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Shattila Ekadashi 2025: षट्तिला एकादशी को "षट्तिला" क्यों कहते हैं?

Shat-Tila Ekadashi 2025: षट्तिला एकादशी को "षट्तिला" क्यों कहते हैं?
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि हे! दीनदयाल, जगत्पते! आपने मुझे पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी की सुन्दर कथा सुनाई। अब आप कृपा करके माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में भी बताइये, इस एकादशी का क्या नाम है? इसकी कथा भी हमें सुनाइये। इस व्रत को करने से क्या फल प्राप्त होता है, कृपा करके हमें बताइये।

भगवान श्री कृष्ण बोले! माघ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को षट्तिला एकादशी कहते हैं। इस दिन तिल से बने पदार्थों का दान करने से पाप नष्ट हो जाते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। अब मैं तुम्हे इस पुण्यदायी एकादशी का कथा विस्तार से सुनाता हूं, इस कथा को मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य ने दाल्भ्य को सुनाया था, ध्यान से सुनिए-

दाल्भ्य ने कहा हे मुनिश्रेष्ठ! मृत्यु लोक में रहने वाले प्राणि प्रायः अपने पापकर्मों में रत रहते हैं, जिस कारण उन्हें नरक में जाना पड़ता है, इन प्राणियों को नरक में ना जाना पड़े, ऐसा कोई उपाय बताइये?
ऋषि श्रेष्ठ पुलस्त्यजी ने कहा-हे दाल्भ्य! तुमने मृत्यु लोक के प्राणियों के हितकर बहुत सुन्दर बात पूछी है, मैं तुम्हे बताता हूं। 

माघ मास आने पर मनुष्य को प्रातः स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध हो जाना चाहिए, साथ ही काम, क्रोध, लोभ, अहंकार आदि का त्याग कर भगवान श्री हरि का स्मरण करना चाहिए। मनुष्य भगवन स्मरण करते हुए गाय के गोबर को जमीन से इकट्ठा करें, गोबर में तिल व कपास मिलाकर उसके 108 कंडे बनाये, उसके बाद माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करने का संकल्प लें। एकादशी के दिन भगवान श्री हरि की विधि विधान से पूजा करें। भगवान श्री हरि को पीले फूल, पीले रंग की मिठाई अर्पित करें।

Shattila Ekadashi 2025: षट्तिला एकादशी को "षट्तिला" क्यों कहते हैं?


इस एकादशी में तिलों का प्रयोग छः प्रकार से किया जाता है, इसी कारण इस एकादशी को षट्तिला एकादशी कहते हैं। तिलों का छः प्रकार से प्रयोग निम्न प्रकार करना चाहिए। 

1-तिल स्नान-

पानी में तिल को मिलाकर स्नान करना, तिल स्नान कहलाता है, अतः इस एकादशी का व्रत रखने वालों को तिल को पानी में मिलाकर स्नान करना चाहिए।

2-तिल का उबटन-

इस एकादशी का व्रत रखने वालों को इस दिन तिलों को पीसकर उन का उबटन यानि लेप बनाना चाहिए, तत्पश्चात उसे शरीर पर लगाकर स्नान कर लेना चाहिए।

3-तिल का हवन-

इस एकादशी का व्रत रखने वालों को सामग्री में तिल मिलाकर उनकी समिधा बनानी चाहिए और उस समिधा से हवन करना चाहिए। ये तिल का तीसरा प्रयोग है।

4-तिल का तर्पण-

सूर्य भगवान को जल देते समय, जल में तिल मिलाकर उन्हें अघ्र्य देना चाहिए, यह तिल का तर्पण कहलाता है। यह तिल का चौथा  प्रयोग है।

5-तिल का भोजन-

इस दिन व्रत रखने वालों व घर के अन्य सदस्यों द्वारा तिल से बने पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए। जैसे रेवड़ी, गजक, तिल के लड्डू, चावल आदि।

6-तिल का दान-

इस दिन तिल का दान भी किया जाता है, तिल का दान करने से मनुष्य पापकर्म से मुक्त हो जाता है, और उसे सुख, धन, धान्य तथा वैभव की प्राप्ति होती है।
इस प्रकार से तिल के ये छः प्रयोग सभी व्रत रखने वालों को करने चाहिए।

षट्तिला एकादशी का महत्व-

षट्तिला एकादशी का व्रत करने का शास्त्रों में अत्यंत महत्व बताया गया है, इस दिन भगवान श्री नारायण के साथ-साथ मां लक्ष्मी का भी पूजन करना चाहिए। भगवान श्री नारायण को व मां लक्ष्मी को तिल या तिल से बनी वस्तुओं का भोग लगाना चाहिए, षट्तिला एकादशी होने के कारण आज तिल का अत्यंत महत्व होता है, इस एकादशी में तिल का दान या फिर तिल से बनी वस्तुओं का दान करना भी अत्यंत पुण्यदायी होता है, ऐसा करने से मनुष्य को हर प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है, और उसे धन-धान्य, वैभव की प्राप्ति होती है।

षट्तिला एकादशी की व्रत कथा-

प्राचीन काल की बात है, पृथ्वी पर एक वृद्ध ब्राह्मणी रहती थी,  वह अपने जीवन में अनेक प्रकार के व्रत तथा पूजा आदि किया करती थी। एक बार उसने एक मास तक व्रत किया, उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था। परन्तु वह कभी भी देवताओं या ब्राह्मणों को दान नहीं दिया करती थी। भगवान श्री हरि से सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत करके आपने शरीर को तो शुद्ध कर लिया है, अतः अब इसे विष्णु लोक मिल ही जायेगा। परन्तु कभी किसी वस्तु या धनादि का दान न करने के कारण इसकी तृप्ति होना कठिन है। भगवान ने ऐसा सोचकर एक भिखारी का वेष धारण कर उस ब्राह्मणी के पास पृथ्वी पर पहुंचे और ब्राह्मणी के घर जाकर उन्होंने भिक्षा मांगी।

ब्राह्मणी ने ब्राह्मण का रूप धरे श्री हरि को नहीं पहचाना और उनसेे पूछा-महाराज आप यहां किस लिए आये हैं।

ब्राह्मण ने कहा-मुझे भिक्षा चाहिए?

इस बात को सुनकर ब्राह्मणी ने एक मिट्टी का ढेला उठाकर उनके भिक्षापात्र में डाल दिया। उसे लेकर श्री हरि स्वर्ग आ गये।

कुछ दिनों पश्चात ब्राह्मणी की मृत्यु हो गयी, और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। परन्तु ब्राह्मणी द्वारा मिट्ठी का ढेला दान देने के कारण स्वर्ग में उसे सुन्दर महल तो मिल गया, परन्तु  महल में अन्नादि की कोई सामग्री नहीं थी।

यह सब देखकर ब्राह्मणी घबरा गयी और भगवान श्री हरि के पास पहुंची और कहने लगी हे भगवन्! मैंने व्रतादि रखकर आपकी पूजा उपासना की, परन्तु फिर भी मेरा घर अन्नादि से खाली क्यों है?

