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जोश मलीहाबादी के कुछ प्रसिद्ध शेर!

जोश मलीहाबादी के कुछ प्रसिद्ध शेर!

क्या शेख की खुश्क  जिन्दगानी गुजरी
बेचारे  की  एक  शब  न  सुहानी गुजरी
दोजख  के  तखय्युल  में  बुढ़ापा बीता 
जन्नत  की  दुआओं में जवानी गुजरी।
नरक,  कल्पना

*****00*****

मेरी  हालत  देखिये  और  उनकी सूरत देखिये
फिर निगाए-ए-गौर से कानून-ए-कुदरत देखिए
 आप  इक  जलवा  सरासर, मैं  सरापा इक नजर
अपनी  हालत  देखिए  और मेरी जरूरत देखिए
मुस्कुराकर  इस  तरह  आया  न कीजे  सामने
किस  कदर  कमजोर  हूं  मैं  मेरी  सूरत देखिए
थी खता  उन   की  मगर जब आ गए वो सामने
झुक गयी मेरी ही आंखें रस्म-ए-उल्फत देखिए।
सम्पूर्ण  शरीर,   प्यार की रस्म

*****00*****

जन्नत   के  मजों  पे जान देने वालों
गन्दे   पानी   में   नाव   खेने   वालो
हर   खैर  पे  चाहते   हो  सत्तर  हूरें 
ऐ  अपने  खुदा   से  सूद  लेने  वालों।
 नेकी

*****00*****

अल्फाज हैं नागन सी जवानी के डसे
अनफास  महकते  हुए होंठों  में बसे
यूं  दिल  को  जगा रहा है तेरा लहजा
जिस तरह सितार के कोई तार कसे।
सांस

*****00*****

जो चीज  इकहरी थी वो दोहरी निकली
सुलझी हुई जो बात थी उलझी निकली
सीपी  तोड़ी  तो  उससे  मोती  निकला
मोती  तोड़ा  तो  उसमें  सीपी  निकली

*****00*****

कल  मोतियों  को  रोल  दिया  साकी  ने
सोने   में   मुझे   तोल   दिया   साकी  ने
ये सुनके  कि खुलता नहीं मकसूदे-हयात
मैखाने  का  दर  खोल  दिया  साकी   ने।
जीवन का उद्देश्य

*****00*****

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब  चली  सर्द  हवा  मैं ने तुझे याद किया
इसका  रोना  नहीं  क्यों  हमें  बर्बाद किया
गम  तो  ये  है  बहुत  देर  से बर्बाद किया।


*****00*****

इस  कदर  डूबा हुआ दिल दर्द की लज्जत में है
तेरा आशिक अंजुमन ही क्यूं न हो खल्वत में है
जज्ब  कर  लेना  तजल्ली  रूह  की आदत में है
हुस्न को महफूज रखना इश्क की फितरत में है
महव  हो  जाता हूं अक्सर मैं कि दुश्मन हूं तेरा
दिलकशी किस दर्जा ऐ दुनिया तेरी सूरत में है।
तन्हाई, रोशनी, खो जाना

*****00*****
  
गर्दन     में    हैं    बाहें,    गर्दिश    में     हैं    पैमाने
क्या  दीन   है,  क्या  दुनिया,  शायर  की बला जाने
हम इश्क से क्या वाकिफ, वाकिफ हैं तो सिर्फ इतना
आगाज    हलाकत    है,    अंजाम     खुदा      जाने
ऐ   ‘जोश’   उलझता   है  क्यों शैख-ए-सुबुक-सर से
वो  इश्क  को   क्या  समझे, वो हुस्न को क्या जाने।
मौत, धर्मगुरू

संकलन-अनुवादक : संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com
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बशीर बद्र की 5 दर्द भरी गजलें!

बशीर बद्र की 5 दर्द भरी गजलें!



