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वाणी के प्रकार, उनके आश्चर्यजनक प्रभाव!

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साथियों!! किसी से अपनी बात कहने के लिए तीन प्रकार की वाणी यानि वाॅयस का प्रयोग किया जा सकता है, 
 
1-परा वाणी   
2-अपरा वाणी
3-वैखरी वाणी
 
अब देखते हैं तीन प्रकार की वाणी के कौन से आश्चर्यजनक प्रभाव होते हैं-
 

1-परा वाणी 

परा वाणी का प्रयोग दैनिक जीवन में हम किसी से बातचीत करने में करते ही हैं, इसे बोलने में होंठ, जीभ और मुख का प्रयोग किया जाता है। हमारी यह वाणी संसार को प्रभावित करने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह जितनी मधुर व सुन्दर होगी, हमारे संसारिक संबंध उतने ही मधुर व सुन्दर होंगे, कर्कश और कठोर वाणी से सभी दूर भागते हैं इससे बचने का प्रयास करते हैं। अतः संसारिक संबंधों में परावाणी का एक विशेष महत्व है।
 

परा वाणी का जप में प्रयोग-

यदि हम इस वाणी से जप करते हैं तो उसे वाचिक जप कहा जाता है, वाचिक जप वह होता है जो उच्चारण करके किया जाता है, जैसे ‘‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।’’ या और कोई भी मंत्र जिसका हम बोल-बोल कर जप करते हैं। ये वाचिक जप है, जो परा वाणी में किया जाता है इसका सीधा प्रभाव हमारे भौतिक शरीर पर पड़ता है, इस जप से हमारा भौतिक शरीर सुन्दर व तेजस्वी बनता है। साथ ही वह निरोगी भी रहता है। 
 
पूज्य गुरूदेव श्रीराम शर्मा आचार्य का कहना है कि-जब नये साधक जप प्रारम्भ करते हैं तो वे परा वाणी से वाचिक जप ही कर पाते हैं, क्योंकि अन्य प्रकार के जप अभ्यास से आते हैं, इसलिए इस जप को निम्न कोटि का जप माना जाता है। फिर भी शब्द-विज्ञान की उपयोगिता को स्वीकार करना ही होगा।
 
सूक्ष्मवेत्ताओं का मानना है कि इस जप से वाकसिद्धि मिलती है और षट् चक्रों में विद्यमान वर्णबीज शक्तियां जाग्रत होने लगती हैं।
भगवान मनु ने इस जप की महिमा का वर्ण करते हुए कहा है कि ‘‘यह विधि-यज्ञ से दस गुना श्रेष्ठ है।
 

2-अपरा वाणी

अपरा वाणी वह होती है, इसको बोलने में वैसे तो होंठ-जिव्या का प्रयोग होता है, परन्तु पास बैठे व्यक्ति को सुनायी नहीं देता कि ये क्या बोल रहे हैं। जैसे अक्सर कुछ व्यक्तियों की विशेष रूप से अंर्तमुखी व्यक्तियों की अपने आप से बात करने की आदत होती है, जबकि दूसरों को लगता है कि वे बड़बड़ा रहे हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि अपरा वाणी में एक फुसफुसाने जैसी आवाज होती है।
 

अपरा का जप में प्रयोग-

 
इसका प्रयोग मंत्र जप में अधिकतर साधकों द्वारा किया जाता है। इस वाणी में किये गये जप को उपांशु जप कहते हैं, जब पहली वाली परा वाणी का वाचिक जप सिद्ध हो जाता है तो साधक अपने आप ही अपरा वाणी से उपांशु जप करने लगता है।
 
मनुस्मृति में लिखा है कि उपांशु जप उसे कहते हैं ‘‘कि मन्त्र का उच्चारण होता रहे, होठ हिलते रहें परन्तु पास बैठा व्यक्ति भी उसे न सुन सकें, जापक स्वयं ही उसे सुने।’’
भगवान मनु ने इस जप को विधि-यज्ञ की अपेक्षा सौ गुना श्रेष्ठ बताया है।
 
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यह जप शक्तिशाली जप होता है यह हमारे सूक्ष्म-शरीर को बलिष्ठ करता है। पूज्य गुरूदेव श्रीराम शर्मा आचार्य का कहना है कि जप के प्रभाव से स्थूल से सूक्ष्म शरीर में प्रवेश होता है और ब्राह्य वृत्तियां अंतमुखी होने लगती हैं, एकाग्रता बढ़ने लगती है, एक अद्भुत मस्ती सी प्रतीत होती है, जो केवल अनुभव की ही वस्तु है।
 