तब भगवान नारायण ने उसे दान का महत्व बताया साथ ही षट्तिला एकादशी का व्रत करने और तिल दान करने के लिए कहा। ब्राह्मणी ने इस व्रत का पालन किया और तिलादि का दान किया, उसके पश्चात उसका महल भी सभी आवश्यक वस्तुओं से भर गया।

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि शट्तिला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, दरिद्रता समाप्त होती है, और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

बोलो श्री हरि नारायण की जय! हरि नमः हरि नमः हरि नमः।

भक्ति बीज उलटे नहीं, जो जुग जाय अनन्त
ऊंच नीच घर अवतरै,  होय  सन्त  का  सन्त।
कबीरदास जी कहते हैं कि, की गयी भक्ति के बीज कभी भी निष्फल नहीं होते, चाहे अनन्त  युग ही क्यों न बीत जाये। भक्ति करने वाला मनुष्य सन्त का सन्त ही रहता है, चाहे वो ऊंचे-नीचे माने जाने वाले किसी भी कुल में ही क्यों न जन्म ले ले।

तो  साथियों आपको ये कथा कैसी लगी, कमैंटस करके बताना न भूले, यदि कोई जिज्ञासा हो तो कमैंटस कर सकते हैं, और यदि आप नित्य नये आलेख प्राप्त करना चाहते हैं तो मुझे मेल करें। अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए नमस्कार जयहिन्द।

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद् 8791820546 (Whats-app)
sanjay.garg2008@gmail.com

संतुष्टि सबसे अनमोल है! (कहानी)

संतुष्टि सबसे अनमोल है! (कहानी)

एक ब्राह्मण और भाट में गहरी मित्रता थी। वे प्रतिदिन शाम को मिलते और अपने दुःख-सुख की बातें एक दूसरे से करते थे। एक दिन उन दोनों ने अपनी आर्थिक स्थिति से परेशान होकर कोई जल्दी पैसा कमाने के जुगाड़ के बारे में सोचने लगे।

भाट ने कहा-‘हम राजा गोपाल के दरबार में चलते हैं, अगर वे हमसे खुश हो गये तो हमारी आर्थिक दशा सुधर जायेगी।’

ब्राह्मण ने कहा-‘देगा तो कपाल, क्या करेगा गोपाल।’

भाट ने कहा-तुम गलत कह रहे हो, देगा तो गोपाल, क्या करेगा कपाल।

इस बात को लेकर ही दोनों में तीखी बहस हो गयी, वे दोनों लड़ते-लड़ते राजा गोपाल के ही दरबार में पहुंचे, और दोनों राजा को नमस्कार कर के, राजा से अपनी बात कह दी।

भाट की बात सुनकर तो राजा बहुत खुश हो गया, परन्तु ब्राह्मण की बात सुनकर ब्राह्मण से नाराज हो गया था। राजा ने उन दोनों से कल दरबार में आने के लिए कहा।

दूसरे दिन राजा ने ब्राह्मण को चावल, दाल और कुछ पैसे दिये तथा भाट को चावल, घी और कद्दू दिया और उस कद्दू के भीतर सोने के सिक्के भर दिया।

अब राजा ने दोनों से कहा-अब तुम दोनों जाकर खाना बनाकर खा लो, शाम को दरबार में फिर आना।
भाट और ब्राह्मण दोनों वहां से चले गये, और एक नदी के किनारे पहुंचकर दोनों खाना बनाने लगे। 

भाट ने ब्राह्मण की ओर देखा और सोचा राजा ने इसे दाल दी है और मुझे कद्दू पकड़ा दिया, इसे पहले छिलो, फिर काटो और फिर जाकर बनाओ और इसे खाने के बाद मेरी कमर में दर्द हो जायेगा सो अलग। इस ब्राह्मण के बड़े मजे हैं, दाल तो झट से बन जायेगी। इस बात को सोचते सोचते भाट ने ब्राह्मण से कहा-हे दोस्त! कद्दू तुम ले लो और मुझे दाल दे दो?

क्योंकि कद्दू खाने से मेरी कमर में दर्द हो जाता है। ब्राह्मण था सीधा-साधा संतुष्ट आदमी सो उसने उसे दाल दे दी और कद्दू उसे से ले लिया।

ब्राह्मण ने कद्दू छीलकर जैसे ही काटा तो उसमें से ढेर सारे सोने के सिक्के गिरने लगे, यह देखकर वह खुश हो गया, और उसने वे सोने के सिक्के एक कपड़े में बांध लिये और कद्दू की तरकारी बनाकर रख ली, लेकिन आधा कद्दू राजा को देने के लिए रख लिया।

शाम को दोनों जब राजा के दरबार में पहुंचे, तो राजा ने भाट की ओर देखा, लेकिन उसके चेहरे पर कुछ प्रसन्नता नहीं थी। यह देखकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ, इससे पहले राजा भाट से कुछ पूछता, उससे पहले ब्राह्मण ने आधा कद्दू राजा के सामने रख दिया।

राजा ने भाट की ओर देखा और भाट से पूछा? कद्दू तो मैंने तुम्हे दिया था? ये ब्राह्मण के पास कैसे आ गया?
भाट ने कहा-हां, दिया तो आपने मुझे ही था, लेकिन मैंने उससे दाल लेकर कद्दू उसे दे दिया।

राजा ने ब्राह्मण की ओर देखा तो ब्राह्मण ने मुस्कुराकर कहा-"दे ही तो कपाल, का कर ही गोपाल।"

संतुष्टि सबसे अनमोल है! कहानी से शिक्षा: संतोषी होने के कारण ब्राह्मण ने सोने के सिक्के प्राप्त किये, जबकि भाट असंतोषी होने के कारण प्राप्त सिक्कों को भी गवां बैठा। इसलिए कहा गया है संतोषी सदा सुखी।

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर  मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम पर उपयोग करना गैर कानूनी है ।)

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पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा (2025)

पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा (2025)

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि हे! भगवन् आपने मुझे पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी सुफला एकादशी की सुन्दर व मनोहर कथा सुनाई। अब आप कृपा करके पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में भी बताइये, इस एकादशी का क्या नाम है, और इसकी कथा भी हमें सुनाइये। इस व्रत को करने से क्या फल प्राप्त होता है, इसके बारे में भी हमें बताइये।

भगवान श्री कृष्ण बोले! पौष मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहते हैं । इस एकादशी में भी अन्य एकादशियों के समान भगवान श्री हरि नारायण की पूजा व व्रत किया जाता है। अब मैं तुम्हे पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा कहता हूं, ध्यान से सुनिए,

पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा (2025) 


भद्रावली नाम का एक राज्य था। वहां पर सुकेतु नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी पत्नि का नाम शैव्या था। उनके कोई संतान नहीं थी। इस कारण दोनों बहुत चिंतित रहते थे। यहां तक की उनके पितर भी रो रो कर पिंड लिया करते थे, उनके मन में एक ही चिंता रहती थी कि राजा के बाद हमें कौन पिंड देगा। राजा का अपने राज्य, धन, सम्पत्ति, भाई, बांधव आदि किसी से भी संतोष नहीं होता था। राजा को बस यही सोचता था कि मेरे बाद मुझे कौन पिंड देगा। पितरों और देवताओं का ऋण मैं बिना पुत्र के कैसे चुका पाउंगा? यह सब सोचकर राजा नित्य चिंतित रहता था, कि मैंने पूर्वजन्म में कौन से बुरे कर्म किये होंगे कि इस जन्म में मुझे पुत्र संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है। एक बार तो राजन ने अपने शरीर को त्यागने या आत्महत्या का भी निश्चय कर लिया था, परन्तु फिर आत्महत्या को महान पाप समझकर उसने ऐसा ना करने का निश्चय कर लिया।

एक दिन राजा ऐसा ही विचार करता हुआ, अपने घोड़े पर बैठकर वन की ओर चल दिया। वहां पर सुन्दर पक्षियों और हरे-भरे वृक्षों को देखने लगा। उसने देखा वन में अनेकों प्रकार के पशु-पक्षी अपने बच्चों के साथ घूम रहे हैं। वे कितने प्रसन्न हैं। पशु-पक्षियों को देखते-देखते वह खो सा गया। वह चिंतन करने लगा कि उसका पुत्र क्यों नहीं है? मैंने अनेक प्रकार के यज्ञ किये, ब्राहमणों को स्वादिष्ट भोजन से संतुष्ट किया, फिर भी मुझे पुत्र की प्राप्ति क्यों नहीं हुई, मुझसे अच्छे तो पशु-पक्षी ही हैं जो अपने बच्चों के साथ कितने प्रसन्न हैं।

वन में ऐसे ही विचार करते-करते राजा को आधा दिन बीत गया। उसे प्यास लगने लगी। वह पानी की खोज में इधर-उधर भटकने लगा। कुछ देर बाद राजा ने एक सरोवर देखा। उस सरोवर में अनेक कमल खिले हुए थे। सारस, हंस आदि के झूंड सरोवर में घूम रहे थे। उस सरोवर के चारों ओर मुनियों के आश्रम बने हुए थे। ये सब दृश्य देखकर राजा सुकेतु के बांये अंग फरकने लगे, एक अच्छा शकुन मानकर राजा घोड़े से उतरे और मुनियों को देखकर उन्हें साष्टांग दंडवत किया। राजा का नम्र और आदरपूर्ण व्यवहार देखकर मुनि अत्यंत प्रसन्न हुये। तब उन्होंने राजा से कहा, हे राजन! अपने मन की बात हमसे कहो, आप इस वन में अकेले कहां भटक रहे हों?