(1)

है अजीब शहर की जिन्दगी, न सफर रहा न कयाम है
कहीं कारोबार सी दोपहर, कहीं बदमिजाज सी शाम है

कहां अब दुआओं की बरकतें, वो नसीहतें, वो हिदायतें
ये जरूरतों का खुलूस है, ये मतालबों का सलाम है

यूूं ही रोज मिलने की आरजू बड़ी रख रखाव की गुफ्तुगू
ये शराफतें नहीं बे गरज उसे आप से कोई काम है।

वो दिलों में आग लगायेगा मैं दिलों की आग बुझाउंगा
उसे अपने काम से काम है, मुझे अपने काम से काम है

न उदास हो, न मलाल कर, किसी बात का न ख्याल कर
कई साल बाद मिले हैं हम, तिरे नाम आज की शाम है

कोई नगमा धूप के गांव सा, कोई नगमा शाम की छांव सा
जरा इन परिन्दों से पूछना ये कलाम किस का कलाम है।


बशीर बद्र की 5 दर्द भरी गजलें!















(2)

खुशबू की तरह आया वो तेज हवाओं में
मांगा था जिसे हमने दिन रात दुआओं में

तुम छत पे नहीं आए मैं घर से नहीं निकला
ये चांद बहुत भटका सावन की घटाओं में

इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है गजल जैसी
बिजली सी घटाओं में खुशबू सी हवाओं में

मौसम का इशारा है खुश रहने दो बच्चों को
मासूम मुहब्बत है फूलों की खताओं में

भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली
मजलूम परिन्दों की मासूम सभाओं में

दादा बड़े भोले थे सबसे यही कहते थे
कुछ जहर भी होता है अंग्रेजी दवाओं में।

बशीर बद्र की 5 दर्द भरी गजलें!













(3)

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया

कागज में दब के मर गये कीड़े किताब के
दीवाना बे पढ़े लिखे मशहूर हो गया

महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये
लेकिन जमीं से चांद बहुत दूर हो गया

तनहाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना      अहं
आईना बात करने पे मजबूर हो गया

सुब्हे विसाल पूछ रही है अजब सवाल
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया

कुछ फल जरूर आएंगे रोटी के पेड़ पर
जिस दिन मेरा मतालबा मंजूर हो गया।           मांग

बशीर बद्र की 5 दर्द भरी गजलें!













(4)

वो मिला नहीं तो मलाल क्या, जो गुजर गया सो गुजर गया

उसे याद करके न दिल दुखा जो गुजर गया सो गुजर गया

न गिला किया, न खफा हुए, यूं ही रास्ते में जुदा हुए
न तू बे वफा, न मैं बे वफा, जो गुजर गया सो गुजर गया

वो गजल की कोई किताब था, वो फूलों में एक गुलाब था
जरा देर का कोई ख्वाब था, जो गुजर गया सो गुजर गया

मुझे पतझड़ों की कहानियां न सुना सुना के उदास कर
तू खिजां का फूल है मुस्कुरा, जो गुजर गया सो गुजर गया

वो उदास धूप समेट कर कहीं वादियों में उतर चुका
उसे अब न दे मिरे दिल सदा, जो गुजर गया सो गुजर गया

ये सफर भी कितना तवील है, यहां वक्त कितना कलील है        लंबा,    छोटा
कहां लौट कर कोई आयेगा, जो गुजर गया सो गुजर गया

बशीर बद्र की 5 दर्द भरी गजलें!


(5)


वो प्यासे झोंके बहोत प्यासे लौट जाते हैं
जो दूर-दूर से बादल उड़ा के लाते हैं

कोई लिबास नहीं दिल की बे लिबासी का

अगरचे रोज नहीं चादरें चढ़ाते हैं

सितारे खोए हुए बच्चे हैं जिन्हें अक्सर
वो साथ खेले हुए दोस्त याद आते हैं

कसीदा हुस्न का और हुस्न को सुनाओगे
बताओ फूल को खुशबू कहीं सुंघाते हैं

सितारा बन के भटकते हैं सारी सारी रात
जो वादा करके वफा करना भूल जाते हैं

गुलाब सा वो बदन क्या हवाए दर्द में तो
घने दरख्तों के जंगल भी सूख जाते हैं

हमारे शेर गुनाहे जमीं का वो नगमा हैं
जिसे फलक के फरिश्ते भी गुनगुनाते हैं।

संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com
मुक्तक/शेरों-शायरी के और संग्रह 
प्यास वो दिल की बुझाने कभी.....मुक्तक और रुबाइयाँ !

गोपाल दास "नीरज" के सदाबहार मुक्तक!

गोपाल दास "नीरज" के सदाबहार मुक्तक!