अपरा वाणी से किया गया उपांशु जप नियमित किया जाये तो यह हमारे सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करता है। जिससे हमें सूक्ष्म शक्तियों का आभास होने लगता है, दूसरे के मन की बातें उसके कहने से पहले ही हमें पता लगने लगती हैं। दूर बैठे व्यक्तियों को टेलिपैथी के माध्यम से संदेश भेजने या उसका संदेश प्राप्त करने में साधक सक्षम हो जाता है आदि अनेक सूक्ष्म शक्तियां साधक को हस्तगत होने लगती हैं।
 

3-वैखरी वाणी-  

वैखरी वाणी इस वाणी में होंठ-जिव्या का प्रयोग नहीं किया जाता, इसे मन ही मन बोला जाता है, यानि अंतःकरण से बोला जाता है। पास बैठे व्यक्तियों को यह पता ही नहीं चलता कि यह कुछ बोल भी रहा है या नहीं। 
 

अपरा का जप में प्रयोग-

 
वैखरी वाणी में किये गये जप को मानसिक जप कहा जाता है।  पं0 दीनानाथ शास्त्री का कहना है कि ‘‘स्पष्ट बोलने से वाणी स्थूलता में रहती है और उसका प्रभाव भी सीमित स्थल में रहता है। पर मन के द्वारा मन्त्र के उच्चारण से वह वाक् सूक्ष्म हो जाती है, मानस जप का प्रभाव सारे आकाश में व्याप्त हो जाता है, साथ ही अपेक्षित स्थल पर पड़ता ही है।’’
 
इस मंत्र की महत्ता का वर्णन विष्णु पुराण, मनुस्मुति व ज्योतिषीय ग्रंथ वृहद् पाराशर में भी किया गया है।
मनुस्मृति में लिखा है कि ‘‘विधि यज्ञ की अपेक्षा मानसिक जप सहस्र गुना श्रेष्ठ माना गया है।’’
 
वैखरी वाणी से किये गये मानसिक जप से कारण शरीर सबल होता है, शास्त्रों मेें बताया गया है कि इस वाणी से महान ऋषियों में शाप व वरदान देने की क्षमता विकसित हो जाती है। किसी की हाय या बुरी नजर भी इसी वैखरी वाणी से निकली हुई शक्ति या क्षमता का ही परिणाम होती है। कबीर ने कहा भी है-
दुर्बल को ना सताईये जाकि मोटी हाय
बिना जीभ की सांस से लौह भस्म होई जाय।

जिस प्रकार लुहार की धौंकनी जिसमें वह लोहे का गर्म करता है, उसकी बिना जीभ के मुंह से निकली सांस या हवा से कोयले में चिंगारी भड़कती है और लोहा गर्म होकर पिघल जाता है, उसी प्रकार दुर्बल की हाय भी बहुत शक्तिशाली होती है।
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
 
‘स्वर-विज्ञान’ से मन-शरीर-भविष्य को जानिए 

इन रोगों का निवारण सरल मंत्रों से करें !

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साथियों! शब्द ब्रह्म है, क्योंकि शब्द कभी समाप्त नहीं होते, हमारे मुंह से उच्चारित शब्द अनन्त काल तक जीवित रहेंगे, आज से हजारों साल पहले यदि कोई शब्द उच्चारित हुये थे तो उन शब्दों की ध्वनि आज भी वायुमंडल में ज्यों की त्यों व्याप्त हैं, आवश्यकता है, उस ‘फ्रीक्वेन्सी’ की जिसके माध्यम से हम उस ध्वनि को सुन सकें। उच्च स्तर के साधक आज भी महाभारत कालीन शब्दों की ध्वनियों को सुनने में समर्थ है। 
वैज्ञानिकों के अनुसार शब्दों की ध्वनि के माध्यम से असंभव से असंभव कार्यों को किया जाना संभव है। डा0 फ्रिस्टोलोव ने ध्वनि कंपनों से शरीर स्थित परमाणुओं में कंपन पैदा करके दिखाया था और इस कंपन से शारीरिक रोगों को ध्वनि के माध्यम से दूर करने में सफलता मिली है। जेट विमान की तीव्र ध्वनि मकानों की दीवारों में दरारें डाल देती हैं, कदमताल मिला कर चल रहे फौजियों को किसी पुल पर कदमताल से चलने की मनायी होती है, क्योंकि उनकी कदमताल से उत्पन्न ध्वनि से पुल के टूट जाने की संभावना होती है।  अतः ध्वनि-शब्द की महत्ता निर्विवाद है।