राजा ने हाथ जोड़कर पूछा-मुनिवर आप कौन हैं? इस सुन्दर स्थान पर किस लिए आये हैं? कृपया करके मुझे बताइये?

मुनि ने बताया-आज पौष मास की पुत्रदा एकादशी है, हम सभी व्रती हैं और सरोवर में स्नान करने के लिए आये हैं।

राजा ने कहा-मुनिवर! मेरे कोई संतान नहीं है, कृपया मुझे पुत्र प्राप्ति का वरदान दीजिए।

मुनि बोल-राजन्! आज पौष मास की पुत्रदा एकादशी है, आप इस व्रत को कीजिए, भगवान श्री हरि नारायण की कृपा आप पर अवश्य होगी, आपको पुत्र की प्राप्ति होगी।

मुनियों के वचन को सुनकर राजा ने वहीं मुनियों के आश्रम में रहकर पुत्रदा एकादशी का व्रत किया और द्वाद्वशी तिथि को व्रत का पारण करके अपने महल को लौट गये।

कुछ समय बीतने के बाद रानी गर्भवती हो गयी और 9 वें माह में उसने एक पुत्र को जन्म दिया। आागे चलकर वह बालक शूरवीर, प्रजापालक व यशस्वी राजा बना।

भगवान श्री कृष्ण ने आगे कहा- हे राजन! पुत्र की प्राप्ति के लिए, पौष मास की एकादशी का व्रत करना चाहिए। जो भी इस कथा को पढ़ता है, सुनता है और इस व्रत को करता है, उसे पुत्र का प्राप्ति होती है और अंत में वह विष्णु के धाम चला जाता है। 
बोलो श्री हरि नारायण भगवान की जय। हरि नमः हरि नमः हरि नमः

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग
तेरा  साईं  तुझ  में  हैं,  जाग  सके  तो  जाग।
कबीरदास जी कहते हैं कि जैसे तिल के अन्दर तेल होता है, और चकमक पत्थर के अन्दर आग होती है, उसी प्रकार ईश्वर भी हमारे अन्दर उपस्थित है, यदि तू देख सकता हो तो नींद से जाग कर उसे देख।

तो  साथियों आपको ये कथा कैसी लगी, कमैंटस करके बताना न भूले, यदि कोई जिज्ञासा हो तो कमैंटस कर सकते हैं, और यदि आप नित्य नये आलेख प्राप्त करना चाहते हैं तो मुझे मेल करें। अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए नमस्कार जयहिन्द।
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद् 8791820546 (Whats-app)
sanjay.garg2008@gmail.com

अंग्रेजी वर्ष की अंतिम एकादशी ‘‘सुफला एकादशी की कथा’’

https://jyotesh.blogspot.com/2024/12/angreje-varsh-ke-antim-ekadashi-saphala-ekadashi-katha-in-hindi.html

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से मोक्षदा एकादशी की कथा सुनने के बाद कहा! हे प्रभु ! आपने मुझे मोक्षदा एकादशी का कथा सुनायी, अब आप मुझे पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में भी बताईये, इस एकादशी का क्या नाम है? और इस एकादशी का व्रत करने से क्या फल मिलता है? इस एकादशी की कथा भी मुझे सुनाइये।
 
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-हे धर्मराज! पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी सुफला एकादशी कहलाती है। इस एकादशी का व्रत को करने से भगवान श्री हरि नारायण प्रसन्न होते हैं और वे भक्तों के जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं को समाप्त कर देते हैं, ऐसे विष्णु भक्त संसार के सभी दुःखों से मुक्त हो जाते हैं और अंत में भगवान विष्णु के लोक चले जाते हैं। अब मैं तुम्हे सुफला एकादशी का कथा सुनाता हूं-
 

सुफला एकादशी व्रत कथा-

पौराणिक काल में चम्पावती राज्य में महिष्मान नाम के राजा राज्य करते थे। राजा अत्यंत धर्मप्रेमी थे तथा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे। राजा का ज्येष्ठ पुत्र लुम्बक था। वह बड़ा ही कुकर्मी था और वह वैश्यावृत्ति और परस्त्रीगमन में लिप्त रहता था। वह न तो पूजा-पाठ करता था, बल्कि देवी-देवताओं पर अपमान जनक बातें करता था। राजा ने अनेकों बार उसे समझाया कि वह अपने कुकर्मो को त्याग दें, परन्तु लुम्बक अपनी आदत से बाज नहीं आया। अंत में राजा ने उसे देश से निकाल दिया।
 
अब लुम्बक जंगलों में रहने लगा और एक पीपल के पेड़ के नीचे उसने अपना ठिकाना बना लिया। वह आसपास के गांवों में चोरी करके अपना पेट भरने लगा। कभी कुछ नहीं मिलता तो वह जंगली जानवरों का शिकार करके उन्हे खा लिया करता था, परन्तु उसने अपने कुकर्मों को नहीं छोड़ा। समय बीतता गया, एक बार पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी की रात आयी। उस रात काफी ठन्ड थी। ठंड के कारण लुम्बक रात भर सो नहीं पाया, और अधिक ठंड के कारण वह बेहोश हो गया, और अगले दिन भी बेहोश रहा। परन्तु दोपहर में सूर्य की किरणों से उसकी बेहोशी टूट गयी और उसे होश आ गया। उसे भूख लगने लगी, शिकार करने की ताकत उसके शरीर में नहीं थी। अतः उसने जंगल में वृक्षों के नीचे पड़े फलों को इकट्ठा करना प्रारम्भ कर दिया, फलों को इकट्ठा करके वह पीपल के पेड़ के नीचे आ गया, जहां उसने अपने रहने का ठिकाना बना रखा था। उसने सारे फलों को पीपल के पेड़ के नीचे इकट्ठा किया और अपनी किस्मत को कोंसने लगा। अपने आप से रूष्ट होकर उसने वह फल स्वयं नहीं खाये और वहीं छोड़ दिये। उस दिन सुफला एकादशी थी, इस प्रकार उससे सुफला एकादशी का व्रत अनायास ही हो गया, जिससे भगवान श्री हरि प्रसन्न हो गये। एकादशी की रात्रि भी लुम्बक सर्दी के कारण नहीं सो पाया और पूरी रात उसने भगवान श्री हरि नारायण का नाम लेकर बितायी। इस प्रकार से बिना किये ही अनजाने में उससे सुफला एकादशी का व्रत हो गया। व्रत के प्रभाव से उसका मन बदल गया और वह धर्म के मार्ग पर चलने लगा।
 