चांदनी क्या है कि बदसूरत तिमिर की प्रियतमा है
और  हर  एक  दीप, अंतिम  रूप में  केवल धुंआ है
मत  करो  अपमान, आंखों  में घुमड़ते  अश्क  का
जिन्दगी  कहते जिसे कुछ आंसुओं का तर्जुमा है।

****----****

सुख की दीवाली तो तम से ही सदा मनती है
कीचड़ों  से  ही  कमल  सारी  जमीं चुनती है
पुण्य का नाम ही केवल न किताबों में लिखो
कुछ  गुनाहों से  भी दुनिया हसीन बनती है।

****----****

सपने  गये   सपनों   के   खरीददार    गये
झंकार    गयी,    गीत    गये,    तार   गये
तुम उठके जो महफिल, से चले आधी रात
रोते   हुए    सब    तारे    समझदार   गये।

****----****

रूख  चलती  हवाओं का बदल जाता है
कन्दील-सा  माहौल  में   जल जाता है
शरमा  के  झुका  लेते  हैं  परबत आंखें
पल्लू जो तेरा सिर से फिसल जाता है।

****----****

कफन  बढ़ा  तो  किसलिए  नजर  तू  डबडबा  गयी
सिंगार  क्यों  सहम  गया,  बहार  क्यों  लजा  गयी,
न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ, बस इतनी सिर्फ बात है
किसी की आंख खुल गयी, किसी  को नींद आ गयी।

****----****

हर  स्वप्न  है रो-रो के सुलाने के लिए
हर याद है घुल-घुल के भुलाने के लिए
जाती  हुई  डोली  को  न  आवाज लगा
इस गांव में सब आये हैं जाने के लिए।

****----****

जीवन  ने  कहा,  बहता  हुआ  जल  हूं मैं
तो  आ  के  मरण  बोला,  मरूस्थल हूं मैं
पर  आंख  से  जब  प्यार के आंसू दो गिरे
कण-कण यह पुकार उट्ठा कि बादल हूं मैं।

****----****

उन गोरे कपोलों पै यह तिल की शोभा
भौंरा कोई  सोया  हो  कंवल  पर  जैसे
मेहंदी  से  रची  उफ् वह हथेली सुन्दर
अंगार  तिरा  दे  कोई  जल  पर   जैसे।

****----****

हर नजर साधू नहीं है, हर बशर गांधी नहीं है
वस्त्र हर रेशम नहीं है, सूत हर खादी नहीं है
नीति को लेकर कसौटी मत कसो इंसान को
आदमी है आदमी, सोना नहीं,  चांदी नहीं है।

****----****

सपने हैं घरौंदे  कि  बिखर  जाते हैं
मौसम हैं परिन्दे कि न बंध पाते हैं
तू  किसको बुलाता है खड़ा पानी में
गुजरे हुए दिन लौट के कब आते हैं।

संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com
मुक्तक/शेरों-शायरी के और संग्रह 
प्यास वो दिल की बुझाने कभी.....मुक्तक और रुबाइयाँ !

ओमप्रकाश आदित्य के खट्टे-मीठे और तीखे मुक्तक!


गुण को गंगू का है आसरा

राजनैतिक  पतन   देखिये
कोई पत्थर  कोई  कोयला
भोज के  नवरतन देखिये।

*****

दिन का मालिक है मिल का नहीं
क्यों    करें   सूर्य    की   वन्दना
सायरन    से    मिली     है   हमें
भोर   होने    की   शुभ   सूचना।

*****

कवि को रोटी न दो पेट भर
वर्ना  खाकर वो सो जायेगा
पेट   में   दर्द    पैदा    करो
गीत का  जन्म हो जाएगा।

*****

धन   के   संकेत   हैं    और    हम
मस्ती क्या, मान क्या, मन है क्या
एक   वेतन    के   दिन   के  सिवा
नौकरी     में    नयापन   है   क्या।

*****

सचाई  पर  सफेदी  पुत रही है
सुहागा कोयलों पर चढ़ गया है
न तुम पीछे पड़ों इंसानियत के
जमाना बहुत आगे बढ़ गया है।

*****

दिन  में पत्नी के ताने सुने
रात मच्छर  के  ताने  सुनूं
एक ही कान से किस तरह
गालियां  और  गाने  सुनूं।