मंत्रों के उच्चारण से भी एक विशिष्ट ध्वनि कंपन बनता है, जो तुरन्त ईथर में मिलकर पूरे विश्व के वायुमंडल में व्याप्त हो जाता है, जैसे यदि हम चन्द्रमा से संबंधित किसी मंत्र का जाप कर रहे हैं तो उसके उच्चारण से एक विशेष ध्वनि कंपन उत्पन्न होकर, ईथर के माध्यम से कुछ ही पलों में चन्द्रमा तक पहुंच कर लौट आता है, वापस आते समय उन कंपनों में चन्द्रमा की सूक्ष्म शक्ति, तेजस्विता, शीतलता आदि गुण साथ आते हैं, जो पुनः साधक के शरीर से टकराकर उसमें उन गुणों का प्रभुत्व बढ़ा देते हैं, और ग्रह से संबंधित दोष-दुर्गुण उस साधक से दूर हो जाते हैं। इस प्रकार किसी भी ग्रह व देवता से संबंधित मंत्रों का जप करने से उस ग्रह-देवता से संबंधित शक्ति साधक को अनायास ही प्राप्त हो जाती है। महाकवि दण्डी ने मंत्रों की महत्ता स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘‘यदि शब्द रूपी ज्योति सृष्टि के आरम्भ से ही न होती, तो ये तीनों लोक आज तक पूर्ण अंधकार में ही डूबे रहते।’’ अतः हम कह सकते हैं कि मंत्रों का अद्भुत प्रभाव होता है और मंत्रों से हम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ विभिन्न रोगों का इलाज भी कर सकते हैं, मैं आज आपके लिए मंत्र विशेषज्ञों द्वारा बताये गये कुछ सरल मंत्र लाया हूं जिनका प्रभाव अचूक है-


पेट दर्द बंद करने हेतू-
उत्तर की तरफ मुंह करके आसन पर बैठ जाएं, थोड़ा कपूर हाथ में ले लें और 108 बार ‘‘ऊं नमं शिवाय’’ का जाप करें और जिसका पेट में दर्द हो रहा हो उसे वह खिला दें, पेट दर्द दूर हो जायेगा।

ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ जाने पर-
प्रातःकाल नियम से इस मंत्र का जाप करें-
ऊं मंगल ग्रह देवाय नमः 
बड़े हुए ब्लडप्रेशर में फोरन आराम पड़ता है।


कमर या पसली के दर्द के लिए-
जिसे यह दर्द हो वह रोज सायंकाल डूबते सूर्य की ओर मुंह करके जहां दर्द हो रहा हो उस भाग पर कड़वे नीम की डाली 21 बार स्पर्श कराए और निम्न मंत्र को उतनी बार बोले जितनी बार डाली स्पर्श करें ‘‘ऊं भैरवाय नमः’’ उसके पश्चात डाली को कुएं में फेंक दें। चंद दिनों में दर्द होना बंद हो जायेगा।

आधा सिर का दर्द हो तो-
सफेदी चिरमिटी (मुलतानी मिट्टी) लें उसे महीन पीस कर उसे कपड़े से छान लें उस में गंगाजल मिलाये और उसकी लुगदी बना लें, और उस लुगदी को थोड़ी देर सूंघे, फिर 21 बार इस मंत्र का जाप करें।
‘‘रामदूताय हनुमान, पवनपुत्र हनुमान’’ कुछ ही समय में आधा सिर का दर्द ठीक हो जायेगा।

कान की किसी भी प्रकार की पीड़ा में-
कान में यदि किसी भी प्रकार का दर्द हो रहा हो प्रातःकाल उठकर सूर्य का नमस्कार करें और फिर उत्तर की ओर मुंह करके प्राणायाम करें और कानों को उंगलियों से बिलकुल बंद कर लें, केवल सांस छोड़ते समय ही कान से उंगलियां हटायें और हर प्राणायाम के साथ निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
‘‘ऊं वासुदेवाय नमः’’
ऐसा करने से कानों के रोगों से मुक्ति मिलेगी।