कुछ समय बाद उसके पिता राजा महिष्मान को उसके सुधर जाने की खबर मिली तो राजा ने उसे अपने राज्य में वापस बुला लिया। पुत्र का सन्मार्ग पर चलते देख राजा महिष्मान ने उसे चंपावती का राजा बना दिया और स्वयं तप करने जंगलों में चले गये। गृहस्थ मार्ग पर चलते हुए लुम्बक को एक पुत्र हुआ। जब लुम्बक बूढ़ा हुआ तो लुम्बक ने अपने पुत्र को राजा बना दिया और स्वयं तप करने जंगलों में चला गया। जिस प्रकार भगवान श्री हरि ने लुम्बक का कल्याण किया उसी प्रकार हमारा भी कल्याण करें।
बोलो सत्य नारायण भगवान की जय! हरि नमः हरि नमः हरि नमः
 
कबीर  कुत्ता  राम का, मुतिया  मेरा  नाऊं
गलै राम की जेबड़ी, जित खैंचे तित जाऊं।

कबीर दास जी कहते हैं मैं तो राम का कुत्ता हूं और मोती मेरा नाम है, मेरे गले में राम की रस्सी बंधी हुई हैं, जिस ओर वे मुझे खींचते हैं मैं उसी ओर चला जाता हूं।
 
तो  साथियों आपको ये कथा कैसी लगी, कमैंटस करके बताना न भूले, यदि कोई जिज्ञासा हो तो कमैंटस कर सकते हैं, और यदि आप नित्य नये आलेख प्राप्त करना चाहते हैं तो मुझे मेल करें। अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए नमस्कार जयहिन्द।
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एक थी गुलाबो....! (पुनर्जन्म रहस्य कथा) अन्तिम भाग

https://jyotesh.blogspot.com/2024/12/ek-thee-gulabo-punarjanm-rahasy-katha-antim-bhag.html
कुलदीपक घर के अंदर ऐसे घुसता चला गया, जैसे वो वहां से कितना पुराना परिचित है, अपने कमरे में प्रवेश करते ही वह वहां खड़ी बहुओं को देख कर ठिठका......और फिर जोर से, मुंह-नजरें नीचे करके खांसा (पहले समय में ससुर, जेठ घर में अपनी उपस्थिति अपनी बहुओं को दर्शाने के लिए खांसते थे)।
 
गुलाबो......गुलाबो कहां होे तुम..................फिर वह जोर से बोला!
सारी बहुऐं एक ओर हो गयी, सामने उसकी पूर्वजन्म की पत्नि गुलाबो सिर पर पल्लू ढकेे बैठी थी।
 
एक अट्ठारह वर्ष के सुन्दर युवक को देखकर सारी बहुऐं चौंक पड़ी, क्या?? ये हमारे ससुर जी हैं?????????
 
अरे!! कलमुईयों....घुंघट निकालों....तुम्हारे ससुर जी आये हैं....वृद्धा ने नीची नजरें किये अपनी बहुओं से जोर से कहा!!
सभी बहुओं ने सिर पर पल्लू रखकर, बारी-बारी से कुलदीपक के पैर छूए, और कुलदीपक ने किसी बुजुर्ग की भांति उन्हें आशीर्वाद दिया।
कुलदीपक पलंग के पास पहुंचा और पलंग के एक ओर वृद्धा से थोड़ी दूरी पर बैठते हुए धीरे से डबडबाई आंखों को पौंछता हुआ बोला! गुलाबो....... कैसी हो... तुम???
 
वृद्धा की आंखे भर आयी, लड़खड़ाती आवाज और रूधें गले से बोली-जोरावर के पिताजी 18 साल प्रतीक्षा करायी आपने?? कहते हुए वृद्धा ने अपने झुर्रिदार हाथों से शरमाते हुए कुलदीपक का हाथ पकड़ लिया। (सास अपने पूर्वजन्म के पति का हाथ पकड़ने में संकोच कर रही थी, कदाचित् उसके संस्कार बहुओं के सामने पति का हाथ भी पकड़ने की अनुमति नहीं देते थे।)
 
मैंने कहा था ना.......आपके अंतिम समय में......मैं योगिनी हूं (योगी का स्त्रीलिंग) तुम जहां भी जन्म लोगे, मैं वहां से तुम्हे बुला लूंगी...वृद्धा अपने पति कुलदीपक का हाथ सहलाते हुए बोली!
और अब पुरानी सिकवे, शिकायतें कहीं सुनी जा रही थीं, बहुएं आश्चर्य से मुंह खोले कभी उस युवक की ओर देखती, तो कभी अपनी सांस की ओर देख रही थीं। अचानक कुलदीपक अपनी छोटी बहू की ओर मुड़ा..... और बोला-
भारतीऽऽऽ......कैसी है तूं......??? आज चाय नहीं पिलायेगी, इलायची, अदरक वाली????
अचानक अपना नाम कुलदीपक के मुंह से सुनकर व एकदम हड़बड़ा गयी.......जी......जी....पि.......पिता जी लाती हूं, वह एकदम वहां से भागी।
सुमित्रा....., यशोदा..... उनमें से दो बहुयें भी अपना नाम सुनकर चौंक गयी। तुम्हारे हाथ के आलू के परांठे, मक्खन, चटनी के साथ खाने का बहुत मन कर रहा हैं, अब कुलदीपक उन बहुओं की ओर मुंह करके बोला!!!!
 
अरे!!!! पिताजी को तो वास्तव में हमारे हाथ के आलू के परांठे बहुत पसंद थे, इन्हें कैसे पता चला???? हड़बड़ाई बहुओं ने कहा जी....!! जी..जी....पिताजीऽऽऽ.....और तेजी से वहां से चली गयी....
 
गुलाबों!!! मेरे बच्चों, पोत्रों-प्रपोत्रों-पोत्रियों-प्रपोत्रियों सभी को बुलाओ, मैं उनसे मिलना चाहता हूं, कुलदीपक ने वृद्धा से कहा!
 
तीसरा दृश्य
कमरे में कुलदीपक के पांचों पुत्र अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ बैठे हैं। कुलदीपक के साथ गाड़ी में आये तीनों व्यक्ति भी कमरे में, कुलदीपक के पिता के साथ उपस्थित थे। 
 
कुलदीपक बोला-बच्चों!! मैं पूर्व जन्म का तुम्हारा पिता हूं, ये मेरा दूसरा जन्म है। अधिकतर लोग पूर्व जन्म की स्मृति भुला देते हैं, परन्तु मैं नहीं भूला पाया, कदाचित् यह तुम्हारी मां का प्यार था, उसकी साधना थी, कि उसने मेरे पूर्वजन्म की स्मृति को विस्मरण नहीं होने दिया, जबकि मेरे इस जन्म के पिताजी ने लाखों प्रयास किये, फिर भी अपने पूर्वजन्म की याद मैं नहीं भुला पाया। इस बात को सुनकर कुलदीपक के इस जन्म के पिता की आंखों में भी आंसू आ गये। कुलदीपक आगे बोला-
मैं इस बात को प्रमाणित करने के लिए आपको पूर्वजन्म की किसी भी परमगुप्त बात को बता सकता हूं। आप मुझसे पूछकर देख सकते हैं।
मेरे बच्चों!! मैं तुमसे कुछ लेने या मांगने नहीं आया, मेरे इस जन्म के पिता इतने धनवान हैं कि मेरे पूर्वजन्म जैसे हजारों-लाखों ‘‘फतेह सिंह’’ (कुलदीपक का पूर्वजन्म का नाम) खरीद सकते हैं। मैं तो यहां केवल अपनी पत्नि के उस संकल्प को पूरा करने के लिए आया हूं जो उसने मुझसे मरते समय लिया था। कि ‘‘मुझे तुम्हारी गोद में ही दम तोड़ना है!’’
 
