कैसे आसमान में सुराख़ हो नहीं सकता....हिन्दी ग़ज़लें

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(1)

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो,
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारो।
दर्द-दिल वक्त पे पैगाम भी पहुंचायेगा,
इस कबूतर को जरा प्यार से पालो यारो।
लोग हाथों में लिये बैठे हैं अपने पिंजरे,
आज सैय्याद को महफिल में बुला लो यारो।
आज सींवन को उधेड़ों तो जरा देखेंगे,
आज संदूक से वो खत तो निकालो यारो।
रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालों यारो।
कैसे आकाश में सूराख हो नहीं सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।
लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की,
तुमने कह दी है तो कहने की सजा लो यारो।
-दुष्यंत कुमार

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(2)

कब तक यूं बहारों में पतझड़ का चलन होगा
कलियों की चिता होगी, फूलों का हवन होगा
हर धर्म की रामायण युग-युग से यह कहती
सोने  का  हरिण  होगें, सीता का हरण होगा।
जब प्यार किसी दिल का पूजा में बदल जाये
हर  सांस  दुआ  होगी  हर शब्द भजन होगा।
इस  रूप  की  बस्ती  में क्या माल खरीदोगे?
पत्थर  के ह्दय होंगे, शीशे  का  बदन होगा।
विज्ञान के भक्तों को अब कौन  यह समझाये
वरदानों से अपने ही दशरथ का मरण होगा।
इन्सान  की  सूरत में  जब भेड़िये फिरते हों
तब ‘हंस’ कहो कैसे दुनिया में अमन होगा।
-उदय भानु ‘हंस’

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 (3)

खेतों का हरापन मैं कहां देख रहा हूं
मैं रेल के इंजन का धुआं देख रहा हूं।
खंजर जो गवाही है मेरे कत्ल की उस पर
 अपनी ही उंगलियों के निशां देख रहा हूं।
जो मैंने खरीदा था कभी बेच के खुद को
नीलाम में बिकता वो मकां देख रहा हूं।
बूढ़ी हुई उम्मीद तो क्या, फिर भी लडूंगा
मैं अपने इरादे का जवां देख रहा हूं।
जिस राह से जाना है नयी पीढ़ी को ‘राही’
उस राह में इक, अंधा कुंआ देख रहा हूं।
-बालस्वरूप राही

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(4)

तन बचाने चले थे कि मन खो गया
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया।
घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही
और सब कुछ है वातावरण खो गया।
यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया
गाँव का जो दिया था वचन खो गया।
जो हजारों चमन से महकदार था
क्या किसी से कहें वह सुमन खो गया।
दोस्ती का सभी ब्याज जब खा चुके
तब पता यह चला, मूलधन ही खो गया।
यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी
यह हमारा तुम्हारा गगन भी अब खो गया।
हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा था कभी
एक गलती से वह व्याकरण भी खो गया।
-रामावतार त्यागी

संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com

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