हदय विकार दूर करने लिए-
प्रातःकाल उठकर सूर्य की ओर छाती खोलकर निम्न मंत्र का 11 बार उच्चारण करें-
ऊं घृणि सूर्याय नमः  
शरीर पर रूद्राक्ष धारण करें, कुछ ही दिनों में हृदय विकार से राहत मिलेगी।


यदि सामने वाला आपसे घृणा करता हो या आपको नुकसान पहुंचाना चाहता हो-
उस व्यक्ति के सामने आते ही आप निम्न मंत्र का उच्चारण शुरू कर दें, कुछ समय पश्चात ही आप अनुभव करेंगे कि उस व्यक्ति के घृणा या नुकसान पहुंचाने वाले भाव दूर हो रहे हैं और वो आपसे मित्रता करने का इच्छुक हो रहा है।
ऊं सहना भवतु सहनौ भुनक्तु सहविर्य करवाहै। 
तेजस्विनावधीतमस्तु। मा विद्विषा वहे।


नोट-यदि किसी को उपरोक्त बीमारी पुरानी हो गयी हो तो डॉक्टर की सलाह से दवाई लेने के साथ-साथ संबंधित मंत्रों का जाप करें। 


तो साथियों आपको ये आलेख कैसा लगा कमैंटस करके बताना न भूले, अगले आलेख तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए नमस्कार जयहिन्द।
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, वास्तुविद्, एस्ट्रोलोजर   मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 

नित्य जपनीय मन्त्र!



नित्य जपनीय मन्त्र!
नित्य जपनीय मन्त्र
1-सात नदियों के मन्त्र का जप आप स्नान करते समय कर सकते हैं, इससे मनुष्य को पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ मानसिक शांति भका भी अनुव होगा।
गंगे    च    यमुने    चैव    गोदावरि     सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेSस्मिन् सन्निधिं कुरू।।

2-पांच कन्याओं के मन्त्र का स्मरण कभी भी किया जा सकता है, इससे हमें जाने अनजाने होने वाले पापों से मुक्ति मिलती है व हम शान्ति का अनुभव कर सकते हैं।
अहल्या  द्रौपदी  तारा कुन्ती मन्दोदरी तथा।
पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्।।

3-पांच सुहागिनों के नामों  का स्मरण सुहागिन स्त्री अपने पति की आयु वृद्धि के लिये व अपने सुखद वैवाहिक जीवन के लिए कभी भी कर सकती हैं, इससे उन्हे अखण्ड सुहाग की प्राप्ति होती है।
उमा  ऊषा  च  वैदेही   रमा  गंगेति  पंचकम्।
प्रभाते यः स्मरेन्नित्यं सौभाग्यं वर्धते सदा।।

4-ये उन आठ चिरंजीवी महात्माओं के नाम हैं जो अमर हैं और आज भी इस पृथ्वी पर अपने स्थूल शरीर के साथ विचरण करते हैं, इन चिरंजीवियों के नामों का स्मरण अकाल मृत्यु, जीवन संकट, बीमारी आदि से रक्षा करता है।
अश्वत्थाता बलिर्व्यासो  हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः    परशुरामश्च    सप्तैते    चिरजीविनः।।
सप्तैतांश्च  स्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद् वर्षशतः साग्रम् अपमृत्युविवर्जितः।।

5-पांच रामसेवकों के नामों का स्मरण करने से हम जीवन में आने वाली अनेक बाधाओं व ज्ञात-अज्ञात पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं और साथ ही हम श्रीराम व रामभक्त हनुमान जी के कृपापात्र भी बन जाते हैं।
श्रीरामं  हनुमन्तं  च  सुग्रीवं  च विभीषणम् ।
अंगदं जाम्बवन्तं च स्मृत्वा पापैः प्रमुच्यते।।
 
6-छह ईश्वर भक्त वैष्णवों के नामों का स्मरण भी हमें अपने पातकों से मुक्ति के साथ ही जीवन में आने वाले संकटों से मुक्ति दिलाता है और हमें ईश्वर के नजदीक ले जाता है।
बलिर्विभीषणो भीष्मः प्रह्लादो नारदो ध्रुवः।
षडैते वैष्णवास्तेषां स्मरणं पापनाशनम्।।
   संकलन-संजय कुमार गर्ग 8791820546 Whatsapp

बारह राशियों के बारह मन्त्र!