मेरे पुत्रों गीता में भगवान श्री कृष्ण ने लिखा है- 
"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।"
अर्थात जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, और मृत्यु के पश्चात पुर्नजन्म भी निश्चित है, इस अनिवार्य कार्य में तुम्हे हर्ष-विषाद नहीं करना चाहिए।
 
कुलदीपक की अनेकों प्रकार से उसके पुत्र-बहुओं ने परीक्षा ली, पूर्वजन्म से संबंधित प्रश्न पूछे उन सबका कुलदीपक ने शत-प्रतिशत सही उत्तर दिया।
अब वे आश्वस्त थे कि वास्तव में ये उसके पिता का पूर्नजन्म ही है।
वृद्धा गुलाबो कुलदीपक की गोद में सिर रखकर लेट गयी। उसकी सांसे तेजी से चल रही थीं। वृद्धा का अंतिम समय आ गया था। वह कुलदीपक का हाथ पकड़े हुये अपनी कंपकंपाती आवाज में बोली!!
क्या......क्या....आप चाहते हैं हम फिर एक हो?
 
हां......हां....... गुलाबो!!! मैं भी यहीं चाहता हूं...........पर ये कैसे संभव है??? कुलदीपक ने रूधे हुए गले से उसका हाथ पकड़ते हुए कहा!!
मैंने कहां था ना.... मैं योगिनी हूं......मरने के बाद फिर जन्म लूंगी.....और फिर तुम्हे अपने पास बुला लूंगी..........वृद्धा ने एक रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ उसका हाथ पकड़े-पकड़े कहा!!!!!
लेकिन तुम्हे प्रतीक्षा करनी होगी, वैसी......, जैसी.... मैंने तुम्हारे लिए की है?
बोलोऽऽ करोगे ना.........मेरी प्रतीक्षा..........या भूला दोगेऽऽ?? वृद्धा ने कुलदीपक के चेहरे पर प्रश्नवाचक दृष्टि डालते हुए पूछा!!
 
मैं संकल्प  लेता हूं, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा और जब तुम पुनः जन्म लोगी, तब तुम्हारे साथ ही विवाह करूंगा..........अन्यथाऽऽ....। कुलदीपक की बात को कांटते हुए वृद्धा बोली.........अन्यथा कुछ नहीं......। मैं पुनः तुम्हारी गुलाबो अगले जन्म में बनूंगीऽऽऽऽ कहते-कहते वृद्धा का सिर कुलदीपक की गोद में लुढ़क गया.................वो जा चुकी थी, पुनः जन्म लेने के लिए........
 
कहीं सुदूर गांव में एक स्त्री को प्रसव पीड़ा होने लगी......और उसने एक बच्चे को जन्म दिया। घर में बधाईयां बजने लगी, बधाई हो....., बधाई हो........, पांच भाइयों की बहना आयी है।
नवजात लड़की टकटकी लगाये चारों ओर देख रही थी, उसके चेहरे पर रूदन नहीं था बल्कि एक रहस्यमयी मुस्कुराहट थीं, मानोें कह रही हो.....
ये जो जनम-जनम का है साथ हमारा
हर जनम में मिले और बिछड़े हैं हम।
कदाचित् कथा समाप्त हो गयी????????
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम पर उपयोग करना गैर कानूनी है ।)

"जो वक्त-ए-खतना मैं चीखा तो..." अकबर के हास्य-व्यंग शेर
सूरदास के भ्रमर गीत की विशेषताएं क्या हैं?
"गजेन्द्र मोक्ष" पाठ की रचना क्यों हुई?
‘स्वर-विज्ञान’ से मन-शरीर-भविष्य को जानिए
एक कापालिक से सामना (सत्य कथा)
जब 'मुर्दा' बोला? एक बीड़ी म्हारी भी़......!
भूत?होते हैं! मैने देखें हैं! क्या आप भी.........?
जातस्य हि ध्रुवों मृत्युध्र्रुवं..........।(कहानी)
एक ‘बेटी’ ने ही सारा जहां सर पे………?
वह मेेरी "पत्नि" तो नहीं थी!! (रहस्य-कथा)
"रावण" ने मरने से इनकार कर दिया !
वह उसकी बेटी ही थी! (रहस्य कथा)
एक 'लुटेरी' रात !! (रोमांच-कथा)
एक मंकी मैन से मुकाबला?
आओ!! पढ़ें अफवाहें कैसी-कैसी!!!

एक थी गुलाबो...! (पुनर्जन्म रहस्य कथा)

https://jyotesh.blogspot.com/2024/12/ek-thee-gulabo-punarjanm-rahasy-katha.html
रायल्स राॅयल कार सड़क पर दौड़ रही थी। जिसमें चार लोग सवार थे, उसमें एक 18 साल का सुन्दर युवक बैठा था, हाथ में स्वीट्जरलैंड की घड़ी, गले में सोने की मोटी चैन, हाथ में हीरे की अंगूठी, शरीर पर महंगे विदेशी कपड़े, गाड़ी के फर्श पर लाखों रूपये का उसका एप्पल का फोन पड़़ा था, शायद वो उसकी सीट से छिटक कर गिर गया था। इन सभी विलासिताओं की चीजों में युवक की कोई रूचि दिखाई नहीं दे रही थी। वह गाड़ी की सीट पर अधलेटा पड़ा था और अपनी कोहनी विंडों पर टिकाये बाहर की ओर टकटकी लगाये देख रहा था। उसके चेहरे पर उदासी थी, लगता था इतनी महंगी विलासिता की चीजें भी उसके चेहरे पर खुशी-संतुष्टि-संतोष लाने में असफल थी। यह युवक था अरबपति-खरबपति सेठ करोड़ीमल का एकमात्र पुत्र, एक मात्र संतान।
 
गाड़ी के दूसरी ओर एक युवती बैठी थी, जो लगातार युवक के चेहरे को पढ़ने का प्रयास कर रही थी और उसे अपनी एक डायरी पर नोट कर रही थी। शायद यह युवती एक साइकेट्रिट थी। गाड़ी की अगली सीट पर एक छह-सात फुट का लंबा-चैड़ा हट्ठा कट्टा आदमी बैठा था, उसके हाथ में एक कारबाइन राइफल थी और कमर में एक पिस्टल लगी हुई थी। वह भी युवक को बार-बार अपनी कनखियों से देख रहा था। यह युवक का अंगरक्षक था। गाड़ीवान (ड्राइवर) एक बुजुर्ग व्यक्ति था, रोबिले चेहरे और बड़ी-बड़ी मूंछों वाला, वह गाड़ीवान भी अपने शीशे से उस युवक को बार-बार देख रहा था।
 
इस सुन्दर से युवक का नाम कुलदीपक था, समस्या यह थी, कि इस युवक को बचपन से ही अपने पिछले जन्म की स्मृति थी, चूंकि यह सेठ की एकमात्र संतान थी, अतः सेठ ने अपने पुत्र की पूर्वजन्म की याद मिटाने के लिए हर संभव उपाय किये, पूजा-पाठ, हवन, तंत्र-मंत्र, टोने-टोटकों के साथ-साथ सम्मोहन, हिप्नोटिज्म के आधुनिक उपाय तक किये, उसने कुछ नहीं छोड़ा, कुछ दिन ठीक रहने के बाद, फिर कुलदीपक को पूर्वजन्म की याद आने लगती थी, और वह अपने पुराने स्थान पर जाने की जिद करता था। उसका पुत्र पूर्वजन्म में अपना घर जिस क्षेत्र के गांव में बताता था, उस क्षेत्र से भी उस युवक को सैकड़ों किलोमीटर दूर रखा जाता था। परन्तु इंसान के करने से क्या होता है, होता वहीं है जो ईश्वर चाहता है, नियति हमें वही खींच ले जाती है, जहां उसे ले जाना होता है। जिस सड़क से उन्हें जाना था उस सड़क पर काम चलने के कारण वह सड़क बन्द थी, अतः ड्राईवर को गाड़ी दूसरे रास्ते से ले जानी पड़ रही थी।
 
अचानक कुलदीपक बाहर एक पुराना मंदिर देख कर चैंका और वह अपनी बाजू सीधी करके बाहर की ओर गौर से देखने लगा, दौड़ती गाड़ी से एक के बाद एक बाहर की चीजों को देखकर वह सचेत होकर सीधा बैठ गया और दूसरी ओर की विंडों से चैंक कर बाहर की ओर देखने लगा, गाड़ी एक गांव के पास से जा रही थी, अचानक वह जोर से चिल्लाया-गाड़ी रोको.........रोको...रोको!!!!!
 
