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ये लक्षण बताते हैं आप पर जादू-टोना किया गया है!

ये लक्षण बताते हैं आप पर जादू-टोना किया गया है!

कभी-कभी हमें अपने शरीर में, अपनी लाइफ में अजीब-अजीब से परिवर्तन दिखाई देते हैं, जैसे अचानक सारे काम बिगड़ने लगना, शरीर में ना पता लगने वाली कोई बिमारी होना, जिसे डाक्टर भी ठीक ना कर पा रहा हो, घर के आसपास अजीब-अजीब सी चीजें दिखाई देना, या फिर सपने में डरना आदि आदि। साथियों! यदि आपकी ये समस्याऐं चाह कर भी दूर ना हो रही हों तो हो सकता हैं आप पर किसी ने काले जादू या मूठ प्रयोग या किसी तांत्रिक प्रयोग से शापित कराया हो।

साथियों! उपरोक्त बताये गये लक्षण मेरे मनगढंत नहीं हैं बल्कि उन तांत्रिकों के आधार पर बता रहा हूं, जो इन साधनाओं के, इन तंत्र प्रयोगों के जानकार हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये प्रयोग केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पश्चिम के देशों में भी ब्लैक मैजिक, वूडु आदि नामों से जाने जाते हैं व किये जाते हैं, अंतर केवल इतना हैं कि अलग-अलग देशों के अनुसार इनके नाम-तरीके बदल जाते हैं। इन प्रयोगों को कुछ लोग स्वयं करते हैं या फिर तांत्रिकों से पैसे देकर करवाते हैं। इन प्रयोगों को करवाने वाले आपके दुश्मन जो आपकी तरक्की सेे जलते हों, या फिर आपके कोई नजदीकी रिश्तेदार भी हो सकते हैं। आज में आपको ऐसे लक्षण बता रहा हूं जिन्हें देखकर कर आप अपने ऊपर या फिर किसी अन्य के ऊपर किये गये तांत्रिक प्रयोगों का पता लगा सकते हैं।

ये लक्षण बताते हैं आप पर जादू-टोना किया गया है!


1-यदि आपके कपड़े या अंडर गारमेन्टस अचानक गायब होने शुरू हो गये हों-

यदि आपके कपड़े विशेष रूप से अंडरगारमेन्टस अचानक से गायब हो रहे हों या फिर आपके कपड़े का कोई हिस्सा कटा हुआ हो, तो हो सकता है कि ये आपके किसी दुश्मन ने तांत्रिक प्रयोग के लिए आपके घर से चुराये हों, क्योंकि आपके कपड़ों से ही आप पर सबसे शक्तिशाली तांत्रिक प्रयोग किया जा सकता है, तो आपको सावधान हो जाना चाहिए।

2-घर के आसपास कुछ अजीब सी चीजें मिलना-

यदि आपके घर के बाहर आटा, सिंदूर, बुझे हुये दीपक, मिर्च आदि मिले तो आपको सावधान हो जाना चाहिए, हो सकता है कोई आप पर या आपके परिवार पर काला जादू का प्रयोग कर रहा है।

ये लक्षण बताते हैं आप पर जादू-टोना किया गया है!

3-शरीर में अचानक से दर्द होना और फिर बन्द हो जाना-

काले जादू या वूडु के द्वारा किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से व मानसिक रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। जिस पर यह प्रयोग होता है उसे अचानक से तेज दर्द हो जाता है और अचानक ठीक हो जाता है। डाक्टर भी इस दर्द के कारण का पता नहीं लगा पाते। यदि आप को या आपके किसी परिचित को इस तरह से अचानक दर्द होता है और स्वयं ठीक होता रहता हों, तो हो सकता है यह काले जादू का प्रयोग हो।

4-आपके पालतू डाॅग या कैट का बदला हुआ व्यवहार-

यदि आपके पालतू डाॅग या कैट का व्यवहार आपको देख कर अचानक बदल जाये और वह अजीब सा व्यवहार करने लगे तो हो सकता है आप पर काले जादू का प्रयोग किया गया हो। क्योंकि जानवरों में बुरी शक्तियों को देखने की क्षमता होती है, यदि आपके साथ भी ऐसा हो रहा हो तो सावधान हो जाइये।

5-ताबीज या धागों का अपने आप अचानक टूट जाना-

यदि किसी पर काले जादू का प्रयोग होता है तो उसको सुरक्षा देने वाले ताबीज या धागे अचानक से टूट सकते हैं, यदि आपके साथ ऐसा हो रहा है तो फिर आपको संभल जाना चाहिए।

6-घर में अजीब-अजीब सी चीजें नजर आना-

यदि आपको घर क अंदर कुछ अजीब सी लिखावट दिखाई दे, बालों का गुच्छा जो आपके घर के सदस्य का ना हो आदि ऐसी अजीब चीजें दिखाई देने लगे तो आपको इन चीजों को रखने वाले का पता करने का प्रयास करना चाहिए और सावधान हो जाना चाहिए।

7-यदि आपको हमेशा अपने साथ किसी के होने का अहसास हो-

यदि आपको अपने साथ हमेशा किसी के होने का अहसास हो, यदि आपको एकान्त में लगता हो कि कोई मेरे साथ चल रहा है तो भी आपको समझ जाना चाहिए कि आप पर कुछ बुरा कराया गया है।

8-फोटो का गायब होना-

यदि आपके घर में रखी गयी आपकी या घर के किसी सदस्य की फोटो अचानक ना मिले तो हो सकता है उन्हें आपके किसी बुरा चाहने वाले ने गायब की हों और उन फोटो पर तांत्रिक प्रयोग करने के लिए किसी तांत्रिक को दे दी हो।

9-रात में डरावने सपने दिखाई देना-

यदि आपको रात में अचानक डरावने सपनें दिखाई देने प्रारम्भ हो जाये और वे लगातार दिखाई देते रहे तो  भी आपको संभल जाना चाहिए, ये आप पर कोई तांत्रिक प्रयोग हो सकता है।

10-स्वयं के व्यवहार को ही नहीं समझ पाना-

आप अपने बिहेव में कोई परिवर्तन महसूस करते हैं जैसे अचानक गुस्सा हो जाना, अचानक बहुत ज्यादा खुश होना, या फिर अचानक रोने लगना आदि आदि। तो हो सकता है आप पर कोई तांत्रिक प्रयोग कराया गया हों और वो तांत्रिक आपको मानसिक रूप से नियंत्रित कर रहा हो।

साथियों! ये लक्षण बताते हैं आप पर जादू-टोना किया गया है या कोई तांत्रिक प्रयोग किया गया है। अब इन तांत्रिक प्रयोगों से कैसे बचें इस पर भी मैं जल्दी ही एक अन्य आलेख लेकर आउंगा, जब तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए, नमस्कार, जय हिन्द!

