अपने आप को बदलने की कला हैं- आत्मसम्मोहन


साथियों!! कहा जाता है कि प्रभावी उपदेश वह है जो वाणी से नहीं बल्कि आचरण से प्रस्तुुत किया जाये, ये बात हिप्नोटिज्म या सम्मोहन सीखने वाले साधकों पर भी लागू होती है, यदि वे दूसरों को सम्मोहित करना सीखना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हें स्वयं को सम्मोहित (
आत्म सम्मोहन) करना सीखना चाहिए, इसीलिए साथियों! दूसरों को सम्मोहित करने की विधि बताने से पहले मैं आपको स्वयं को सम्मोहित करने की कला सीखाना चाहता हूं। ताकि आपको ये पता चल सके कि किस प्रकार सम्मोहित हुआ जाता है, जाग्रत अवस्था से सम्मोहन की अवस्था में जाते समय कैसा लगता है, सम्मोहन के समय एक सम्मोहित व्यक्ति कैसा महसूस करता है और निद्रा तथा सम्मोहन की अवस्था में क्या अन्तर है।
आत्म सम्मोहन कैसे करें-
तो साथियों!! आप तैयार हैं, तो चलिए आगे बढते हैं-सबसे पहले एक शांत व एकांत कमरे का चयन कीजिए, जो कोलाहल से रहित हो, अब आप या तो आराम कुर्सी ले लें या बैड आदि पर लेट कर भी यह अभ्यास कर सकते हैं, हां नये साधकों को मैं आत्म सम्मोहन (आत्म सम्मोहन) का अभ्यास बैठ कर करने की सलाह नहीं दूंगा, क्योंकि यदि आप गहरी नींद या सम्मोहन की अवस्था में चले गये तो बैठे हुए आपको गिरने का खतरा हैं उससे आपकी गर्दन या रीढ़ की हडडी में चोट आ सकती है, अतः इसे लेटकर करना ज्यादा अच्छा है, यदि आप लेटकर कर रहे हैं या आराम कुर्सी पर बैठकर कर रहे हैं तो दीवार पर कही कोई काला बिन्दु इस प्रकार लगायें कि वह आपकी आंखों पर सीधा पड़े उसके लिए आपको अपनी गर्दन इधर-उधर न करनी पड़े, चाहे तो इस अभ्यास के लिए एक जीरो वाट का पीला-येलो बल्ब को देखकर भी यह अभ्यास कर सकते हैं, उस बिन्दु या बल्ब को कुछ देर लगातार देखतेे रहे, उसके बाद आंखे बन्द करके उस बिन्दु या बल्ब का मानसिक ध्यान करें, बार-बार उस बिन्दु या बल्ब को देखें और उसका मानसिक ध्यान करें, आप चाहें तो कोई कोई मधुर ध्वनि, मन्दिर की घंटियां आदि का भी ध्यान करके अपने को आत्म सम्मोहित कर सकते हैं, बिन्दु-बल्ब या फिर किसी भी ध्वनि की आवाज में अपने आप को समाहित करने या डूबो देने का प्रयास करें, डूबो देने का मतलब समझाने के लिए मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। जैसे कभी हम किसी अतिसुन्दर चित्र या किसी अति सुन्दर युवक या युवती को देखते हैं तो एकपल के लिए हम उसमें खो से जाते हैं, हम अपनी सुधबुध सी खो देते हैं, आप समझ रहे हैं ना मेरे कहने का तात्पर्य????? कोई युवक किसी सुन्दर युवती को देखकर, या कोई युवती किसी सुन्दर युवक को देखकर जिस प्रकार अपनी सुधबुध खो देती है, बिल्कुल ठीक ऐसी ही सुधबुध हमें आत्मसम्मोहन के समय खो देनी है, जब आप अपनी सुधबुध खोने लगो बस थोड़ा सा सावधान हो जाओं और अपने अवचेतन मन (बुद्धि) को जगाये रखो, अर्थात अपने चेतन मन (बाहरी मन) की गतिविधियों का ध्यान रखो कि वो क्या-क्या कर रहा है, बस चेतन मन को आपको सुलाना है, खुद नहीं सोना है, मैं आपको और स्पष्ट करता हूं, चेतन और अवचेतन दो जुडवां भाइयों की तरह है, इस आत्मसम्मोहन (आत्म