चरररररर...........तेज आवाज के साथ गाड़ी रूकी। सबने उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा और गाड़ी रूकवाने का कारण जानने का प्रयास किया कि ...वह गाडी की सीट से साइकेट्रिट को एक साइड करता हुआ, तेजी से दरवाजा खोलकर बाहर निकला और जोर से चिल्लाया!!
यही है......यही है.......यही है मेरा गांव.............गुलाबोऽऽ........गुलाबोऽऽऽ..........गुलाबोऽऽऽऽ
वह चिल्लाता हुआ गांव के अंदर भाग गया। तीनों उसे पुकारते ही रह गये।
 
दूसरा दृश्य
एक बड़ा सा हाॅलनुमा कमरा है, जिसमें पुराने समय की सुन्दर सजावट हो रही है, सजावट ऐसी की आज की सजावट भी उसके सामने कुछ नहीं। पुराने समय के एक सुन्दर नक्काशीदार पलंग पर एक वृद्धा अधलेटी हुई है, उसकी आयु सौ वर्ष के आसपास होगी, उसके हाथ में गोमुखी-माला है, और वह मन ही मन जप कर रही है, उसको चारों ओर उसकी बहुओं ने घेरा हुआ है। कदाचित् यही गुलाबो है????
देखों....देखों वो आ रहे हैं.............वृद्धा अपनी अर्धउन्लिप्त आंखों से बड़बड़ाये जा रही थी, और जप की माला भी एक निश्चित लाय-गाल-गति से चल रही थी। 
 
मांजी आप आराम कीजिए, आप बहुत थक गयी हैं, उसी बड़ी बहू ने कहा!
नहीं......नहीं.....ऽऽऽऽ आज सोने का दिन नहीं है, आज वो आ रहे हैं, आज वो आ रहे हैं..........!!!! वृद्धा जोर से बोली!
अभी तक तो माॅजी कहती थीं, वो एक दिन जरूर आयेंगे, परन्तु आज कह रही हैं, वो आ रहे हैं..............लगता है मांजी की मानसिक स्थिति आज ज्यादा ही खराब हो गयी है-एक बहू ने दूसरी बहू के कान में फुसफुसाया।
 
मैंने कहा था ना, वो एक दिन जरूर आयेंगे..............देख लेना तुम सारी.........मैं पागल नहीं हूं.........वृद्धा ने अपनी बहुओं की ओर, अपने झूर्रिदार चेहरे के अंदर धंसी आंखों को निकालते हुए कहा!!!!
 
गुलाबोऽऽऽऽऽऽ  गुलाबोऽऽऽऽऽऽऽऽऽ कहां है तू गुलाबो????
अचानक हवेली के बाहर से तेज आवाज आयी।
आवाज सुन कर सारी बहुयें  चौंक गयी।
 
देखोंऽऽऽऽ देखोंऽऽऽऽ वो आ गये.......वो आ गये। वृद्धा जल्दी से एकदम सीधी बैठ गयी, और अपने शरीर पर पड़ी बेतरतीब साड़ी जल्दी-जल्दी ठीक करने लगी और जल्दी से सिर पर पल्ला ढक कर शतवर्षीय वृद्धा ऐसे बैठ गयी, जैसे कोई नवविवाहिता बहू बैठी हो।

अब उसकी पथरायी आंखे दरवाजे पर टकटकी लगा कर बैठ गयीं और सारी बहुओं की भी आश्चर्य मिश्रित दृष्टि दरवाजे पर टिक गयी
शेष कहानी कल पढ़िए............
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम पर उपयोग करना गैर कानूनी है ।)

"जो वक्त-ए-खतना मैं चीखा तो..." अकबर के हास्य-व्यंग शेर
सूरदास के भ्रमर गीत की विशेषताएं क्या हैं?
"गजेन्द्र मोक्ष" पाठ की रचना क्यों हुई?
‘स्वर-विज्ञान’ से मन-शरीर-भविष्य को जानिए
एक कापालिक से सामना (सत्य कथा)
जब 'मुर्दा' बोला? एक बीड़ी म्हारी भी़......!
भूत?होते हैं! मैने देखें हैं! क्या आप भी.........?
जातस्य हि ध्रुवों मृत्युध्र्रुवं..........।(कहानी)
एक ‘बेटी’ ने ही सारा जहां सर पे………?
वह मेेरी "पत्नि" तो नहीं थी!! (रहस्य-कथा)
"रावण" ने मरने से इनकार कर दिया !
वह उसकी बेटी ही थी! (रहस्य कथा)
एक 'लुटेरी' रात !! (रोमांच-कथा)
एक मंकी मैन से मुकाबला?
आओ!! पढ़ें अफवाहें कैसी-कैसी!!!
वह मेेरी "पत्नि" तो नहीं थी!! (रहस्य-कथा) 

"गजेन्द्र मोक्ष" पाठ की रचना क्यों हुई?

https://jyotesh.blogspot.com/2024/11/gajendra-moksh-ki-rachana-kyon-hui.html

श्रीमद्भागवत के आठवें स्कन्ध में गजेन्द्र मोक्ष कथा है। द्वितीय अध्याय में ग्राह और गजेन्द्र के युद्ध के बारे में बताया गया है। तीसरे अध्याय में गजेन्द्र द्वारा भगवान के स्तवन तथा गजेन्द्र मोक्ष का वर्णन है और चौथे अध्याय में गजेन्द्र और ग्राह के पिछले जन्मों के बारे में बताया गया है। तीसरे अध्याय का स्तवन सबसे ज्यादा लाभकारी है इसके बारे में स्वयं भगवान का वचन है कि ‘‘जो शेष रात्रि में यानि ब्रह्म मुहूर्त के प्रारम्भ के समय में जागकर इस स्तोत्र के द्वारा मेरा स्तवन करते हैं, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल मति (अपनी स्मृति) प्रदान करता हूं।’ और ‘अन्ते मतिः सा गतिः’ के अनुसार उस व्यक्ति को निश्चित ही भगवान की प्राप्ति हो जाती है और वह सदा के लिए जन्म-मृत्यु के बंधन से छूट जाता है। आइये अब देखते हैं कि गजेन्द्र मोक्ष की रचना क्यों हुई?

गजेन्द्र मोक्ष की रचना 


इंद्रद्युम्न राजा भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। उनके मन में ईश्वर भक्ति इतनी प्रखर हो गयी थी कि उन्होंने अपना राज्य पाठ त्याग दिया और ईश्वर की तपस्या में लीन हो गये। एक दिन इंद्रद्युम्न प्रातः स्नान आदि से निवृत होकर ईश्वर के ध्यान में बैठे थे। तभी वहां पर महर्षि अगस्त्य आये, राजा तो अपनी ईश्वर भक्ति में लीन थे अतः उन्हें महर्षि के आने का पता नहीं चला और उन्होंने महर्षि अगस्त्य को प्रणाम नहीं किया। यह देखकर महर्षि अगस्त्य क्रोधित हो गये उन्होंने इसे अपना अपमान समझा। उन्होंने राजा इंद्रद्युम्न को शाप दे डाला कि-‘‘ऋषि का अपमान करने वाले राजा तुम्हारी बुद्धि गज की तरह जड़ है, इसलिए तुम हाथी के रूप में जन्म लो।’’