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद् 
sanjay.garg2008@gmail.com मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
Image from Pixabay
 

Mercury Planet: बुध ग्रह का वास्तु-ज्योतिषीय-हस्तरेखीय वर्णन

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बुध ग्रह का भौतिक वर्णन-

बुध सौर मण्डल का सबसे छोटा ग्रह है। बुध ग्रह सूर्य का सबसे निकटतम ग्रह है, इसी कारण इस पर अत्यधिक उष्णता है। बुध सूर्य से 5 करोड़ 80 लाख कि0मी0 दूरी पर है। बुध अपने परिभ्रमण मार्ग पर 88 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। यह सदैव अपना एक भाग सूर्य की ओर करके परिक्रमा करता है। इसका व्यास केवल 5160 कि0मी0 है। इसका गुरूत्व भी हमारी पृथ्वी से एक चौथाई है। पृथ्वी पर यदि कोई व्यक्ति 6 फुट कूद सकता है वहीं व्यक्ति बुध ग्रह पर 24 फुट ऊंचा कूद सकेगा। बुध की पृथ्वी से दूरी 10 करोड़ 15 लाख कि0मी0 है।
 
बुध ग्रह सूर्य के निकट होने के कारण इसे देखा जाना कठिन है। यह सूर्योदय कुछ देर पहले पूर्वी क्षितिज पर तथा सूर्य के अस्त होने के कुछ ही मिनट बाद पश्चिम क्षितिज पर, प्रथम तारे के समान चमकता हुआ दिखाई देता है।
 

बुध ग्रह का पौराणिक विवरण-

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार बुध पीले रंग की पुष्पों की माला व पीला वस्त्र शरीर पर धारण किये रहते हैं।  बुध देव की चार भुजाएं हैं। ये अपने चारों हाथों में तलवार, ढाल, गदा और एक हाथ में वरदान देने की मुद्रा धारण किये हुए हैं। बुध देव अपने सिर पर सोने का मुकुट तथा गले में सुन्दर माला धारण किये रहते हैं। इनका वाहन शेर है।
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बुध ग्रह की पौराणिक कथा-

अथर्ववेद के अनुसार बुध के पिता का नाम चन्द्रमा है और माता का नाम तारा है। ब्रह्माजी ने इनका नामकरण बुध किया था, क्योंकि इनकी बुद्धि अधिक तीव्र थी। बुध सभी शास्त्रों में पारंगत हैं तथा अपने पिता चन्द्रमा की ही भांति तेजस्वी हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने इनकी योग्यता को देखते हुए इन्हें भूतल का स्वामी तथा ग्रह बना दिया। मत्स्यपुराण के अनुसार बुध ग्रह का वर्ण कनेर पुष्प के समान पीले रंग का है। बुध का रथ श्वेत है और प्रकाशित हो रहा है, इनके रथ में वायु के समान चलने वाले अश्व जुड़े रहते हैं।
 
महाभारत में आयी एक कथा के अनुसार इनकी बुद्धि से प्रभावित होकर महाराज मनु ने अपनी गुणवती कन्या इला का इनके साथ विवाह कर दिया। इला और बुध से महाराज पुरूरवा  हुए। 
 
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बुध ग्रह का वास्तु के अनुसार विवरण- 

बुध देव वास्तु में उत्तर दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं, इस दिशा से कालपुरूष के हृदय व सीने का विचार किया जाता है। जन्मकुण्डली की दृष्टि से देखें तो कुण्डली में चतुर्थ भाव उत्तर दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। इस दिशा के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा मातृ-स्थान है। इस दिशा में जल तत्व विद्यमान रहता है। यदि भूखण्ड में यह स्थान खाली नहीं होता तो वह घर स्त्रियों से वंचित रह जाता है। यही दिशा धन-वैभव के आगमन की दिशा भी है, भूखण्ड में उत्तर दिशा में दरवाजे एवं खिड़कियां होने से कुबेर की सीधी दृष्टि पड़ती है जिससे धन, वैभव व आर्थिक उन्नति होती है। यदि किसी घर की उत्तर दिशा दोषयुक्त है तो उस घर के स्वामी की कुण्डली में चतुर्थ भाव निश्चित ही खराब होगा, ऐसे जातक को मां का सुख, नौकर-चाकर व वाहन आदि का सुख प्राप्त नहीं होगा, साथ ही उनकी आर्थिक स्थिति भी खराब होगी।
 