बारह राशियों के बारह मन्त्र
बारह राशि
ज्योतिष भारतवर्ष की अति प्राचीन व महत्वपूर्ण विद्या है। हमारे प्राचीन दिव्य द्रष्टा ऋषि मुनियों ने आकाश मण्डल का अध्ययन करके जो निष्कर्ष स्थापित किये थे, वे आज के समय में भी प्रासांगिक हैं। उन्होने सम्पूर्ण आकाश मण्डल को, सूर्य को आधार मानकर 12 खण्डों में विभाजित किया था। उसी के आधार पर नाभीय चक्र को 12 राशियों एवं 27 नक्षत्रों में बांटा गया है। सभी राशियों के अपने-अपने देवता से अभिन्न संबंध है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी राशि से संबंधित देवता और ग्रह का पूजन करना चाहिये, प्रस्तुत हैं प्रत्येक राशि से संबंधित देवता व उनकी सूक्ष्म पूजन विधि-


1-मेष राशि- इस राशि के देवता भगवान विष्णु हैं, अतः उनकी उपासना श्री लक्ष्मी नारायण मन्त्र के जाप से करनी चाहिये।
मन्त्र-ऊंँ श्री लक्ष्मी नारायण
 नमः।
इस मन्त्र का जाप केले के वृक्ष के पास अथवा लक्ष्मी नारायण के मन्दिर में करें। फल और लड्डुओं का भोग लगाये।

2-वृष राशि-इस राशि के देवता भगवान वासुदेव हैं। उनकी उपासना वासुदेव मन्त्र से करनी चाहिये।
मन्त्र- ऊंँ क्रीं वासुदेवाय नमः।


3-मिथुन राशि- इस राशि वालों को केशव मन्त्र का जाप करना चाहिये। भगवान कृष्ण की दूध-दही, मक्खनादि से पूजन करें।
मन्त्र- ऊंँ क्रीं केशवाय नमः।

4-कर्क राशि-इस राशि वालों को हरिवंश मन्त्र का जाप करना चाहिये। राधा-कृष्ण के मन्दिर में खोये के लड्डुओं का भोग लगाना चाहिये।
मन्त्र- ऊंँ ह्नी हरिहराय नमः।

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5-सिंह राशि-इस राशि वालों को मुकुन्द भगवान का पूजन लाभकारी होगा । मुकुन्द भगवान की खीर तथा मालपुओं से पूजा करनी चाहिये।
मन्त्र- ऊंँ बालमुकुन्दायः नमः।

6-कन्या राशि-इस राशि वालों को पीताम्बरधारी भगवान कृष्ण का ध्यान करना चाहिये। पीले चावल और पीले रंग का हलवा भगवान को समर्पित करना चाहिये।
मन्त्र- ऊंँ ह्नी पीताम्बराय परमात्मने नमः।

7-तुला राशि-इस राशि वालों को भगवान श्री राम का सपरिवार पूजन करना चाहिये। अपने को अति प्रिय लगने वाले मिष्ठान से श्री राम को भोग लगाना चाहिये।
मन्त्र- श्री रामः शरणं मम।

8-वृश्चिक-इस राशि वालों को नर-नारायण भगवान की उपासना करनी चाहिये। जाप के उपरांत मास में कम से कम एक ब्राह्मण दंपत्ती (पति-पत्नी) को भोजन कराना चाहिये।
मन्त्र- ऊंँ नमो नारायण नमः।

9-धनु राशि-इस राशि के जातक को श्री धरणीधर भगवान का पूजन और उपासना करनी चाहिये। जगत धारण करने वाले भगवान का ध्यान करते हुये उन्हे कच्चा दूध-दही अर्पण करनी चाहिये।
मन्त्र- ऊंँ ह्नी श्रीं क्रीं धरणीधराय नमः।

10-मकर राशि-इस राशि वालों को ब्रह्मा तारक की उपासना करनी चाहिये। जाप नियमित रूप से करते हुये संक्रांति और अमावस्या को सफेद वस्त्र, खीर तथा फलादि का दान करना चाहिये।
मन्त्र- ऊंँ श्रीं वत्साय उपेन्द्राय नमः।