इसी समय एक सरोवर पर हूहू नाम का गंधर्व जल में क्रीड़ा कर रहा था और स्नान कर रहा था। तभी ऋषि देवल स्नान करने के लिए सरोवर पर आये। गंधर्व ने उन्हें रोकने का प्रयास किया और उनके स्नान में व्यवधान उत्पन्न किया, जिससे ऋषि देवल क्रोेधित हो गये। ऋषि देवल ने हूहू गंधर्व को मगरमच्छ (ग्राह) के रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया।

इस प्रकार महर्षि अगस्त्य के शाप से राजा इंद्रद्युम्न ने हाथी के रूप में जन्म लिया और वो हाथियों के राजा गजेन्द्र बन गये। ऋषि देवल के शाप से हूहू ने भी मगरमच्छ बनकर जन्म लिया और वह सरोवर में ग्राह बनकर रहने लगा।

एक दिन गजेन्द्र उसी सरोवर मे पानी पीने के लिए आये। पानी पीकर वह जल क्रीड़ा करने लगे तभी गंघर्व हूहू बने मगरमच्छ ने गजेन्द्र का पैर पकड़ लिया। गजेन्द्र ने अपने पैर को छुड़ाने का पूरा प्रयास किया, परन्तु गजेन्द्र को सफलता नहीं मिली। गजेन्द्र दर्द से छटपटाता रहा, गजेन्द्र के अन्य साथी भी किनारे खड़े होकर उसे देखते रहे परन्तु वे गजेन्द्र की कोई सहायता नहीं कर सके। गजेन्द्र जितना बाहर निकलने का प्रयास करता, ग्राह उन्हें और अंदर की ओर खींच लेता। ग्राह तो जल का प्राणि था और जल के प्राणी जल में शक्तिशाली होते हैं अतः वह गजेन्द्र पर भारी पड़ रहा था। अतः गजेन्द्र का शरीर साथ छोड़ने लगा। 

गजेन्द्र ने अब अपनी आंखे मूंद ली और चुपचाप खड़ा रहा। तभी उसे पूर्वजन्म के संस्कार के कारण अपनी भक्ति का स्मरण होने लगा, और अब वह समझ गया कि भगवान के अतिरिक्त अब कोई उसकी रक्षा नहीं कर सकता। अतः उसने भगवान की शरण में जाने का निश्चय कर लिया। गजेन्द्र ने सोचा इस अंतिम समय में यदि प्राण की रक्षा भी नहीं हो पायी तो मुझे मुक्ति अवश्य मिल सकती है। अतः गजेन्द्र आंख मिचकर भगवान विष्णु का स्मरण करने लगा।

गजेन्द्र ने गरूड़ पर विराजमान भगवान विष्णु को देखा तो उसने कमल के फूल को अपनी सूंड में लेकर भगवान विष्णु की ओर उठाया और पीड़ा से कहा-

ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्।
पुरूषायादिबीजाय          परेशायाभिधीमहि।।
अर्थात जिनके प्रवेश करने पर ये जड़ शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं, ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीरों में प्रकृति एवं पुरूष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्वसमर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन प्रणाम करते हैं।

गजेन्द्र को इस तरह पीड़ा में भी स्तुति करते देख सुदर्शन चक्रधारी भगवान विष्णु, गरूड़ की पीठ से उतर आये और उन्होंने गजेन्द्र के साथ-साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर निकाला और अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह का मुंह काटकर गजेन्द्र को मुक्ति प्रदान की। इंद्रद्युम्न से गज बने, गजेन्द्र की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना पार्षद बना लिया। ऋषि देवल के श्राप से ग्राह बने गंभर्व हूहू की भी मुक्ति हो गयी। गंधर्व ने भगवान विष्णु की परिक्रमा कर प्रणाम किया और अपने गंधर्व लोक चला गया।

गजेन्द्र द्वारा की गयी यही स्तुति ‘‘गजेन्द्र मोक्ष पाठ’’ कही जाती है। इस प्रकार से गजेन्द्र मोक्ष नामक पाठ की रचना हुई जो आज संसारिक प्राणियों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।  बोलो लक्ष्मी नारायण भगवान की जय।

दो लाइनों के साथ कथा को विराम देता हूं-
सतगुरू  हमसु  रिझकर एक कहा  प्रसंग।
बरस्या बादल प्रेम का बीझ गया सब अंत।।

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद् मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
sanjay.garg2008@gmail.com

उत्पन्ना देवी एकादशी व्रत कथा (2024)

https://jyotesh.blogspot.com/2024/11/utpanna-devi-ekadashi-vrat-katha-2024.html

मार्गशीर्ष या अगहन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी
कहते हैं। इस एकादशी का दूसरा नाम उत्पत्ति एकादशी भी प्रसिद्ध है। इसी दिन मां एकादशी का जन्म हुआ था। इसलिए यह एकादशी उत्पन्ना देवी या उत्पत्ति देवी एकादशी भी कहलाती है। यह एकादशी पिछले जन्मों के पापों को समाप्त कर देती है। 

विष्णु पुराण के अनुसार यह एकादशी स्वयं अपने आप में भगवान विष्णु का स्वरूप मानी जाती है वैसे तो सभी एकादशियां भगवान विष्णु जो जगत के पालनहार हैं, उन्हीं का समर्पित हैं।

उत्पन्ना देवी एकादशी व्रत कथा (2024)

भगवान श्री कृष्ण ने कहा सतयुग में मुर नाम का एक राक्षस था, वह अत्यंत भयंकर तथा बलवान था। मुर राक्षस ने आदित्य, वायु, अग्नि, इन्द्र सहित सभी देवताओं को युद्ध में पराजित कर इन्द्रपुरी से भगा दिया। तब इन्द्रादि सभी देवताओं ने भगवान शिव से सारी बात बतायी कि सारे देवता राक्षस मुर के भय से आतंकित होकर मृत्यु लोक में घूम रहे हैं हमें राक्षस मुर से मुक्ति का उपाय बताइये। तब भगवान शिव ने देवताओं को जगत के पालनहार भगवान विष्णु के पास जाने के लिए कहा।

तब सारे देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और उनसे सारी बात बतायी। क्षीर सागर में निवास करने वाले भगवान विष्णु ने कहा-

हे इन्द्र! ये राक्षस कौन है इसके बारे में विस्तार से बताइये। तब इन्द्र ने कहा प्राचीन काल में नाड़ीजंघ नाम का एक राक्षस था। उसी का यह मुर नाम का पुत्र है यह चन्द्रावली में निवास करता है, इसी राक्षस मुर ने सभी देवताओं को हरा कर स्वर्ग से निकाल दिया है, स्वयं सूर्य बन गया है और स्वयं मेघ बन कर वर्षा करता है, यह वायु बनकर भी बहता है। यह अत्यंत शक्तिशाली है इससे हमारी रक्षा कीजिए।

इन्द्रादि देवताओं की बात सुनकर भगवान विष्णु मुर राक्षस से युद्ध करने के लिए चल दिये। भगवान विष्णु और मुर राक्षस में भयंकर युद्ध हुआ। परन्तु मुर पराजित नहीं हुआ। दोनों का मल्ल युद्ध भी हुआ, फिर भी मुर पराजित नहीं हुआ। पुराणों के अनुसार यह युद्ध दस हजार वर्षों तक चलता रहा। लेकिन मुर नहीं हारा। भगवान विष्णु अपनी थकान मिटाने के लिए बद्रिकाश्रम चले गये और योग निद्रा में सो गये। राक्षस मुर उनके पीछे-पीछे उसी गुफा में आ गया और योग निद्रा में सोये भगवान विष्णु का मारने के लिए उद्यत हुआ। लेकिन तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक कांतिमान रूपवती देवी प्रगट हुई। देवी ने मुर को युद्ध के लिए ललकारा, वह युद्ध के लिए उद्यत हुआ, और देवी ने राक्षस मुर को युद्ध में पराजित कर मार दिया।

जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से उठे तो उन्होंने मुर का मरा पाया, और देवी से सब बातों को जाना। उन्होंने देवी से कहा आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है अतः आप मां उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजी जायेगी मेरे सारे भक्त आपके भक्त होंगे और आपकी पूजा करेंगे। जो इस इस एकादशी का व्रत करेगा उसके पिछले जन्म के सारे पाप समाप्त हो जायेेंगे। 

बोलो लक्ष्मी नारायण भगवान की जय। हरि नमः हरि नमः हरि नमः

जात-पात  न  पूछे  कोई, 
हरि को भजे सो हरि का होइ
 
पिछली एकादशी की कथा भी पढ़ें- देवोत्थान एकादशी व्रत कथा!
पिछली एकादशी की कथा भी पढ़ें- रमा एकादशी व्रत कथा
पिछली एकादशी की कथा भी पढ़ें-पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा! 
"गजेन्द्र मोक्ष" पाठ की रचना क्यों हुई?