सम्मोहन) की प्रक्रिया में बड़ा भाई अवचेतन मन, छोटे भाई चेतन मन को सुलाता है, और उसका ध्यान रखता है, याद रखो यदि बड़ा भाई अवचेतन मन (बुद्धि) भी सो गया तो फिर आप निद्रा में चले जाओेगे आत्मसम्मोहन में नहीं, इसमें ये बाते आपको विशेष ध्यान रखनी है कि अपने आप को सचेत रखना है जगाये रखना है सोना नहीं है, यदि सो गये तो आप स्वयं को सम्मोहित नहीं कर पायेगे। जैसे ही आपको अपना मन शांत लगने लगे, उसकी उछल-कूद बन्द हो जाये, और आपको अपना शरीर रूई की तरह हल्का महसूस होने लगे, तो समझिए आप सही रास्ते की ओर बढ़ रहे हैं, इस स्टेज पर अपने मन को सकारात्मक सुझाव या सजेशन दीजिए! यदि आपमें कोई दुर्गण है, कोई बुरी आदत है तो उसको सुधारने के लिए सजेशन दीजिए। यदि आपको लगता है कि आपके अन्दर कोई दुर्गण नहीं है तो अपने आप को निम्न प्रकार से सजेशन दे सकते हैं-
आत्म सम्मोहन सफलता की कुंजी-
मेरा मन की एकाग्रता बढ़ रही है, मैं अपने दैनिक कार्य बुरी लगन व ईमानदारी से कर रहा हूं।
जिन्दगी में आने वाली समस्याओं का मैं पूरी बहादूरी से सामना कर रहा हूं। मैं उनसे डरकर नहीं भागूंगा। आदि कोई भी सुझाव दिये जा सकते हैं।
याद रखें आपका ध्यान जितना गहरा होगा, आपकी उतनी ही गहरी पकड़ अपने अवचेतन मन पर होगी, और आप उतने ही गहरे और अमिट (न मिटने वाले) परिवर्तन अपने आप में कर सकते हैं।
अब आपके मन में ये प्रश्न भी कहीं कौंध रहा होगा कि हमें ये कैसे पता चलेगा कि हम आत्म सम्मोहित हुए भी हैं या नहीं। बिल्कुल साथियों!! मैं आपकी इस जिज्ञासा का भी समाधान कर देता हूं-इसके लिए आप अपने मन की कोई अच्छी या बुरी आदत को लिजिए, माना आपको प्रातः 8 बजे सो कर उठने की आदत है, तो आप आत्मसम्मोहन के अभ्यास में अपने मन को प्रातः 7 बजे उठने का आदेश या सजेशन दीजिए, और इस सजेशन को लगातार कुछ दिनों तक दीजिए, यदि आप की आंखे आटोमैटिक प्रातः 7 बजे खुलने लगे, भले ही आप 8 बजे ही उठो, परन्तु इससे आप इतना तो समझ ही सकते हैं कि मेरा आत्मसम्मोहन का अभ्यास सही दिशा में चल रहा है, गहरी सम्मोहन की अवस्था में यदि यही सुझाव दिया जायेगा तो आप चाहे  कितनी ही गहरी नींद में क्यों ना सो रहे हो आपको आपका अवचेतन मन प्रातः 7 बजे कान पकड़ कर उठा ही देगा। ऐसे ही छोटे-बड़े अभ्यास आप अपनी और आदतों के संबंध में कर सकते हैं, आप निश्चित ही अपने आप में बड़ा बदलाव महसूस करेंगे। ये एकदम से नहीं होगा इसमें समय लगेगा, समय आपकी विल पावर पर निर्भर करता है।
साथियों!! चेतन अवचेतन मन के बारे में मैं पिछल आलेख ‘‘सम्मोहन-हिप्नोटिज्म के कुछ रोचक रहस्य!!‘‘ में बता चुका हूं, इस को रिपीट करने की आवश्यकता नहीं है जिन्होंने यह आलेख नहीं पढ़ा वह टाइटल पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं तो साथियों!! आपको ये आलेख कैसा लगा कमैंटस करके जरूर बतायें अगले आलेख तक के अलविदा साथियों!! नमस्कार। जयहिन्द।
                          -लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com
  (नए-नए आलेख अपनी मेल पर फ्री प्राप्त करने के लिए अपना मेल-आईडी कमैंट्स बॉक्स में लिख कर कमैंट्स कर दें!!)