बुध ग्रह का ज्योतिषीय विवरण-

नवग्रहों के मंत्रीमण्डल में इन्हें राजकुमार की उपाधि प्राप्त है। बुध का फारसी नाम उतारूद है और इन्हें अंगे्रजी में मर्करी कहा जाता है। हिन्दी में बुध को क्षैतिज, सौम्य, बोधन, शान्त कुमार आदि नामों से भी जाना जाता है। यह नंपुसक ग्रह माने जाते हैं जिस ग्रह के साथ बैठते हैं उसी के अनुसार व्यवहार करने लगते हैं। कुण्डली में अधिकतर ये सूर्य ग्रह के साथ या उनके पीछे रहते हैं। सभी ग्रहों में ये एक ऐसे ग्रह हैं जो सूर्य के साथ रहकर भी मंद नहीं होते अन्यथा अन्य ग्रह सूर्य के साथ रहकर अक्रान्त हो जाते हैं। जिस भाव पर बैठते हैं वहां से सातवें भाव पर पूर्ण दृष्टि रखते हैं। बुध ग्रह सूर्य, राहु, शुक्र को अपना मित्र तथा चन्द्रमा को अपना शत्रु मानते हैं, जबकि चन्द्रमा इन्हें अपना मित्र मानता है। ये मंगल, शनि, गुरू से समभाव रखते हैं। बुध, कन्या राशि में उच्च के व मीन राशि में नीच के होते हैं। जबकि मिथुन व कन्या इनकी स्वराशियां हैं। बुध को शुद्र जाति का माना जाता है, वैसे इन्हें सौम्य ग्रह माना जाता है। मिथुन, कन्या, व तुला लग्न के लिए ये योगकारक एवं धनु, मीन लग्न के लिए ये एक मारक ग्रह हैं। सांसारिक रिश्तों में यह मामा, गोद ली हुई संतान का प्रतीक हैं। शरीर में ये त्वचा व अंगों में नाक पर विशेष प्रभाव डालते हैं। गुणों में ये रजोगुणी हैं, तत्वों में पृथ्वी तत्व हैं, खट्ठे-मीठे पदार्थों इनको विशेष प्रिय होते हैं। ऋतुओं में इन्हें शरद ऋतु प्रिय है और रंगों में ये हरे रंग में निवास करते हैं। कुण्डली में इनसे जातक में बुद्धि, काव्य-शक्ति, वाणी, वेद-वेदांग, ज्योतिष-शास्त्र का अध्ययन, व्यापार, वैद्यक, कुष्ठ व गुप्त रोग, संग्रहणी आदि रोगों का विचार इनसे किया जाता है। ये विशेष रूप से व्यापारिक कार्यो के कारक ग्रह हैं। इनकी दशा 17 वर्ष की होती है। इनकी प्रिय धातु कांस्य है तथा ये पन्ना में निवास करते हैं, प्रभात इनका प्रिय समय है तथा ये गांव में रहते हैं। मानव की बुद्धि में ये निवास करते हैं।
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हस्तरेखा में बुध का स्थान-

हथेली में कनिष्ठिका यानि लिटिल फिंगर के नीचे वाला क्षेत्र बुध पर्वत कहलाता है। यह पर्वत बुद्धि के साथ-साथ भौतिक समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। जिन व्यक्तियों के हाथ में ये पर्वत उभार लिये होता है ऐसे जातक उर्वर मस्तिष्क वाले, तेज दिमाग वाले होते हैं, ये जिस कार्य में हाथ डालते हैं वहीं कार्य इनके पूरे होते चले जाते हैं।
 
यदि यह पर्वत किसी के हाथ में जरूरत से ज्यादा उभार लिये होता है ऐसे व्यक्ति चालाक व धूर्त होते हैं, तथा दूसरों को धोखा देने में पटु होते हैं। यदि किसी के हाथ में ये पर्वत दबा हुआ सा हो, ऐसे व्यक्ति अपना जीवन अभावों में बिताते हैं। यदि किसी हाथ में बुध पर्वत उभार लिये हुये हों तथा लिटिल फिंगर का सिरा नुकीला हो तो वे वाकपटु होते हैं, यदि उंगली का सिरा वर्गाकार हो तो ऐसे व्यक्ति तर्क-बुद्धि के धनी होते हैं।
 

बुध ग्रह के जपनीय मंत्र- 


वैदिक मंत्र-   

उद्बुध्यस्वाग्रे प्रति जाग्रहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेथामयं च।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत।।
 

पौराणिक मंत्र- 

प्रियगुंकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं  बुधम्।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्।।
 

बीज मंत्र-

ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
 

सामान्य मंत्र-

ॐ  बुं बुधाय नमः
 
इनमें से किसी एक मंत्र का श्रद्धापूर्वक एक निश्चित संख्या में नित्य जाप करना  चाहिए। जप की कुल संख्या 9000 तथा समय 5 घड़ी दिन है।

प्रिय पाठकों आपको ये आलेख कैसा लगा कमैंटस करके बताना ना भूलें, कोई त्रुटि, कमी या रह गयी हो तो अवश्य बतायें ताकि इस श्रृंखला के नये आलेख में मैं वह कमी दूर कर सकूं। 
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
ये आलेख भी पढ़ें : राशियों के अनुसार स्त्रियों का रंग, रूप व शारीरिक गठन कैसा होगा?

Vastu Tips: सुबह उठते ही क्या नहीं देखना चाहिए?

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हर कोई सुबह उठते ही चाहते हैं कि आज का दिन उसका अच्छा गुजरे, हम ना तो कोई ऐसा काम करना चाहते, ना ही कोई ऐसी चीज देखना चाहते हैं, जो हमारे पूरे दिन को खराब कर दे। साथियों वास्तु और ज्योतिष में कुछ ऐसी चीजें बतायी गयी है, जिन्हें हमें सुबह उठते ही नहीं देखना चाहिए, क्योंकि ये चीजें हमारे पूरे दिन को बर्बाद कर सकती है, आइये देखते है ये कौन सी चीजें हैं-
 

सुबह उठते ही क्या नहीं देखना चाहिए? 

 
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1-परछाई-

साथियों हमें सुबह उठते ही अपनी या फिर दूसरे की परछाई नहीं देखनी चाहिए, सुबह उठते ही परछाई देखने से हमारा पूरा दिन खराब हो सकता है, क्योंकि ज्योतिष में परछाई को राहु का संकेत माना जाता है। इसलिए इसे प्रातः उठते ही नहीं देखना चाहिए। 
 
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2-दर्पण या आईना-

साथियों! आपने बिल्कुल ठीक पढ़ा, हमें सुबह उठते ही आईना भी नहीं देखना चाहिए, कहां जाता है कि सुबह उठते ही आईना देखने से रात भर की नकारात्मक ऊर्जा परिवर्तित होकर हमारे अन्दर चली जाती है, जिस कारण पूरे दिन हमारे माइंड में नेगेटिविटी बनी रहती है।
 
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3-जूठे बरतन-

सुबह उठते ही हमें जूठे बरतन भी नहीं देखने चाहिए, इन्हे देखना भी शुभ नहीं माना जाता है, इसलिए वास्तु शास्त्र में कहा गया है कि रात में ही सारे जूठे बरतन साफ कर देने चाहिए, ताकि किचिन में प्रवेश करते ही जूठे बरतनों पर हमारी दृष्टि न पड़े।
 
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4-हिंसक जानवरों की तस्वीरें-