11-कुम्भ राशि-इस राशि वालों को गोविन्द गोपाल की पूजा करनी चाहिये। गाय को हरा चारा और पेड़ा-शक्कर डालकर खिलायें। कृष्ण भगवान का ग्वाल-बालों सहित ध्यान करें।
मन्त्र-श्री गोपाल गोविन्दाय नमः।

12-मीन राशि-इस राशि वालों को प्रमुखतः चक्रपाणि और दामोदर भगवान की उपासना करनी चाहिये। जाप के समय भगवान विष्णु का शेष शय्या पर विराजमान लक्ष्मी जी सहित ध्यान करें। भगवान को दूध, क्षीर और दूध की बनी मिठाई और नारियल अर्पण करें।
मन्त्र- ऊंँ ह्नी श्रीं क्रीं रथाचक्राय नमः।

(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)
[पाठकगण! यदि उपरोक्त विषय पर कुछ पूछना चाहें तो कमेंटस कर सकते हैं, या मुझे मेल कर सकते हैं!]                                     लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008 @mail.com
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शनि देव को कैसे मनायें?


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शनि देव 
शनि, भगवान सूर्य तथा छाया के पुत्र हैं। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नि के शाप के कारण हैं। कथा के अनुसार शनि देवता भगवान कृष्ण के परम भक्त थे, वे सदा उनकेे ध्यान में रत रहते थे। व्यस्क होने पर इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से हुआ। इनकी पत्नि सती-साध्वी व तेजस्विनी थी। एक रात इनकी पत्नि ऋतु स्नान करके पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से इनके पास पहुंची पर ये श्री कृष्ण के ध्यान में निमग्न थे, इन्हे बाह्य संसार की सुध ही नहीं थी। पत्नि का ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसलिये उसने क्रुध होकर शनि देव को शाप दिया कि आज से जिसे तुम देखोगे वह नष्ट हो जायेगा। बाद में पत्नि को अपनी भूल का पश्चात्ताप हुआ, परन्तु शाप का प्रतिकार करने की शक्ति उसमें न थी। तभी से शनि देव अपना सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वह नहीं चाहते कि उनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो।

शनि जातक में सांसारिक सुख, न्यायप्रियता, छत्र-सिंहासन के बिना भी राजसी प्रतिष्ठा, गम्भीरता, दार्शनिक समझ, नौकर-चाकर, तर्क-शक्ति, पिता के समकक्ष व्यक्ति, दयालुता, देशाटन, चमड़ा, लोहे का व्यापार, प्रिंटिग प्रेस, जड़ी-बूटी, नौकरों के सुख, पक्षियों का व्यवसाय, ठेकेदारी के काम आदि का प्रतिनिधित्व करते हैं। पापी या नीच के होने पर मुसीबत घाटा, मुकदमा, शरीर पर गांठ, झुर्रिया, आंखों में विकार, वायु विकार, झूठा, फरेबी, पाप कर्म में रत, क्रूर, सेवकों से हानि, व ताकत का दुरूपयोग करने वाला भी बनाते हैं।

कब शुभाशुभ होते हैं-

1-मेष, वृष, तुला, मकर, कुम्भ राशियों के लग्नों के लिये शुभ होते हैं।

2-मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक राशि के लग्नों के लिये मध्यम हैं।

3-धनु, मीन, लग्नों के लिये अशुभ होते हैं
।

4-कुण्डली में सूर्य के साथ या बिल्कुल पीछे हों तो कमजोर होते हैं।

5-यदि शुक्र-शनि साथ हो तो सूर्य के शुभ फल घट जाते हैं।

6-कुण्डली में शुक्र कमजोर हों तो शनि के सुख भी घट जाते हैं।

हस्त रेखा शास्त्र के अनुसार-

हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हाथ में इनका स्थान मध्यमा उंगली के मूल में होता है। मध्यमा उंगली कोभाग्य की देवी भी कहा जाता है, क्योंकि भाग्य रेखा की समाप्ति इसी उंगली के मूल में होती है। यदि पर्वत पूर्ण विकसित हो तो व्यक्ति प्रबल भाग्यवान होता है, ऐसे व्यक्ति एकान्त प्रिय तथा निरन्तर अपने लक्ष्य में लगे रहने वाले होते हैं। अत्यधिक विकसित पर्वत वाला व्यक्ति, जिसकी ह्दय रेखा हाथों में धंसी हुई सी होती है, ऐसे व्यक्ति आत्महत्या तक कर सकते हैं। डाकू, ठग, लुटेरों के हाथों में भी यह पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित पाया जाता है। शनि पर्वत पर ज्यादा रेखायें हों तो व्यक्ति को कायर तथा अत्यधिक भोगी बनाती हैं।