 

निर्जला एकादशी की व्रतकथा-महत्व || Ekadashi Vrat ki katha ||

https://jyotesh.blogspot.com/2023/05/nirjala-ekadashi-vrat-katha.htmlमहत्व-
यह एकादशी वर्ष की चौबीस एकादशियों में सब से महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इस ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का व्रत करने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। कलयुग में यह व्रत सारे सुख-वैभव देने के साथ-साथ अंत में मौक्ष देने वाला कहा गया है क्योंकि निर्जला एकादशी में एकादशी के सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन यानि द्वादशी के सूर्योदय तक यदि जल का त्याग किया जाये तो यह व्रत पूर्ण होता है। उदया तिथि के अनुसार, यह व्रत 31 मई 2023 बुधवार को रखा जाएगा।  
एकादशी की कथा-
एक बार महाबली भीम ने व्यास जी से पूछा हे पितामह! मेरे भाई युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल सहदेव और भाभी द्रोपदी के साथ-साथ माता कुंती मुझसे एकादशी का व्रत रखने के लिए कहती हैं। परन्तु पितामह मैं भगवान की पूजा-जप-पाठ सब कर सकता हूं और दान भी दे सकता हूं परन्तु भोजन के बिना नहीं रह सकता। मैं क्या करूं ? 
व्यास जी बोले-हे महाबली भीम यदि तुम नरक नहीं जाना चाहते, स्वर्ग जाना चाहते हो तो तुम्हे दोनों पक्षों की एकादशियों को भोजन नहीं करना चाहिए। 
भीम बोले-हे पितामह। मैं एक बार भोजन करके भी नहीं रह सकता तो फिर माह की दोनों एकादशियों का व्रत कैसे रख सकता हूं। मेरे उदर में वृक नाम की अग्नि हमेशा प्रज्वलित रहती है, जब मैं भोजन करता हूं तभी वह अग्नि शांत होती है इसलिए पितामह! मैं बहुत ज्यादा वर्ष में एक बार ही उपवास रख सकता हूं? अब मुझे वह मार्ग दिखाइये जिससे मैं नरकगामी न बनूं और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सके।
व्यास जी ने कहा-हे भीम ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन के लिए ही मुख में जल डाल सकते हों, इसके अलावा किसी भी प्रकार से जल ग्रहण न करें, नही तो तुम्हारा व्रत भंग हो जायेगा। एकादशी के सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन द्वादशी के सूर्योदय तक व्रती को जल ग्रहण नहीं करना चाहिए। तब यह व्रत पूर्ण होता है। अगले दिन यानि द्वादशी को प्रातःकाल में स्नानादि से निवृत होकर ब्राह्मणों को जल आदि यथाशक्ति दान दें, फिर ब्राह्मणों के साथ भोजन ग्रहण करें। वर्ष की समस्त एकादशियों के व्रत का फल इस निर्जला एकादशी से मनुष्य को प्राप्त होता है इसमें संदेह नहीं करना चाहिए। है कौन्तेय! जिस किसी ने श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है उन्होंने अपनी पिछली सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान श्री हरि के धाम पहुंचा दिया है ऐसा मानना चाहिए। हे भीमसेन! जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है वह सब पापों से मुक्त होकर श्रीहरि के धाम स्वर्ग चला जाता है। 
यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत किया, इसी कारण इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। बोलो लक्ष्मी नारायण भगवान की जय। 

मोहिनी एकादशी व्रत कथा 2023 || एकादशी व्रत कथा


वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 
(01 मई 2023) 
को मोहनी एकादशी के नाम से जानते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय मोहनी का अवतार लेकर, समुद्र मंथन से निकले अमृत को देवताओं को पिलाया था। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन एकादशी का व्रत रखने से तथा कथा का श्रवण करने से, एक हजार गायों का दान देने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है तथा भगवान विष्णु भक्त के हर संकट को हर लेते हैं।

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा-