कभी-कभी हम अपने घरों में हिंसक पशु या जंगली जानवरों की तस्वीरें लगाते हैं, जो कि वास्तु की दृष्टि से उचित नहीं है, जिससे सुबह उठते ही हमारी दृष्टि इन तस्वीरों पर पड़ती है, जिससे हिंसक भाव अनायास ही हमारे मन में प्रवेश करने लगते हैं। अतः कम से कम हमें सुबह उठते ही इन तस्वीरों को नहीं देखना चाहिए, ये आपके पूरे दिन को खराब कर सकती हैं।
 
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5-बन्द घड़ी-

यदि आपके घर की कोई घड़ी बन्द है जो उसे तुरन्त ठीक करा लें, क्योंकि बन्द घड़ी हमारी उन्नति, तरक्की को रोकने का काम कर सकती है। सुबह उठते ही यह बन्द घड़ी हमें भूल कर भी नहीं देखनी चाहिए, ये हमारे पूरे दिन को खराब कर सकती है।
 

सुबह उठते ही क्या देखना चाहिए-

हमें सुबह उठते ही अपने दोनों हाथों की हथेलियों को आपस में रगड़ कर उन्हें देखते हुए निम्न श्लोक को बोलना चाहिए-
 

सुबह उठकर कौन सा मंत्र बोलना चाहिए 

 

काराग्रे वसतेे लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती
करमूले तू गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम्।
 
उसके बाद दोनों हथेलियों को अपने चेहरे पर लगाना चाहिए, फिर भूमि पर पैर रखने से पहले भूमि को छू कर अपने माथे से लगाते हुए निम्न मंत्र को पढ़ना चाहिए-
 
समुद्रवसने देवी पर्वतस्तन मंडले
विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।

उसके बाद मौसम के अनुसार ताजा या गर्मपानी पीकर अपनी दिनचर्या को प्रारम्भ करना चाहिए।
 

Mars Planet: मंगल ग्रह का वास्तु-ज्योतिषीय-हस्तरेखीय वर्णन

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मंगल ग्रह का भौतिक वर्णन-

सौर-मंडल में पृथ्वी के बाद मंगल ग्रह का चौथे  स्थान है। इसके तल की आभा लाल है, इस कारण इसे लाल ग्रह के नाम से भी जाना जाता है। इसका व्यास 6860 कि0मी0 है जो कि पृथ्वी के व्यास का लगभग आधा है।  मंगल ग्रह की पृथ्वी से दूरी 3 करोड़ 50 लाख मील है तथा मंगल सूर्य से 22 करोड़ 40 लाख कि0मी0 दूर है। यह अपने परिभ्रमण मार्ग पर 689 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है। मंगल की भ्रमण गति 45 दिन में 20 अंश या डेढ़ दिन में एक अंश होती है। इसका गुरूत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण का लगभग दसवें भाग के बराबर है। जिस प्रकार हमारी पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा घूमता है उसी प्रकार मंगल के चारों ओर दो चन्द्रमा घूमते हैं। मंगल जब पृथ्वी के निकटतम होता है तब वह पृथ्वी से लगभग 9.8 करोड़ कि0मी0 दूर होता है तथा इसके अध्ययन के लिए एक सही समय होता है। उस समय मंगल लाल मणि के समान दिखाई देता है। 
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मंगल ग्रह का पौराणिक विवरण-

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मंगल देव की चार भुजाएं हैं। इनके शरीर पर लाल रोंये हैं। इनके हाथों में अभयमुद्रा, त्रिशूल, गदा और वर की मुद्रा है। इनके शरीर पर लाल वस्त्र हैं तथा इन्होंने लाल रंग की मालाएं धारण की हुई हैं। मंगल के सिर पर सोने का मुकुट है, तथा इनकी सवारी भेड़ है।
 

मंगल ग्रह की पौराणिक कथा-

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार जब वाराह कल्प में हिरण्याक्ष राक्षस पृथ्वी को चुराकर ले गया। तब पृथ्वी माता का उद्धार करने के लिए भगवान ने वाराह अवतार लिया और पृथ्वी को हिरण्याक्ष के चंगुल से छुड़ाया और हिरण्याक्ष का वध किया। भगवान को देखकर पृथ्वी देवी के मन में उनको पति रूप में वरण करने की इच्छा हुई। पृथ्वी माता की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान अपने मनोरम रूप में प्रगट हुये, तथा पृथ्वी देवी के साथ एक वर्ष तक एकांत वास किया। पृथ्वी माता और भगवान के संयोग से मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई। इसलिए पौराणिक मंत्र में मंगल ग्रह को धरतीगर्भसंभूतम कहकर संबोधित किया गया है। 
 
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मंगल का वास्तु के अनुसार विवरण-

मंगल देव वास्तु में दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह दिशा पृथ्वी तत्व का प्रतीक मानी जाती है, दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं। यह दिशा कालपुरूष-वास्तुपुरूष के बायें सीेने, किडनी, बायें फेफड़े को प्रभावित करती है। यदि जन्मकुण्डली के हिसाब से देखें तो दक्षिण दिशा कुण्डली में दसवें घर का प्रतिनिधित्व करती है। इसी भाव से कालपुरूष के उपरोक्त अंगों का विचार भी किया जा सकता है। यह दिशा धन-धान्य, पशु-संपदा व सुख-शान्ति से संबंधित है। दक्षिण दिशा को कभी खाली नहीं छोड़ना चाहिए। यदि आपका भूखण्ड दक्षिणमुखी हो तो। इस दिशा में भार बढ़ाकर तथा उत्तर-पूर्व में भार कम करके, व उत्तर-पूर्व में दरवाजे-खिड़कियां बनवाकर काफी हद तक इस दिशा को लाभदायक बनाया जा सकता है। 
 