कैसे मनायें शनि देव को-

1-नहाने से पहले शरीर पर तेल लगायें फिर नहायें। नाभी में भी तेल लगाये।

2-शिवलिंग पर जल चढ़ाये व शिव की पूजा करें।

3-शनि सेवक का भी प्रतीक हैं अतः नौकरों, मजदूरों, गरीबों व अपने अधिनस्थों का मन न दुखाये उन्हेे प्रसन्न रखने का प्रयास करें।

4-घर में तिल के तेल का दीपक जलायें।

5-भिगोये हुये बादामों का सेवन करें व दान करें।

6-सूखे नारियल में भूना हुआ आटा-बूरा मिलाकर, नारियल में भरकर, उसे किसी सुनसान स्थान पर गाड़ दें।
लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)

7-काले उड़द, काली मसूर, मक्का, बाजरा, चने का सुविधानुसार सेवन करें।

8-अपने नहाने के जल में थोड़े से काले तिल या काली सरसों डालकर स्नान करें।

9-घर में कबाड़ा, टूटी-फूटी वस्तुयें इकट्ठा न होने दें।

10-शनिवार को सुन्दर कांड, हनुमान चालीसा, श्री राम स्तुति आदि का पाठ करें।

11-सूर्य की धूप में रखें हुये जल को पीयें।

12-अदरक, तेजपत्ता, बड़ी इलायची, गरम मसाले का किसी न किसी रूप में सेवन करें।

13-शनि का रत्न नीलम है, परन्तु इसे बिना किसी ज्योतिषीय परामर्श के नहीं पहनना चाहिये।

14-नीली, लाजवर्त, स्टील की अंगूठी या लोहे का छल्ला नीलम के सस्ते विकल्प के रूप में पहने जा सकते हैं।

15-नीलम, वृष, तुला, मकर, कुंभ, लग्न वालों के लिये शुभ है, नीलम के साथ हीरा-पन्ना अवश्य पहनना चाहिये।लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)

16-मिथुन, कर्क, सिंह लग्न वालों के लिये नीलम अशुभ है।

विशेष-उपरोक्त उपायों में से एकाधिक उपाय करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं, यदि समस्या गंभीर हो तो किसी विद्धान व अनुभवी ज्योतिषी से संपर्क करना चाहिये।
-लेखक-संजय कुमार गर्ग (लेखाधिन पुस्तक "नवग्रह रहस्य" से)
 (चित्र गूगल-इमेज से साभार!)  
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर 8791820546 Whats-app

शुक्र देव का कैसे मनायें!


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शुक्र देव
महाभारत के अनुसार शुक्राचार्य (शुक्र) दानवों के पुरोहित हैं, ये योग के आचार्य हैं। इन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की थी, इसी के बल पर ये युद्ध में मारे गये दानवों को जीवित कर देते थे। भगवान शिव ने इन्हें धन का अध्यक्ष भी बना दिया, इसी कारण शुक्राचार्य इस लोक व परलोक की सारी सम्पत्तियों के स्वामी बन गये। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से शुक्राचार्य ग्रह बनकर तीनों लोकों का कल्याण करने लगे। मत्स्य पुराण के अनुसार इनका वर्ण श्वेत है, इनका वाहन रथ है, जिसमें अग्नि के समाान आठ घोड़े जुते रहते हैं। शुक्र जातक में स्वास्थ्य, आकर्षक दिखाने की भावना, वाहन सुख, कविता, रोमांस, स्त्री मित्र, सोने का संग्रह, शानदार घर, भोग विलास की वस्तुये, मैथुन, नाच गाना, रसिकता, सुन्दरता, फिल्म, अभिनय, सुन्दर स्त्री, सौन्दर्य प्रसाधन व वसंत ऋतु आदि का प्रतीक हैं। ये जातक में पापी या नीच के होने पर गुप्त रोग, खुजली, मधुमेह, बोलने के दोष, नशे की आदत, पत्नि से कलह, वाहन दुर्घटना, बाॅझपन, बाजारू स्त्रियों से सम्पर्क, शरीर में स्त्रियोचित हारमोन्स की अधिकता आदि अवगुण भी देते हैं।