*****

लिखा ‘टू लेट’ जिन्होने जिन्दगी भर
उन्हें  गीता   पढ़ाकर   क्या   करोगे
जिन्होंने  बैंक  में  दिल  रख दिये हैं
उन्हें कविता  सुनाकर  क्या  करोगे।

*****

अगर मैं ‘शब्द’ के पीछे न  पड़ता
तो बंगला आज आलीशान  होता
किताबों से निकलता ‘अर्थ’ कोई
तो मैं सबसे  बड़ा  धनवान होता।

*****

हृदय का आईना किसको दिखाऊं
यहां  सब  शक्ल  से पहचानते हैं
करूं  निर्यात  अपनी  आत्मा का
विदेशी  मोल  इसका  जानते  हैं।

*****

सजावट   को   जरा-सी   सादगी   दो
कहीं   दुकान    मानव   हो   न  जाये
न मन की खाट पर मखमल बिछाओ
      कहीं  इन्सान  भीतर   सो  न   जाये।      
-ओमप्रकाश आदित्य   

संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com
मुक्तक/शेरों-शायरी के और संग्रह 
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देखे 'जिन्दगी' के विभिन्न 'रूप', शायरों-कवियों की 'नजरों' से!     

कुंअर बैचेन के सदाबहार मुक्तक

कुंअर बैचेन के सदाबहार मुक्तक

देह   छूटते   प्राण   के    प्रण    हुए

फूल थे  हम कभी, धुल का कण हुए
याद   की  एक  श्रृंगार  शाला  में हम
खुद ही चेहरा हुए, खुद ही दर्पण हुए। 
 
******   

रूप   की    चांदनी  में  नहाता   रहा
वो  तिमिर में  कहीं  जगमगाता  रहा
प्यार  की  उंगलियो से जरा छू लिया
देर   तक  आईना  गुनगुनाता   रहा। 
 
******
कुंअर बैचेन के सदाबहार मुक्तक
 
******
 
 अश्क जब  चल दिये आंख रोने लगी
याद  फिर  एक  माला  पिरोने  लगी
सांस लेने  लगी आखिरी  हिचकियां
जिन्दगी  आखिरी  नींद  सोने  लगी।
 
****** 

जन्म से  ही अमर प्यास है जिन्दगी
प्यास की आखिरी सांस है जिन्दगी
मौत ने ही  जिसे बस निकाला यहां
उंगलियों में फंसी फांस है जिन्दगी।
 
****** 

आपने शीश पर हाथ जब धर दिया
यों लगा भूमि को एक अम्बर दिया
युग-युगों से यहां मैं बुझा दिया था
आपने फिर  मुझे  आरती कर दिया
 
******
 
कुंअर बैचेन के सदाबहार मुक्तक

सांस का हर सुमन है वतन के लिए
जिन्दगी  ही हवन है वतन के लिए
कह गयी  फांसियों  में  फंसी गर्दनें
यह  हमारा  नमन है वतन के लिए।
 
****** 

जब  अंधेरे  बढ़े  रोशनी  घट  गयी
सामने   से   हमारे  हंसी  हट  गयी
मौत से तो वो बचकर निकलती रही
जिन्दगी  सांस की रेल से कट गयी।
 
****** 

बुलबुलों की तरह फूट जाते हैं हम
तीर  की  ही  तरह छूट जाते हैं हम
पत्थरों  को  तो  ठोकर  लगाते रहे
फूल  की  ठेस से टूट जाते हैं हम। 

******
कुंअर बैचेन के सदाबहार मुक्तक
गीत  है  आंसुओं से भरी गागरी
प्यार की पांखुरी दर्द की बांसुरी
बीच से ही इसे आप मत तोड़िये
गीत है प्रीत की एक अंत्याक्षरी।
 
****** 

जब कि हम बीतते दिन भुलाने लगे
आप  फिर   से हमे  याद आने लगे
जख्म भी फूल बनकर महकने  लगे 
  आंसुओं  के  अधर   गुनगुनाने लगे।  
 -कुंअर बैचेन
संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com