      पौराणिक कथा के अनुसार सरस्वती नगर के तट पर भद्रावती नाम का एक नगर था। वहां द्युतिमान नाम के चंद्रवशी राजा राज्य करते थे। इसी नगर में धनपाल नाम का एक विष्णु भक्त वैश्य भी निवास करता था। वैश्य बहुत ही धार्मिक और धर्म-कर्म करने वाला था। उसने नगर में अनेक प्याऊ, भोजनालय, कुंए, तालाब और धर्मशाला बनवा रखे थे। नगर की सड़कों के किनारे अनेक छायादार व फलदार वृक्ष भी लगवा रखे थे। उस वैश्य के पांच बेटे थे। जिनके नाम सुमन, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि थे। उसका पांचवा पुत्र धृष्टबुद्धि बुरी आदतों वाला था। वह जुआ खेलता, मद्यपान करता और परस्त्री गमन में रत रहता था। उसके भाई माता-पिता उसकी बुरी आदतों से बहुत परेशान थे। अपने पुत्र के बुरे कामों से तंग होकर उसके पिता धनपाल ने धृष्टबुद्धि को घर से निकाल दिया। अब वह अपने गहने व कीमती सामान बेचकर अपना जीवन यापन करने लगा। धीरे-धीरे उसका धन समाप्त हो गया, अब उसके दोस्तों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। भूख-प्यास से परेशान होकर धृष्टबुद्धि ने चोरी करना प्रारम्भ कर दिया। लेकिन वह चोरी करते हुए पकड़ा गया। राजा ने उसे वैश्य पुत्र होने के कारण फिर चोरी न करने की चेतावनी देकर छोड़ दिया। परन्तु भूख-प्यास से तंग आकर धृष्टबुद्धि फिर चोरी करने लगा। फिर चोरी करते पकड़े जाने पर राजा ने उसे पकड़कर नगर से निकलवा दिया।
         अब नगर से भी निकाला मिलने पर धृष्टबुद्धि जंगल में चला गया। वहां उसने पशु-पक्षियों को शिकार करना शुरू कर दिया। जंगल में वह पशु-पक्षियों का शिकार करके अपना पेट भरने लगा। अब वह बहेलिया बना गया। एक दिन उसे जंगल में कोई शिकार नहीं मिला वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर जंगल में भटकते-2 कौडिन्य ऋषि के आश्रम पहुंच गया। उस समय वैशाख का माह चल रहा था। महर्षि गंगा स्नान करके अपने आश्रम में लौट रहे थे। महर्षि कौडिन्य के भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़े। छींटे पड़ने से उसे कुछ ज्ञान की प्राप्ति हुई। तब उसने महर्षि से हाथ जोड़कर कहा हे महर्षि! मैंने जीवन में बहुत पाप किये हैं, आप मुझे उन पापों से मुक्ति का कोई मार्ग बताइये। महर्षि कौडिन्य ने प्रसन्न होकर उसे मोहनी एकादशी का व्रत करने को कहा और बताया कि इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो जायेंगे। तब धृष्टबुद्धि ने महर्षि की बतायी विधि के अनुसार मोहनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गये और अंत में वह भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ को चला गया। इस व्रत की महिमा पढ़ने व सुनने मात्र से एक हजार गोदान करने का फल प्राप्त होता है। 
बोलों लक्ष्मी नारायण भगवान की जय!

नौ निधियां कौन सी है || नौ निधियों के नाम || नव निधियों के स्वामी कौन हैं?

नव निधियां कौन सी हैं!
हनुमान चालीसा
में कहा गया है कि ‘‘अष्ट सिद्धि नव निधी के दाता असबर दीन जानकी माता।’’ अर्थात रामभक्त हनुमानजी को माता सीता ने अष्ट सिद्धि और नौ निधियों का वरदान दिया था। हनुमान जी अपने भक्तों को अष्ट सिद्धियां और नव निधियां देने में सक्षम हैं। मित्रों इस आलेख में हम नव नीधियों पर चर्चा करेंगे।
मित्रों।। प्रत्येक व्यक्ति के धन प्राप्ति के साधन अलग-अलग होते हैं और उनका धन कमाने का उद्देश्य भी अलग-अलग होता है। धन कमाने के 3 तरीके हैं- सात्विक, राजसिक और तामसिक। सात्विक तरीके से कमाया गया धन अच्छा और सात्विक फल देता है और तामसिक तरीके से कमाया हुआ धन बुरा या तामसिक फल देता है। नौ नीधियां भी इन्हीं तीन प्रकार के गुणों में बंटी हुई हैं, तो आइये हम देखते हैं कि हमारे पास कौन सी प्रकार की निधि है या हम किस प्रकार से कमाई कर रहे हैं और वह हमारे पास कब तक रहेगी।