मंगल ग्रह का ज्योतिषीय विवरण-

नवग्रहों में मंगल को सेनापति की उपाधि दी गयी है। पारिवारिक रिश्तों में ये छोटे-भाई-बहनों का प्रतीक माने जाते हैं। मंगल का फारसी में मिरीख और अंग्रेजी में मार्स कहते हैं, हिन्दी में इन्हें भूमिसुत, कुज, अंगारक, रूधिर, आग्नेय, त्रिनेत्र, भौम आदि नामों से भी जाना जाता है। यह पुरूष रूप और उग्र माने जाते हैं। ये जन्मकुण्डली में जिस भाव पर बैठते हैं वहां से 4, 7 और आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं। मंगल मेष व वृश्चिक राशि के स्वामी हैं। ये सूर्य, गुरू व चंद्रमा को अपना मित्र तथा बुध को शत्रु मानते हैं। शुक्र, शनि व राहु से समभाव रखते हैं। ये मकर राशि में उच्च के व कर्क राशि में नीच के कहलाते हैं। ये क्षत्रिय जाति के हैं तथा मध्यान्ह में बलि होते हैं। तत्वों में ये अग्नि तत्व के प्रतीक माने जाते हैं। ये वृष और तुला लग्न वालों के लिए मारक ग्रह तथा कर्क व सिंह लग्न वालों के लिए मंगल योगकारक होते हैं, मीन लग्न में मंगल स्वयं मारकेश का कार्य न करके साहचर्य से फल देते हैं। इनकी महादशा 7 वर्ष की होती है। मंगल को भूमि पुत्र कहा जाता है । इनसे कुण्डली में वीरता, भाइयों, रोग, शत्रु, जमीन-जायदाद व भूमि संबंधी क्रिया-कलापों का अध्ययन किया जाता है। मंगल पुरूषों में शुक्राणुओं के कारक हैं इनकी कृपा के बिना पुत्र-संतान की प्राप्ति संभव नहीं है। इनकी कृपा प्राप्त होने पर ही जातक को पैतृक संपत्ति व भूमि से लाभ की प्राप्ति होती है। कुण्डली में गुरू के साथ होने पर सात्विक बन जाते हैं, व सूर्य के साथ होने पर राजभाव को बढ़ाते हैं वहीं यदि शनि के साथ हो तो जातक को मुकदमेंबाजी व बदनामी दिलाते हैं। यदि कुण्डली में ये 3,4,7,10,11 में स्थानबली होते हैं वहीं यदि कुण्डली में 1,4,7,12 वे भावों में हों तो जातक को मांगलिक बनाते हैं। शरीर में ये मांसपेशियों में निवास करतेे हैं। अंगों में इनका निवास स्थान नेत्रों में हैं। वनों का क्षेत्र इनके रहने का प्रिय स्थान है। तीखा मसालेदार इनका प्रिय भोजन है, और ग्रीष्म ऋतु इनकी प्रिय ऋतु है। मंगल की प्रिय धातु सोना है और ये मूंगा में निवास करते हैं।
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मंगल ग्रह का हस्तरेखीय वर्णन-

हथेली में जीवन रेखा के प्रारम्भिक स्थान के नीचे और उससे घिरा हुआ, शुक्र पर्वत के ऊपर जो फैला हुआ भाग है वहीं मंगल पर्वत है। (चित्र में देखिए) जिनके हाथ में मंगल पर्वत ह्ष्टपुष्ट व पूरी लंबाई लिए हुए होता है ऐसे जातक में धीरता व साहस इनका प्रधान गुण होता है। जीवन में अन्याय ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते, ऐसे व्यक्ति पुलिस विभाग या मिलिट्री में अत्यंत ऊंचे पद पर पहुंचते हैं। शासन करने का इनमें जन्मजात गुण होता है।
जरूरत से ज्यादा विकसित मंगल पर्वत व्यक्ति को दुराचारी, अत्याचारी तथा अपराधी बनाता है। साथ ही समाज विरोधी काम करने वाले भी हो जाते हैं, इनका स्वभाव लडाकू होता है, हर किसी से लड़ने, व अपनी मनमानी करने के ये आदी होते हैं।
 

मंगल ग्रह के जपनीय मंत्र-

वैदिक मंत्र-   

अग्र्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथ्व्यिा अयम् अपाॅं रेता सि जिन्वति।।
 

पौराणिक मंत्र-

धरणीगर्भसम्भूतं   विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। 
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम्।।
 

बीज मंत्र- 

क्रां क्रीे क्रौं सः भौमाय नमः

 

सामान्य मंत्र- 

अं अंगारकाय नमः
 
इनमें से किसी एक मंत्र का श्रद्धापूर्वक एक निश्चित संख्या में नित्य जाप करना  चाहिए। जप की कुल संख्या 10000 तथा समय प्रातः 8 बजे है।
प्रिय पाठकों आपको ये आलेख कैसा लगा कमैंटस करके बताना ना भूलें, कोई त्रुटि, कमी या रह गयी हो तो अवश्य बतायें ताकि इस श्रृंखला के नये आलेख में मैं वह कमी दूर कर सकूं। 
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
ये आलेख भी पढ़ें : राशियों के अनुसार स्त्रियों का रंग, रूप व शारीरिक गठन कैसा होगा?

लम्बी बीमारी से बचने के आजमायें हुए टोटके/उपाय


साथियों! टोटके का नाम सुनकर कुछ बुद्धिजीवी नांक-भौं सिकोड़ते हैं, और इन्हें अन्धविश्वास मानते हैं, हो सकता है ये उनकी नजर में हो, परन्तु मेरे विचार उनसे भिन्न हैं। वेद उक्ति है विश्वासो फलदायकः अर्थात विश्वास से ही फल की प्राप्ति होती है। वो हमारे माता-पिता हैं वो ईश्वर हैं केवल विश्वास ही है अन्यथा हमें क्या पता माता-पिता और ईश्वर का?? अतः विश्वासो वाली उक्ति पर ही विश्वास करके यदि आप ये उपाय करेंगे तो सफलता अवश्य मिलती है, अन्यथा कुछ नहीं है। 
 
 

लम्बी बीमारी से बचने के आजमायें हुए टोटके/उपाय

 
नीचे दिये गये उपायों को करने से पहले इस लेख के अंत में दी गयी कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, नहीं ये तो ये टोटके केवल टोटके ही रह जायेंगे इनका कोई प्रभाव नहीं पडे़गा।
 
1-अपने परिवार के सदस्यों की तुलना में कुछ अधिक मीठे पराठें बनाकर माह में एक बार कुत्तों को व कौओं को जरूर डाले, हो सके तो यह उपाय प्रत्येक माह की अमावस्या को करें।
 
2-सीताफल या कहिये पेठा जो अन्दर से खोखला हो वर्ष में चार बार किसी धर्म स्थान पर रखें। ये उपाय ऋतु परिवर्तन के समय करें, ज्यादा लाभ मिलेगा।
 
