते हैं"।।12/14।।
(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)
                       -संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)

किन व्यक्तियों को विदुर के अनुसार गवाह न बनायें...
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