1. पद्म निधि : पद्म निधि के लक्षणों से संपन्न व्यक्ति सात्विक गुणों से युक्त होता है, और उसकी कमाई गई संपत्ति भी सात्विक होती है। सात्विक तरीके से कमाई गई संपदा पीढ़ियों तक चलती रहती है, इसका उपयोग साधक के परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। सात्विक गुणों से संपन्न व्यक्ति सोना-चांदी आदि का संग्रह करके उनका दान करता है। इस निधि का अस्तित्व साधक के परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहता है। 
2. महापद्म निधि : यह निधि भी पद्म निधि की तरह ही सात्विक होती है। इस निधि से संपन्न व्यक्ति भी दानी होता है। परन्तु इस निधि का प्रभाव 7 पीढ़ियों के बाद समाप्त हो जाता है।
3. नील निधि : इस निधि में सात्विक और राजसी गुणों का समावेश होता है। ऐसी निधि व्यापार द्वारा प्राप्त होती है इसलिए इस निधि से संपन्न व्यक्ति में दोनों ही गुणों की प्रधानता रहती है। हालांकि इसे मधुर स्वभाव वाली निधि भी कहा गया है। ऐसा व्यक्ति जनहित के कार्य करता है, परन्तु इस निधि का प्रभाव 3 पीढ़ियों के बाद समाप्त हो जाता है।
4. मुकुंद निधि : इस निधि में रजोगुण की प्रधानता रहती है इसलिए इसे राजसी स्वभाव वाली निधि कहा गया है। इस निधि से संपन्न व्यक्ति का मन भोग विलास में लगा रहता है। इसलिए वह अपने जीवन काल में ही इस निधि को समाप्त कर देता है, अर्थात यह निधि एक पीढ़ी के बाद समाप्त हो जाती है।
5. नंद निधि : इसी निधि में राजसी और तामसिक गुणों का मिश्रण होता है। माना जाता है कि यह निधि साधक को लंबी आयु व निरंतर तरक्की प्रदान करती है। व्यक्ति अपने क्षेत्र में निरन्तर प्रगति करता रहता है।
6. मकर निधि : इस निधि को तामसी निधि कहा गया है। इस निधि से संपन्न साधक अस्त्र और शस्त्र के बल पर धन का संग्रह करते हैं। ऐसे व्यक्ति राज्य और सरकार में हिस्से दारी रखते हैं, यह अपने शत्रुओं पर भारी पड़ते है और युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, लेकिन इनकी मृत्यु भी इसी कारण से होती है। 
7. कच्छप निधि : यह निधि भी तमोगुण से युक्त होती हैं, इसका साधक अपनी संपत्ति को छुपाकर रखता है। न तो स्वयं उसका उपयोग करता है, न ही किसी को करने देता है। वह कच्छप की तरह उसकी रक्षा करता है। 
8 . शंख निधि : इस निधि को पाने वाला व्यक्ति स्वयं की ही चिंता और स्वयं के ही भोग की इच्छा रखता है। वह कमाता तो बहुत है, लेकिन उसके परिवार वाले गरीबी में ही जीते हैं क्योंकि ऐसा व्यक्ति अपने धन को केवल स्वयं के लिये ही खर्च करता है। यह निधि एक पीढ़ी के बाद समाप्त हो जाती है।
9. खर्व निधि : यह निधि तमोगुण प्रधान निधि होती हैं। इस निधि से संपन्न व्यक्ति विकलांग होता है और सम्पत्ति को कमाने में कभी किसी को लूटने से भी परहेज नहीं करता।
साथियों! इस प्रकार हमने देखा कि सात्विक और राजसी गुणों से युक्त सम्पत्ति स्थायी होती है, परन्तु तामसिक गुणों से कमाई गयी सम्पत्ति अस्थायी होती है वह जितनी जल्दी आती है उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो जाती है। 
तो साथियों!! आपको ये आलेख कैसा लगा, कमैंट्स करके बताना  न भूले, अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए, नमस्कार, जय हिन्द।   लेखक : संजय कुमार गर्ग

एक कापालिक से सामना (सत्य कथा)

सौरभ अपने स्कूल में ऑफिस में बैठा हुआ था, ये उसका अपना स्कूल था जिसमें वह प्राचार्य था, उसके साथ उसके कुछ स्टॉफ के लोग भी ऑफिस में कुछ जरूरी काम कर रहे थे। तभी स्कूल के गेट से जोर की आवाज आयी....
अलख निरंजन........
सभी ने स्कूल गेट की ओर देखा।
एक साधु स्कूल के गेट से चलता हुआ ऑफिस के गेट पर आकर खड़ा हो गया। उसके पीछे कुछ लोगों की भीड़ थी, साधु एक लंबे कद का बिल्कुल स्याह काले रंग का था, शरीर पर गेहुएं बेतरतीब वस्त्र, गले में रूद्रांक्ष की मालाएं और उसके हाथ में एक इंसानी खोपड़ी थी। अपनी मोटी-मोटी लाल आंखों से उसने सभी को घूरा और जोर से बोला...