3-बीमार व्यक्ति के सिरहाने पांच का तांबे वाला सिक्का प्रत्येक रात्रि को रखें, सुबह उसे जमादार को दे दें। 
 
4-जब कभी भी आप श्मशान के पास से गुजरे तो कुछ पैसे श्मशान घाट के अंदर डाल दें, यदि बीमार व्यक्ति डालें तो और भी ज्यादा लाभ मिलता है।
 
5-यदि आप कान से संबंधित बिमारी से जूझ रहे हों तो काले-सफेद तिल, काले और सफेद कपड़े में बांधकर जंगल में किसी सुनसान स्थान पर दबा दें, लाभ मिलेगा।
 
6-यदि आप हाईब्लड प्रेशर की बीमारी से जूझ रहें हैं, (वैसे तो यह एक सामान्य बीमारी बनती जा रही है) तो रात में अपने सिरहाने पानी का गिलास भर कर रखें, और सुबह उस पानी को पौधों या गमलों में डाल दें, बहुत जल्दी लाभ मिलता है, एक बार आजमा कर अवश्य देखें।
 
7-यदि आप को आंखों में पीड़ा हो, वो ठीक ना हो रही हो, शनिवार के दिन 4 सूखे नारियल या फिर खोटे सिक्के बहते पानी या नदी आदि में प्रवाहित कर दें, लाभ मिलेगा।
 
8-शुगर, मूत्र रोग, जोड़ों के दर्द में काले कुत्ते को रोज दूध-रोटी आदि खिलायें लाभ मिलता है। इस उपाय को करने से शत्रु भी आपसे दूर रहने लगते हैं या कहिये डरने लगते हैं।
 
9-यदि किसी का ज्वर न उतर रहा हो पांच दिन लगातार गुड़ और जौ, सायंकाल पांच बजे के समय किसी मंदिर में रखें, इससे फोरन लाभ मिलता है।
 
10-किसी भी अस्पताल में बीमारों की सेवा करें या वहां पर धनादि का दान करना चाहिए।
 

ध्यान रखने योग्य बातें-

 

1-जिस उपाय (नं0 3,6,8) में दिनों के बारे में नहीं बताया है उन्हें कम से कम चालीस दिन लगातार करें। तभी इनका सही लाभ मिलता है।
 
2-उपायों/टोटकों को करते समय डाक्टर की दी गयी दवाईयां या सलाह का पूरी तरह पालन करना भी आवश्यक है, डाक्टर की सलाह व दवाईयों में कोई कोताई नहीं बरतनी चाहिए।
 
3-इन उपायों को करने से पहले या करने के बाद किसी को नहीं बताना चाहिए, यानि अनटोक किया जाना चाहिए। अन्यथा इनका प्रभाव समाप्त हो जाता है।
 
4-पीपल या श्मशान के बताये गये उपायों को करके वहां से जाते समय पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए।
 
5.इन उपायों में दो या तीन उपाय करें, इनमें से नित्य किये जाने वाले एक उपाय के साथ-साथ, कभी-कभी किये जाने वाले दो उपाय चुन लें।
 
अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए, नमस्कार! जय हिन्द!
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद्  मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
Image from Pixabay
 

घाघ भड्डरी की यात्रा शकुन पंर कहावतें

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प्रिय पाठकों! घाघ व भड्डरी की प्रसिद्ध कहावतें पुराने लोगों को कठंस्थ हैं, भड्डरी ने ज्योतिष, वर्षा आदि से संबंधित कहावतें कहीं हैं, वहीं घाघ ने नीति, खेती व स्वास्थ्य संबंधी कहावतें कहीं हैं। आज के आलेख में हम भड्डरी की शकुन संबंधी कहावतों पर चर्चा करेंगे। आशा करता हूं "घाघ भड्डरी की यात्रा शकुन पंर कहावतें"  भी आपके ज्ञान में वृद्धि करेगी।

सन्मुख छींक लड़ाई भाखै, पीठ पाछिली सुख अभिलाषै
छींक दाहिनी धन को नाशै, बाई छीक सुख सदा प्रकाशै
ऊंची छींक सदा शुभजानो, नीची छींक अधिक भय मानो
आपनु छीक महादुखदाई, कहें भड्डरी ज्योतिष बनाई।
भड्डरी कहते हैं कि सामने की छींक लड़ाई, पीछे की छींक सुखदाई, दाहिनी छींक से धन का नाश, बाएं छींक से सुख, ऊंची से लाभ, नीची से हानि और अपनी छींक से महादुख मिलता है।

नारि सुहागिन जल भर लावे दधि मछली सन्मुख सों आवे
समुहैं गाय पियावे बाछा यही सगुन है सबसे आछा।
भड्डरी कहते हैं कि यदि यात्रा करते समय सुहागिन स्त्री सामने से घड़ा भर के लाती हुई दिखाई दे, (आज के संदर्भ में कोई भी सामान लाने से लगा सकते हैं) या सामने से दही या मछली आ रही हो, या गाय बछड़े को दूध पिला रही हो तो यात्रा को जाते समय यह अच्छा शगुन है इसका मतलब है आपका काम सिद्ध होगा।

चलत समय नेउरा मिलि जाये बाम भाग चारा चखुं खाय
काग दाहिने खेते सुहाय, सफल मनोरथ समझहु भाय।
भड्डरी कहते हैं कि यदि यात्रा के समय नेवला मिल जाये या बाई ओर नीलकंठ चारा खा रहा हो या दाहिने हाथ की ओर कौवा खेत में दिखाई दे तो कार्य अवश्य सिद्ध हो जायेगा।

रवि ताम्बूल, सोम का दर्पन, भौमवार गुड़ धनिया चर्बन
बुद्ध मिठाई बीफै राई, शुक्र कहै मोहि दही सुहाई।
शनि को बाय विरंगहि खावे इन्द्रहुजीति पुत्र घर आवै।
भड्डरी कहते हैं कि किसी शुभ कार्य के लिए जाते समय रविवार के दिन पान खाकर, सोमवार को दर्पण देखकर, मंगल के दिन गुड़ और धनिया खाकर, बुद्ध के दिन मिठाई खाकर, गुरूवार को राई खाकर, शुक्रवार को दही खाकर तथा शनिवार को घृत खाकर यात्रा करें तो सफलता अवश्य मिलती है।