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"जो वक्त-ए-खतना मैं चीखा तो..." अकबर के हास्य-व्यंग शेर

https://jyotesh.blogspot.com/2024/12/akbar-ki-hasi-ki-shayari.html

अकबर का जीवन परिचय-

अकबर इलाहाबादी का पूरा नाम सैयद अकबर हुसैन था। इनका जन्म 1846 में इलाहाबाद के पास बारा में हुआ था। अकबर उर्दू के एक बेहतरीन शायर थे। मूलतः ये हास्य के शायर थे, इन्होंने समाज में व्याप्त बुराईयों पर अपने शेरों के माध्यम से कटाक्ष किया है। ये सेशन जज थे। हास्य व्यंग के साथ इनकी शेर, गजल रूबाईयां आदि प्रेम, दर्शन, धर्म, सामाजिक सुधार पर भी मशहूर हुई। बाद में ये गजलों के राजकुमार अकबर इलाहाबादी ने नाम से मशहूर हुए। इनकी मृत्यु 1921 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुई। 

 

आइये अब देखते हैं, हास्य, व्यंग से भरपूर इनके कुुछ प्रसिद्ध शेर।
रकीबों1 ने रपट लिखवाई है जाकर ये थाने में
कि ‘अकबर’ नाम  लेता है खुदा का इस जमाने में । 

1-दुश्मन
 

आधुनिकता पर चोट करते हुए अकबर लिखते हैं-
हुए इस कदर मुहज्जब1 कभी घर का मुंह न देखा
कटी उम्र होटलों में मरे अस्पताल जाकर ।

1-सभ्य

अंग्रेजी खिताब पाकर खुश होने वालों पर, अकबर की ‘सर‘ और ‘बाल’ शब्द की गजब टिप्पणी देखिए-
पाकर खिताब नाच का भी जौक हो गया
‘सर‘ हो गये, तो ‘बाल’ का भी शौक हो गया ।


अकबर ने तत्कालीन और आधुनिक सरकारी बाबूओं पर टिप्पणी कितनी बढ़िया की है-
बोला चपरासी जो मैं पहुंचा ब-उम्मीदे-सलाम
‘फांकिये खाक’ आप भी, साहब ‘हवा खाने’ गये ।

पुरानी और नई पीढ़ी पर इनका सुन्दर व्यंग देखिए, युवाओं और बुजुर्गों किसी को भी नहीं छोड़ा-
पुरानी रोशनी में और नई में फर्क है इतना,
उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता ।

अकबर परदा प्रथा के विरोधी थे, परदा प्रथा पर तंज उनकी शायरी-गजलों में कई स्थानों पर मिलता है, परदा प्रथा पर उनका खूबसुरत व्यंग देखिए-
बेपरदा नजर आईं जो चन्द बीवियां
अकबर जमीं में गैरते कौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे आपका परदा कहां गया?
कहने लगीं कि अकल पे मर्दों की पड़ गया!

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बैठायी जायेगी परदे में बीबियां कब तक
बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियां कब तक,
हरम-सरा1 की हिफाजत को तेग2 ही न रही
तो काम देगी यह चिलमन
3 की तितलियां कब तक ।
1-कमरा जहां स्त्रियां रहती हैं। 2-तलवार 3-परदा

00000-00000 

नूरे इस्लाम ने समझा था मुनासिब परदा
शमा-ए-खमोश1 को फानूस2 की हाजत3 क्या है?
1-बुझी हुई रोशनी 2-आग 3-जरूरत

लड़कियों को पढ़ाने के फेवर में थे परन्तु दायरे के साथ, उस्ताद/अध्यापकों पर गजब की टिप्पणी देखिए-
तालीम लड़कियों की जरूरी तो हैं मगर
खातूने खाना4 हों, सभा की परी न हों
जो इल्मों-मुत्तकी1 हों, जो हों उनके मुन्तजिम2
‘उस्ताद’3 अच्छे हों, मगर ‘उस्ताद जी’5 न हों ।

4-लड़कियों के लिए अलग कक्षा 1-पढ़ने की इच्छुक
2-प्रबंधक  3-अध्यापक 5-चालू/हरामी


दूसरा व्यंग लड़कियों पर ही देखिए-
तालीमे-दुखतरां1 से ये उम्मीद है जरूर
नाचे दुल्हन खुशी में खुद अपनी बारात में ।

1-लड़कियों की पढ़ाई से
 

मेकअप पर अकबर का कटाक्ष देखिए-
तुम बीवियों को मेम बनाते हो आजकल
क्या गम जो हम ने मेम का बीवी बना लिया?