अलख निरंजन बच्चा...
सौरभ ने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया और अपनी अपलक दृष्टि उनके चेहरे पर जमाते हुआ बोला, आदेश महाराज!!!
इससे पहले वह साधु कुछ बोलता, साथ चली आ रही भीड़ में से एक बोला-ये महाराज, किसी के भी मन की बात बता देते हैं, या तक की किसी ने आज क्या खाया है, ये तक बता देते हैं, आप भी कुछ पूछिये सर जी......
ये सुन कर सौरभ ने अपनी तेज नजरें साधु के चेहरे पर जमायी और चुप रहा।
अचानक साधु बोला-क्या सोच रहे हो, तुम्हारे दरवाजे पर एक अंतरयामी कापालिक (तांत्रिक, श्मशान पर इंसानी कपाल के साथ साधना करने वाला) खड़ा है, आशीर्वाद नहीं लेगा??
सौरभ पुनः हाथ जोड़कर बोला-महाराज आदेश दीजिए, आप क्या खायेंगे, या चाय पीयेंगे?? वैसे मेरी अपने मन की बात जानने की कोई इच्छा नहीं है-सौरभ ने आगे कहा!
हम भारत भ्रमण पर हैं उसके लिए मुझे कुछ धन की सहायता चाहिए, मैं तेरे से 1100/- की भेंट चाहता हूं... कहते हुए कापालिक आगे बढ़ा और सौरभ के कान के पास चुटकी मारते ही भभूत प्रगट कर दी और सौरभ के हाथ में रख दी।
भीड़ ने विस्मित होकर ताली बजायी...
सौरभ एकटक साधु को देखते हुए उसके मन को पढ़ने का प्रयास करते हुए बोला-महाराज भारत भ्रमण के लिए आपको धन की क्या आवश्यकता है? आपसे कोई ट्रेन में टिकट नहीं मांगेगा, होटल ढाबे वाला आपको भोजन कराने से इंकार नहीं करते? फिर आपको धन की क्या आवश्यकता है? आप तो कापालिक हैं, कापालिक धन-दिखावे से दूर रहते हैं?
तू मुझे सीख दे रहा है? एक कापालिक को पढ़ा रहा है मास्दर! -लाल आंखों से घूरते हुए कापालिक ने सौरभ को घूरते हुए कहा!
सौरभ के स्कूल का एक अध्यापक कापालिक को बड़े ही आदर व जिज्ञासा भरी नजरों से देख रहा था, सौरभ कद्ाचित इस बात को भांप चुका था, उसने साधु से कहा-महाराज! ये हमारे शर्मा जी है, चलिए आप इनके मन की बात बताइये?
उस कापालिक ने अपनी लाल-लाल आंखों से शर्मा जी को देखा और बोला-बच्चा एक कॉपी पेंसिल निकाल लें, साधु के साथ आयी भीड़ उत्सुकतापूर्वक देखने लगी, जबकि सौरभ अपने काम में पुनः लग चुका था, क्योंकि ये बातें सौरभ के मन में उत्सुकता नहीं जगाती थीं, क्योंकि वो स्वयं साधक था।
स्कूल के अध्यापक शर्मा जी ने प्रसन्नतापूर्वक कॉपी पेंसिल निकाल ली और साधु की ओर देखने लगे।
आज आपने क्या खाया है? इस कॉपी पर पांच बार लिखो!
शर्मा जी लिखने लगे-साधु ने शर्मा जी पर अपनी दृष्टि जमा दी और बोला-दलिया खाया था ना आज तुमने बच्चा?
जी महाराज! शर्मा जी बोले! साथ आयी भीड़ ताली बजाने लगी।
अब अपने किसी पंसदीदा फल का नाम लिखो? कापालिक बोला!
शर्मा जी फिर लिखने प्रारंभ किया....
सेब.....? कापालिक बोला!
बिल्कुल ठीक महाराज! शर्मा जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा!
इसी प्रकार अनेक चीजों को उस कापालिक ने बताया, भीड़ उसकी प्रशंसा करते नहीं थक रही थी। सौरभ अपने काम में लगा हुआ था परन्तु वह मन ही मन सारी गतिविधियों को देख और समझ रहा था। अचानक कापालिक सौरभ की ओर बड़ा और सबको हाथ दिखाते हुए, सौरभ के माथे पर चुटकी बजायी और लाल रंग प्रगट कर दिया, लाल रंग सौरभ के माथे पर लग चुका था और सौरभ से बोला-तू कुछ नहीं पूछेगा मास्टर? अब कापालिक कुछ गुस्से में था।
आप वास्तव में अंतरयामी हैं, लीजिए चाय पीजिए-सौरभ ने कापालिक की ओर चाय बढ़ाते हुए विनम्रतापूर्वक कहा!