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भैंस पांच षट स्वान, एक बैल एक बकरी जान
तीन गाय तज सात प्रमान चलत मिलें मत करौ पयान।
भड्डरी कहते हैं कि यदि यात्रा के समय पांच भैंस या छह कुत्ते या एक बैल या एक बकरी या तीन गाय या सात हाथी दिखायी दें तो यात्रा पर नहीं जाना चाहिए।

सोम शनीचर पुरूबन चालू, मंगलबुद्धउत्तर दिशि कालू
जो बीफै को दक्खिन जाय निरपराधहू जूता खाय
बुद्ध कहै मैं बड़ो सयाना मोरे दिन जिनकरो पयाना
कौड़ी से नहिं भेंट कराऊं किन्तु कुशल से घर पहुंचाऊं
इक्का सुक्का पश्चिमवार, यात्रा को करिये न विचार।
भड्डरी कवि कहते हैं कि सोमवार तथा शनिवार को पूर्व दिशा में, मंगल व बुद्ध को उत्तर दिशा में, गुरूवार को दक्षिण दिशा में और रविवार शुक्रवार को पश्चिम दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए।

इकली हिरनी दुजै स्यार, भैंस चढ़न्ता पावे ग्वार।
तीन को सतक मिलि जाये तेली, तौ फिर मौत शीश पै खेली।
भड्डरी कवि कहते हैं कि यदि यात्रा के समय अकेली हिरनी मिले, दो स्यार मिले, ग्वाला भैंस पर चढ़ कर सामने से आ रहा हो और तेली भी मार्ग में मिल जाये तो यात्रा में निश्चित ही मृत्यु की संभावना होती है। अतः ऐसे में यात्रा को स्थगित कर देना चाहिए।

दिशा शूल ले जाओ बायें राहु योगिनी पूठ।
सम्मुख लेवे चन्द्रमा लावें लक्ष्मी लूट।
भड्डरी कवि कहते हैं कि दिशा शूल बांये राहु यामिनी पीठ पीछे और चंद्रमा को संमुख रखकर जो यात्रा करेगा उसे अधिक धन प्राप्त होगा।

पूरब मंगल कारी, अगिन कोन शुभ भारी
दखिनै छींक निडर हो जारी वायु कोन विरधै कै हारी।
पश्चिम छींक भोजन मिले, नैरित छींक विवादे करे।
उत्तर खूबै झगड़ा होय, ईशान धन प्रापति होय।
भड्डरी कवि छींक सगुन की पहचान पर कहते हैं कि छींक की पहचान यह है कि पूरब, अग्नि कोण और दक्षिण दिशा में होने वाली छींक शुभ है। वायव्य कोण, नैरूत कोण और उत्तर दिशा में होने वाली छींक अशुभ है तथा कलह कराने वाली होती है। पश्चिम दिशा की छींक से स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होता है। ईशान दिशा की छींक से धन प्राप्त होता है।

ऊंची छींक महासुखकारी, नीची छींक महाभयकारी।
अपनी छींक महादुखकारी, कह भड्डर जोसी समझाई
अपनी छींक राम बन गउऊं, सीता हरन तुरन्तै भयऊॅं।
भड्डरी कवि कहते हैं कि ऊंची छींक अच्छी होती है, नीची छींक अत्यंत भय को देने वाली है। अपनी छींक यात्रा के समय आ जाये तो महादुख को देने वाली होती है। भडडरी कहते हैं कि अपनी छींक आने के कारण ही राम का वनगमन हुआ था, जहां सीता जी का हरण होने के कारण उन्होंने अत्यंत कष्ट सहने किये।
संकलन-संजय कुमार गर्ग 

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चन्द्र ग्रह का वास्तु-ज्योतिषीय-हस्तरेखीय वर्णन

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चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है, पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी 3,84,000 किमी है। चन्द्रमा का गुरूत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण का 1/6 है। यानि ऐसी वस्तु जिसे पृथ्वी पर उठाना भी कठिन है, वहीं वस्तु चन्द्रमा पर एक गेंद की भांति हवा में उछाली जा सकती है। यह स्वयं प्रकाशित नहीं होते वरन् सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। चन्द्रमा प्रतिदिन पिछले दिन की अपेक्षा 53 मिनट देरी से उदय होते हैं। चन्द्रमा की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही पृथ्वी पर ज्वार-भाटा आते है। चन्द्रमा के उदय होने में प्रतिदिन 53 मिनट का अंतर होता है अतः ज्वार-भांटा भी एक स्थान पर पिछले दिन की अपेक्षा 53 मिनट देरी से आता है। माना किसी स्थान पर समुद्र में दोपहर 12 बजे ज्वार-भाटा आया है तो कल यानि अगले दिन ज्वार-भाटा 12 बजकर 53 मिनट पर आयेगा। इसी प्रकार आने वाले दिनों में इसका समय बढ़ता चला जायेगा। चन्द्रमा का आकार पृथ्वी के आकार का एक चौथाई है। सूर्य के बाद यह सबसे ज्यादा चमकदार ग्रह हैं। यह पृथ्वी की परिक्रमा 27 दिन 6 घंटे में पूरी करता है। इनकी औसत गति एक मिनट में एक अंश होती है।

चन्द्र का पौराणिक विवरण-

श्रीमद्भागवत के अनुसार चन्द्रदेव महर्षि अत्रि और अनसूया के पुत्र हैं। इनको सर्वमय कहा गया है। ये सोलह कलाओं से युक्त हैं। भगवान कृष्ण ने इन्हीं के वंश में अवतार लिया था। इसलिए भगवान श्री कृष्ण चन्द्र की सोलह कलाओं से युक्त थे। चन्द्रदेव का रंग गौर है। इनके वस्त्र, अश्व और रथ तीनों श्वेत रंग के हैं, ये सुन्दर रथ पर एक कमल के आसन पर बैठे हैं। इन्होंने सुन्दर सोने का मुकुट धारण किया हुआ है व गले में सोने की माला है। इनके हाथ में गदा तथा दूसरे हाथ से प्राणिमात्र को आशिर्वाद दे रहे हैं।