तो  साथियों आपको ये कथा कैसी लगी, कमैंटस करके बताना न भूले, यदि कोई जिज्ञासा हो तो कमैंटस कर सकते हैं, और यदि आप नित्य नये आलेख प्राप्त करना चाहते हैं तो मुझे मेल करें। अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए नमस्कार जयहिन्द।
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद् मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
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Ekadashi ki kahani : देवोत्थान एकादशी व्रत कथा!

https://jyotesh.blogspot.com/2024/11/dev-uthani-ekadashi-katha.html


कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान-देवउठनी एकादशी कहते हैं। देवउठनी एकादशी का दूसरा नाम प्रबोधनी एकादशी भी हैं इस संबंध में कथा है कि भाद्रपद की एकादशी को ही भगवान विष्णु शंखासुर नामक राक्षस से युद्ध करके उसेे मारकर भारी थकान महसूस करते हैं। इसलिए भगवान विष्णु शयन करने चले गये थे, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु की तद्रा टूटी थी, सभी देवताओं ने भगवान विष्णु की पूजा की इसलिए यह तिथि देवोत्थान एकादशी नाम से प्रसिद्ध है।

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को शालिग्राम व तुलसा जी का विवाह भी किया जाता है, देवोत्थान एकादशी के संबंध में यह कथा प्रसिद्ध है। आइये जानते हैं देवउठनी एकादशी की कहानी क्या है?


शिवमहापुराण में यह कथा आयी है-पौराणिक काल में दैत्यों का एक राजा था जिसका नाम दंभ था। वह असुर होकर भी विष्णु भक्त था। काफी समय तक उसके कोई संतान नहीं हुई तो उसने दैत्य गुरू शुक्राचार्य से परामर्श किया। दैत्य गुरू शुक्राचार्य ने उन्हें कृष्ण महामंत्र दिया, और पुष्कर सरोवर में जाकर तप करने का आदेश दिया। दैत्यों के राजा दंभ ने पुष्कर में घोर तपस्या की, जिससे करूणामयी भगवान श्री विष्णु प्रसन्न हुये, और दंभ को पुत्र प्राप्ति का वरदान देकर वहां से अंर्तध्यान हो गये। भगवान विष्णु के आशिर्वाद से राजा दंभ को पुत्र की प्राप्ति हुई। उसने पुत्र का नाम शंखचूड़ रखा। धीरे-धीरे समय बीतता गया, शंखचूड़ भी बड़ा हो गया। शंखचूड़ ने ब्रहमा जी की पुष्कर जाकर घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से ब्रहमा जी प्रसन्न हो गये और उससे महचाहा वरदान मांगने के लिए कहा।

शंखचूड़ ने कहा-वह हमेशा अजर-अमर रहे व कोई भी दानव-देवता या मनुष्य उसे मार न पाये। ब्रहमा जी ने उसे तथास्तु कहा और साथ ही कहा कि वह बदरीवन में जाकर धर्मध्वज की पुत्री तुलसा जी से विवाह कर ले, बदरीवन में तुलसा जी तपस्या कर रही थीं। शंखचूड़ ने ऐसा ही किया और बदरीवन जाकर तुलसा जी से विवाह कर लिया और तुलसा जी के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा।


शंखचूड़ ने अपने वरदान के बल से समस्त देवताओं, असरों, गंधर्वों, नागों, मनुष्यों आदि सहित तीनों लोकों में रहने वाले प्राणियों पर विजय प्राप्त कर ली और उन पर तरह-तरह से अत्याचार करने लगा।
उसके अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास गये, तब भगवान विष्णु ने बताया कि शंखचूड़ की मृत्यु भगवान शिव के हाथों होगी। तब सभी देव भगवान शिव के पास गये, भगवान शिव ने उनकी बातों को समझा और अपना दूत दैत्य के पास भेजा दिया, परन्तु शंखचूड़ ने देवों के राज्य को लौटाने से इंकार कर दिया और भगवान त्रिनेत्र से युद्ध करने के लिए कहा। 


भगवान शिव को जब दूत ने दैत्य शंखचूड़ का संदेश दिया तो भगवान शिव युद्ध के लिए तैयार हो गये और अपनी सेना को लेकर युद्ध के चल दिये, परन्तु तभी आकाश वाणी हुई कि जब तक शुखचूड़ के पास भगवान विष्णु का कवच है और उनकी पत्नि का सतीत्व अखण्डित है तब तक शंखचूड़ का वध नहीं किया जा सकता। तब भगवान विष्णु एक बूढ़े ब्राहमण का वेश बनाकर दैत्य शंखचूड़ के पास गये और उससे उसका कवच मांग लिया, दैत्य शंखचूड़ ने अपना कवच बूढ़े ब्राहमण का वेश धारण किये भगवान विष्णु को दे दिया। 

अब भगवान विष्णु ने अपनी माया से दैत्य शंखचूड़ का रूप धारण कर लिया और तुलसा जी के पास गये। उन्हें देखकर तुलसी बहुत प्रसन्न हुई, क्योंकि तुलसी ने उन्हें शंखचूड़ ही समझा। तुलसी ने उनकी चरण वंदना की व उनके साथ रमण किया। जिससे तुलसी का सतीत्व भंग हो गया।

उसके पश्चात भगवान शिव ने दैत्य शंखचूड़ के साथ युद्ध किया और युद्ध में उसे पराजित करके उसका वध कर दिया।
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तुलसी को अपने साथ हुये धोखे का पता चला कि वे उसके पति नहीं थे, और उन्होंने छलपूर्वक उसका सतीत्व नष्ट किया है। क्रोध में आकर तुलसी ने भगवान विष्णु का श्राप दिया कि आप पाषाण होकर धरती पर रहोगे। तब भगवान विष्णु पाषाण (शालिग्राम) बनकर पृथ्वी पर अवतरित हुए। क्योंकि तुलसी भगवान विष्णु की अन्नय भक्त थी इसलिए भगवान विष्णु ने तुलसी को आशीर्वाद दिया कि तुम वृक्षों में श्रेष्ण वृक्ष तुलसी बनकर पृथ्वी पर जन्म लोगी और सदैव मेरे साथ रहोगी।

तभी से यह परंपरा है कि भगवान विष्णु व तुलसी के विवाह संपन्न होने के बाद ही समस्त मांगलिक कार्य प्रारम्भ होते हैं। तो ये थी देवोत्थान एकादशी व्रत कथा!

जब मैं था हरि नहीं,  अब  हरि  है मैं  नाय,
प्रेम गली अति सांकरी, तां मैं दो ना समाय।

बोलो लक्ष्मी नारायण भगवान की जय। हरि नमः हरि नमः हरि नमः


तो  साथियों आपको ये कथा कैसी लगी, कमैंटस करके बताना न भूले, यदि कोई जिज्ञासा हो तो कमैंटस कर सकते हैं, और यदि आप नित्य नये आलेख प्राप्त करना चाहते हैं तो मुझे मेल करें। अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए नमस्कार जयहिन्द।
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद् 8791820546