बस इतना सहयोग, तू लगता है मुझे नहीं पहचान पाया मास्टर! कापालिक अब और गुस्से में लग रहा था।
महाराज भारत भ्रमण के लिए, अब तो आपके पास पर्याप्त धन हो गया होगा, सौरभ ने भीड़ को ओर देखते हुए कहा?
सौरभ की ये बात सुनकर कापालिक सकपका गया और कनखियों से भीड़ की ओर देखते हुए बोला, परन्तु मैं तेरे मन की बात बताना चाहता हूं? तू क्या मुझे दस मिनट नहीं दे सकता, मास्टर? कापालिक बोला!
ठीक है महाराज! यदि आप यही चाहते हैं तो.....कहते हुए सौरभ ने अपना रजिस्टर एक तरफ रखा और शर्मा जी से कॉपी-पेंसिल ले कर बैठ गया और कापालिक की ओर देखने लगा!
बताइये महाराज आप क्या बताना चाहते हैं?? सारी भीड़ उत्सुकतापूर्वक एक-दूसरे के कंधे पर चढ़ने का प्रयास करने लगी, कद्ाचित कापालिक सौरभ की इच्छा शक्ति को पहचानने में गलती कर रहा था।
आज तुमने प्रातः क्या खाया? कागज पर पांच बार लिखो-कापालिक ने उत्साहपूर्वक कहा।
सौरभ ने पहले ही ये भांप लिया था कि कापालिक किसी व्यक्ति की मानसिक तरंगों को पढ़ सकता है, और ये क्षमता कोई भी स्त्री-पुरूष जप-ध्यान से अपने अंदर उत्पन्न कर सकता है, ये कोई चमत्कार नहीं है, ये एक मानसिक शक्ति है, जो हर किसी के अंदर है, आवश्यकता इसे जगाने भर की है। परंतु सौरभ इससे भी कुछ ज्यादा था, वह अपने मन को एक साथ अलग-अलग दो विषयों पर एकाग्र कर सकता था। जैसे गायत्री जप करने के साथ-साथ उसके अर्थ का मन ही मन चिंतन करना। 
सौरभ ने लिखना प्रारंभ कर दिया, सौरभ ने कागज पर ‘चना’ लिखा, परंतु दिमाग में ‘दलिया’ सोच रहा था...सौरभ में ये क्षमता थी, वह अपने मन को दो अलग-अलग धाराओं में नियंत्रित कर सकता था उसकी इस क्षमता के बारे में मैं अपनी दूसरी कहानी ‘‘वह उसकी पत्नि नहीं थी?’’ में भी बता चुका हूं।
कापालिक बोला-‘दलिया’ 
सौरभ ने कापालिक को इस प्रकार ‘चना’ लिखा हुआ कागज दिखाया कि कोई ओर न देख सके और जोर से चिल्लाया महाराज! बिल्कुल ठीक....आपने बिल्कुल ठीक बताया है..... और ‘चना’ लिखे हुए कागज को फाड़ कर फेंक दिया...भीड़ चिल्लायी वाह...वाह..महाराज!!
कापालिक ये देख थोड़ा खिसिया गया, परंतु अपनी खिसियाहट को दबाते हुए बोला.....अपनी पंसदीदा फल लिखो???
सौरभ ने फिर वैसा ही किया, मन ही मन ‘अनार‘ सोचते हुए उसने कागज पर ‘सेब’ लिखा।
कापालिक बोला-‘अनार’ अनार है ना? सौरभ ने फिर सबसे छुपाते हुए कापालिक को ‘सेब’ लिखा हुआ दिखाया और परचा फाड़ते हुए चिल्लाया, वाह...महाराज वाह...आपने बिल्कुल ठीक बताया है।
खड़े हुए लोग कापालिक की जयजयकार करने लगे, अब कापालिक के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी, उसने धीरे-धीरे मुस्कराते हुए, हाथ जोड़े बैठे सौरभ को देखा।
महाराज अब बस कीजिए....आप वास्तव में अंतरयामी हैं! 