कब शुभ होते हैं- 
*वृष, मिथुन, तुला, मकर, कुंभ, मीन राशियों में शुक्र शुभ हैं, कर्क, सिंह, कन्या, राशियों में मध्यम और मेष, वृश्चिक, धनु में अशुभ होते हैं।

*कुण्डली में सूर्य के साथ या बिलकुल पीछे हो तो कमजोर होते हैं।

*गुरू के साथ हो तो शुक्र अशांत होते हैं।

*शनि के कमजोर होने से शुक्र के सुख में कमी आती है। शनि के बलि होने पर शुक्र के शुभ फल बढ़ते हैं।

*शुक्र के साथ राहु या मंगल हो तो विवाहित जीवन में बाधा आती है।

*शुक्र-चन्द्र के साथ हों तो माता को कष्ट होता है।

*शुक्र-गुरू के साथ हों तो घर की स्त्रियों में आपस में तनाव रहता है।
लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)

हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार- 
 अंगूठे के दूसरे पर्व के नीचे आयु रेखा से घिरा हुआ जो स्थान होता है उसे शुक्र पर्वत कहते हैं। जिन हाथों में शुक्र पर्वत सामान्य उभार लिये हुए हो और आड़ी-तिरछी रेखाओं द्वारा न काटा गया हो, वह श्रेष्ठ माना जाता है। उस जातक में उपरोक्त वर्णित गुण पाये जाते हैं। जिन हाथों में शुक्र पर्वत ज्यादा उभार लिये होता है तथा आड़ी-तिरछी रेखाओं द्वारा काटा जाता है वो व्यक्ति भोगी व विपरित सेक्स के प्रति ललायित होते हैं तथा उन्हें प्रेम संबंधों में बदनामी भी उठानी पड़ सकती है, यदि किसी हाथ में शुक्र पर्वत का अभाव होता है तो वह व्यक्ति साधु-संन्यासी की तरह होता है, गृहस्थ जीवन में उनकी रूचि ना के बराबर होती है।
लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)

कैसे मनाये शुक्र देव को सरल उपाय- 
1-शुक्र लक्ष्मी का रूप हैं, पराई स्त्री, कन्या के प्रति नजरें साफ रखें।

2-अगरबत्ती, इत्र, कपूर का दान करें व स्वयं भी इनका प्रयोग करें।

3-गले में चांदी की चेन पहनें।

4-तिजोरी या लाॅकर में चांदी के साथ चावल रखें।

5-सफेद वस्त्रों का कम से कम शुक्रवार को अवश्य पहनें, व चांदी के बर्तन में दही खायें।

6-दही, शहद, बूरा, दूध आदि चीजों का दान करें।

7-रेशमी वस्त्र किसी गरीब कन्या का दें।

8-पत्नि के अलावा किसी और से संबंध न बनाये।

9-घर में पुराने बेकार कपड़े, रददी, टूटे जूते आदि इकट्ठा न होने दें।

10-यदि शुक्र 6, 8, 12 वे भावों में या कमजोर राशियों में हो तो घर की नकदी-जेवर आदि को पूरी तरह से पत्नि या किसी स्त्री को न सौंपे।
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11-शुक्रवार का व्रत रखें।

12-शुक्र का रत्न हीरा है यदि इसे न खरीद सकें तो अमेरिकन डायमंड, ओपल, या मोती पहनें। हीरा वृष, तुला, मकर, कुंभ लग्न वालों के लिये शुभ है।

13-मेष, वृश्चिक, धनु, मीन, लग्न वालों के लिये हीरा पहनना उचित नहीं है।

14--"सूर्य-ग्रह" से संबंधित  सामान्य उपाय करें।

विशेष-उपरोक्त उपायों में से एकाधिक उपाय करने से शुक्र देव प्रसन्न होते हैं, यदि समस्या गंभीर हो तो किसी विद्धान व अनुभवी ज्योतिषी से संपर्क करना चाहिये।
-लेखक-संजय कुमार गर्ग (लेखाधिन पुस्तक "नवग्रह रहस्य" से)
 (चित्र गूगल-इमेज से साभार!) 
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