पढे़ लिखे नौजवानों पर अकबर का कटाक्ष देखिए-
क्यों कर खुदा के अर्श1 के कायल हों ये अजीज
जुगराफिये2 में अर्श का नक्शा नहीं मिलता ।
1-खुदा की छत 2-भूगोल में

‘खतना’ एक मुसलिम परंपरा है, जिसमें बच्चे के लिंग की अग्रभाग की खाल को काट दिया जाता है। इसमें ‘मुसलमानी’ शब्द का दो अर्थो में प्रयोग किया गया है? गजब का शब्द-विन्यास देखिए-
जो वक्त-ए-खतना1 मैं चीखा तो नाई ने कहा हंस कर
मुसलमानी2 में ताकत खून लगने से आती है ।

1-खतने के वक्त होने वाला दर्द

हकीकत का बयान करते हुए अकबर कहते हैं-
मय भी होटल में पियो, चन्दा भी दो मस्जिद में
शेख भी खुश रहे, शैतान भी बेजार न हो ।


अकबर को इबादत के समय भी खटका रहता था, दूसरा शेर देखिए-
रहता है इबादत में हमें मौत का खटका
हम याद-ए-खुदा1 करते हैं कर ले न खुदा याद2

1-खुदा का याद 2-खुदा अपने पास न बुला लें।

नौजवानों पर तंज कसते हुए अकबर लिखते हैं-
दिल मेें अब नूरे-खुदा के दिन गए
हड्डियों में फास्फोरस देखिए ।


आधुनिक व पुरानी पढ़ाई पर टिप्पणी करते हुए अकबर लिखते हैं-
तमाशा देखिये बिजली का मगरिब1 और मशरिक2 में
कलों3 में है वहां दाखिल, यहां मजहब पे गिरती है ।

1-सूर्य के छिपने की दिशा 2-खुदा को छोड़कर अन्य भगवान को मानना
3-अच्छे रूप में


मछली शब्द का दो अर्थों में प्रयोग देखिए, अकबर साहब की शैली गजब है-
मछली ने ढील पायी लुकमें1 पे शाद2 है
सैयद3 मुतमइन है कि कांटा निगल गई ।

1-हैंडसम, सुन्दर  2-फिदा 3-बहेलियां

अकबर का कटाक्ष वास्तविक और नकली शायरों पर भी देखिए-
हकीकी1 और मजाजी2 शायरी में फर्क ये पाया
कि वो जामे से बाहर है ये पाजामे से बाहर है ।


बी ए पास पर अकबर के कई शेर लिखे हैं उनमें कुछ देखिए-
‘बी ए’ भी पास हों मिले ‘बी-बी’ भी दिल पसंद
मेहनत की है ये बात, ये किस्मत की बात है।


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शेख जी घर से न निकले और लिख कर दे दिया
आप बी ए पास हैं तो बन्दा बीवी पास है ।


कौमी लीडरों पर एक टिप्पणी देखिए-
कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम1 के साथ
रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ ।

1-अफसर

अकबर के कुछ अन्य हास्य व्यंग के शेर देखिए-
कहां ले जाऊं दिल, दोनों जहां में इसकी मुश्किल है,
यहां परियों का मजमा है, वहां हूरों की महफिल है ।
इलाही कैसे-कैसी सूरतें तूने बनायी हैं
हर सूरत दिल से लगा लेने के काबिल है ।


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जो कहा मैंने कि प्यार आता है मुझ को तुम पर
हंस के कहने लगे और आपको आता क्या है?


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लिपट भी जा न रूक अकबर गजब की ब्यूटी है,
नहीं नहीं पे ना जा ये हया की डयूटी है ।


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हम ऐसी किताबें काबिले-जब्ती1 समझते हैं
जिन्हें पढ़कर के लड़के बाप को खबती2 समझते हैं ।

1-जब्त करने के काबिल 2-मूर्ख/पागल

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दिल लिया है हमसे जिसने दिल्लगी के वास्ते
क्या तआज्जुब है जो तफरीहन1 हमारी जान ले ।

1-दिल्लगी

अनुवादक व संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com

मुक्तक/शेरों-शायरी के और संग्रह