नहीं......अब अपना पंसदीदा जानवर लिखिए और उस परचे को सबको दिखाइये--कापालिक अपने आपको जबरदस्ती संभालने की कोशिश करते हुए बोला।
परन्तु इस बार भी वहीं हुआ, कापालिक को सौरभ ने अपनी इच्छा शक्ति से धोखा दे दिया और वह सौरभ के मन को सही नहीं पढ़ पाया। 
महाराज! क्या परचा सभी को दिखाना है? सौरभ ने शरारती अंदाज में कापालिक से पूछा?
नहीं.....! सौरभ के हाथ से परचा लेकर फाड़ते हुए कापालिक ने सौरभ को आश्चर्य मिश्रित आंखों से देखते हुए कहा! अब कापालिक एकटक, अपलक दृष्टि से सौरभ की ओर देख रहा था।
अब सौरभ भीड़ से बोला, अब आप लोग यहां से जाइये, मुझे महाराज से बात करनी है, भीड़ धीरे-धीरे आपस में महाराज की प्रशंसा करते हुए वहां से चली गयी। अब सौरभ ने स्टॉफ को भी ऑफिस से बाहर भेज दिया, अब ऑफिस में सौरभ और कापालिक ही थे।
आपने ये कैसे किया?? और मेरी बेइज्जती भी नहीं होने दी, आप कौन हैं? क्या आप भी साधक हैं, गुरू जी... अब कापालिक के सुर बदल चुके थे, वो अब मास्टर से गुरू जी पर आ गया था। जबकि सौरभ अब भी कापालिक के आगे हाथ जोड़े बैठा था।
महाराज! मैं भी एक छोटा सा साधक हूं यहां स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ मैं लोगों को योग-मेडिटेशन आदि सिखाता हूं, मेरे अनेक साधक आंखों पर पट्टी बांधकर, पढ़ सकते हैं, बाइक व साइकिल चला सकते हैं। आप वास्तव में अंतरयामी हैं, इसमें दो राय नहीं है-मृदुभाषी सौरभ बोला। आपने मेरे मन की बात को सही पढ़ा, परन्तु आपने वही पढ़ा, जो मैंने आपको भेजा, परन्तु आप वह नहीं पढ़ पाये जो मैंने लिखा, क्योंकि लिखा हुये शब्द मैंने आपको भेजे ही नहीं.....आपने केवल मेरे भेजे संदेश को रिसीव किया, क्योंकि मैंने पहले ही भांप लिया था कि आप केवल संदेश रिसीव कर सकते हैं, भेज यानि सेन्ड नहीं कर सकते, जबकि महाराज! ईश्वरीय अनुकंपा से मैं संदेश पढ़ना और भेजना दोनों जानता हूं-सौरभ ने पुनः हाथ जोड़ते हुए मधुरवाणी में कापालिक से कहा।
यानी ‘टेलिपैथी’ ??? कापालिक बोला!
बिल्कुल सही महाराज!!! सौरभ ने कापालिक की ओर चाय बढ़ाते हुए कहा।
अब कापालिक बिल्कुल शांत हो चुका था, एक सांसारिक आदमी मुझसे बड़ा साधक है? अब कापालिक दुःखी था।
महाराज! ये साधनाएं जन्म-जन्मांतरों की साधनाएं होती हैं, हो सकता है, पिछले जन्म में मैंने उच्च साधना की हो, इसके परिणामस्वरूप मैं आज संसार में रहकर भी साधना कर पा रहा हूं-सौरभ ने कापालिक के मन में उमड़ रहे प्रश्न को भांपते हुए सांत्वना देते हुए कहा। यदि आप इन साधनाओं को पैसे कमाने या प्रदर्शन मात्र करने का साधन न बनाते तो हो सकता है आप बहुत बड़े साधक होते-सौरभ ने कापालिक को समझाते हुए कहा।
आपने मेरी आंखे खोल दी हैं, अब मैं भी अपनी साधनाओं का प्रदर्शन नहीं करूंगा और इनसे समाज की सेवा करूंगा, आपने मेरी आंखे खोल दी गुरू जी! कापालिक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
सौरभ ने कापालिक के हाथ जोड़कर, चरण स्पर्श किये और उन्हें दक्षिणा देकर, संतुष्ट करके वहां से विदा किया...क्योंकि वो भी किसी कापालिक का रूष्ट नहीं करना चाहता था।
(कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है, कथा का मनोरंजक व ज्ञानवर्द्धक बनाने के लिए उसे कहानी का रूप दिया गया है। कहानी के पात्र काल्पनिक हैं)  -लेखक : संजय कुमार गर्ग