पौराणिक कथा-

हरिवंश पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने चन्द्र देव को बीज, औषधि, जल और ब्राह्मणों का राजा बनाया। इनका विवाह महाराज दक्ष की 27 पुत्रियों से हुआ था। ये 27 नक्षत्रों अश्विनी, भरणी, कृतिका आदि के रूप में जानी जाती हैं। इनके पुत्र का नाम बुध है जो तारा से उत्पन्न हुए हैं। ये 27 दिन में 27 नक्षत्रों पर भ्रमण करते हैं। पुराणों के अनुसार चन्द्रदेव का रथ वाहन है इस रथ में तीन चक्र हैं। इस रथ में दस घोड़े जुते रहते हैं, इन घोड़ों के नेत्र, कान श्वेत होने के साथ-साथ, इन घोड़ों का वर्ण भी श्वेत है।

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चन्द्र का वास्तु के अनुसार विवरण-

चन्द्र देव वास्तु में वायव्य दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह दिशा कालपुरूष के घुटने एवं हाथों की कोहिनी का प्रतिनिधित्व करती है। यदि जन्मकुण्डली के हिसाब से देखें तो पांचवा व छठा भाव वायव्य कोण का प्रतीक माना जाता है। पश्चिम-उत्तर दिशा के मध्य स्थापित यह दिशा वायव्य व्यवहारों के परिवर्तन में मित्र व शत्रुओं का कारण बन जाती है। अर्थात यह दिशा हमारे जीवन में शत्रुओं व मित्रों का प्रतिनिधित्व करती है। इस दिशा का प्रभाव घर की महिला सदस्यों के साथ-साथ तीसरी संतान पर भी पड़ता है। मुकदमें में हार-जीत पर भी यह दिशा प्रभाव डालती है। यह दिशा जहां अतुलित धन-सम्पत्ति का स्वामी बना सकती हैं वहीं दिवाला भी निकाल सकती है। वायव्य दिशा निवासी को साधु-सन्यासी, दार्शनिक तक बना सकती है।


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चन्द्रमा का ज्योतिषीय विवरण-

नवग्रहों में चन्द्र को रानी की उपाधि दी गयी है। चन्द्रमा को फारसी में महताब और अंगेजी में मून और हिन्दी में शशि, राकेश, हिमांशु, सारंग आदि नामों से भी जाना जाता है। यह वायव्य दिशा के स्वामी हैं, स्त्री रूप हैं और सौम्य ग्रह माने जाते हैं। ये जन्मकुण्डली में जिस भाव पर बैठते हैं वहां से सातवें भाव पर पूर्ण दृष्टि रखते हैं। ये सूर्य, बुध को अपना मित्र तथा राहु को अपना शत्रु मानते हैं। मंगल, गुरू, शुक्र व शनि से समभाव रखते हैं। कर्क इनकी स्वराशि है। ये वृष राशि में उच्च के तथा वृश्चिक राशि में नीच के होते हैं। चन्द्र द्विस्वभाव के ग्रह हैं यानि अकेले ही पाप और शुभ दोनों फलदायी बन जाते हैं। ये वैश्य जाति के माने जाते हैं और अपरान्ह में बलि होते हैं। रिश्तों में ये माता का प्रतिनिधित्व करते हैं। राजपाठ में ये रानी के पद को सुशोभित करते हैं। चन्द्रमा जल तत्व के ग्रह हैं। कुण्डली में इनसे जल, कफ, पाण्डुता आदि बीमारियों के साथ-साथ मानसिक बीमारियों का भी अध्ययन किया जाता है। छोटी यात्रा व विदेश यात्रायों आदि का कारण भी चन्द्रमा ही होते हैं। शीघ्रगामी व पृथ्वी के सबसे निकट ग्रह होने के कारण गोचर में मानव शरीर पर इनका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। ये ‘‘चन्द्रमा मनसो जातः’’ मन के कारक ग्रह हैं यानि जातक के मन पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं तथा शरीर में मानव-रक्त-परिभ्रमण का इनसे विशेष संबंध है। चांदी इनकी प्रिय धातु है और ये मोती में निवास करते हैं। इसलिए मोती के लिए अंगूठी चांदी की ही बनायी जाती है। इनकी महादशा 10 वर्ष की होती है।

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हस्तरेखा में चन्द्र का स्थान-

हथेली में कन की उंगली यानि लिटिल फिंगर के सबसे नीचे, भाग्य रेखा के बायीं ओर तथा मणिबंध के ऊपर का क्षेत्र चन्द्र क्षेत्र या चन्द्र पर्वत कहलाता है। जिनके हाथ में चन्द्र पर्वत पूरी तरह उभरा हुआ होता है वे प्रकृति प्रेमी तथा सौन्दर्य प्रेमी होते हैं। ऐसे जातक वास्तविक जीवन से हटकर स्वप्नलोक में ही विचरण करते हैं। जिनके हाथों में इसका अभाव होता है वे व्यक्ति कठोर ह्दय तथा पूर्णतः भौतिकवादी होते हैं। चन्द्र रेखा धनुष के आकार की होती है, यह चन्द्र क्षेत्र से प्रारम्भ होकर बुध पर्वत (लिटिल फिंगर के नीचे का क्षेत्र) तक जाती है। यह रेखा कम लोगों के हाथों में देखने को मिलती है। चन्द्र पर्वत से ही हम जीवन में यात्राओं तथा शारीरिक बीमारियों के बारे में अध्ययन करते हैं।

चन्द्र ग्रह के जपनीय मंत्र-


वैदिक मंत्र-

 इमं देवा असपन्तंसुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठयाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय।
इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानाॅंराजा।।

पौराणिक मंत्र-

दधिशड्तुषाराभं    क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्।।

बीज मंत्र-

ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः

सामान्य मंत्र-

ॐ सों सोमाय नमः

इनमें से किसी एक मंत्र का श्रद्धापूर्वक एक निश्चित संख्या में नित्य जाप करना  चाहिए। जप की कुल संख्या 11000 तथा समय संध्याकाल है।


प्रिय पाठकों आपको ये आलेख कैसा लगा कमैंटस करके बताना ना भूलें, कोई त्रुटि, कमी या रह गयी हो तो अवश्य बतायें ताकि इस श्रृंखला के नये आलेख में मैं वह कमी दूर कर सकूं।  

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.)