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BHRATHARI'S VAIRAGYA SHATKAM IN HINDI
महाराज भर्तृहरि का ‘वैराग्य शतकम्’-अंतिम भाग

https://jyotesh.blogspot.com/2014/12/blog-post.html
वैराग्य शतकम् में भर्तृहरि आगे कहते हैं कि इस प्रकार का जीवन व्यर्थ है-‘‘निष्कलंक विद्या का अध्ययन नहीं किया, दान एवं भोग के लिये धन का उपार्जन भी नहीं किया, एकाग्रचित होकर प्रसन्न मन से माता-पिता की सेवा भी नहीं की, चंचल एवं विशाल नेत्रों वाली प्रियतमा का स्वप्न में भी आलिंगन नहीं किया। अहो! हमने तो कौओं की भांति अपने अमूल्य मानव जीवन को परान्न-भक्षण के लालच में व्यर्थ ही बिता दिया।‘‘।। 43।। ऐसा ही श्लोक ‘सुभाषितानी भा0’ में थोडे़ परिवर्तन के साथ आया है-‘‘पहली अवस्था (बाल्यवस्था) में विद्यार्जन नहीं किया, दूसरी अवस्था (युवावस्था) में धनार्जन नहीं किया, तीसरी अवस्था (प्रौढ़ावस्था) में पुण्यार्जन नहीं किया, तो चैथी अवस्था (वृद्धावस्था) में क्या किया जा सकेगा।’’ (सुभा0 भा0 169) 


भर्तृहरि जी ‘संतुष्टि’ की सुन्दर परिभाषा देते हुये बताते हैं-‘‘हे राजन! हम वत्कल वस्त्रों को धारण करके संतुष्ट हैं और तुम रेशमी वस्त्र धारण करके प्रसन्न हो-इस प्रकार हम दोनों का संतोष तो समान ही है क्योंकि संतोष में किसी प्रकार की विशेषता नहीं है। संसार में दरिद्र वही है जिसकी तृष्णा विशाल है, मन के संतुष्ट होने पर कौन निर्धन है और कौन धनवान?’’।। 45।। अंग्रेजी के लेखक ‘डेनियल जी’ ने अपने साहित्य में उपरोक्त पद्य का अनुवाद ही कर दिया है-‘‘वह निर्धन नहीं है जिसके पास थोड़ा धन है वरन् दरिद्र वह है जिसकी अभिलाषाएं बढ़ी हुई हैं।’’


भर्तृहरि बदलते समय पर लिखते हैं कि- ‘‘हे मित्र! पहले तो तुम हम थे और हम तुम थे अर्थात हम-तुम में कोई अन्तर नहीं था, परन्तु पता नहीं कौन सी बात हुई कि अब हम समझते हैं कि हम हमीं हैं और तुम तुम्ही’’।। 59।। कबीर दास जी ने उपरोक्त को गुरू-शिष्य के संबंध में कहा है-‘‘जब मैं था गुरू नहीं अब  गुरू है मैं नाय। प्रेम गली अति सांकरी ता में दो ना समाय।।’’

भर्तृहरि शरीर की ‘क्षणभंगुरता‘ पर लिखते हैं कि- ‘‘जब प्रलय-अग्नि से स्वर्ण आदि अमूल्य रत्नों के भण्डार सुमेरू पर्वत भस्म हो जाते हैं, बडे-बड़े मगर और जल-जंतुओं का घर समुद्र भी उस प्रलयानल से सूख जाता है, पर्वतों से दबी हुयी पृथ्वी भी नष्ट हो जाती है तब हाथी के बच्चे के कान के अग्रभाग के समान चंचल इस शरीर की तो गणना ही क्या है? यह तो क्षणभंगुर ही है।’’।। 63।।

भर्तृहरि कहते हैं कि-‘‘कल्याणकारी परमात्मा में अपार भक्ति हो, ह्दय में जन्म-मरण का भय हो, बन्धु-बांधवों के प्रति मोह न हो, मन में काम के विकार न हों, संसर्ग दोषों से मुक्त हों और निर्जन, एकांत वनों में वास हो, यदि इस प्रकार वैराग्य उदय हो जाये तो  इससे  बढ़कर  और किस सुख की अभिलाषा की जाये।’’।। 67।।

मन की ‘उछलकूद’ पर भर्तृहरि ने कितना सुन्दर लिखा है-‘‘हे चित्त! तू अपनी चंचलता से कभी बहुत नीचे पाताल में प्रविष्ट हो जाता है और कभी ऊंचे आकाश को लांघ जाता है तो कभी चारों दिशाओं में भ्रमण करता है, परन्तु तू कभी भूलकर भी अपने ह्दय-मन्दिर में विराजमान विमल ब्रह्मा का ध्यान नहीं करता जिससे तू मोक्ष के परमानन्द को प्राप्त कर सकता है।’’।। 69।।

भर्तृहरि कहते हैं कि मुनिजन इन के साथ सुख से सोते हैं-‘‘भूमि ही रमणीय शय्या है, उनकी भुजा ही उनका गुदगुदा तकिया है, आकाश ही उनकी चादर है, अनुकूल वायु ही उनका पंखा है, चन्द्रमा ही उनका जलता हुआ दीपक है, विरक्ति ही उनकी स्त्री है-इन सभी समानों के साथ मुनिजन सुख के साथ सोते हैं।’’।। 71।।


भर्तृहरि जी योगी के मन की तुलना समुद्र से करते हुए कहते हैं-‘‘जिस प्रकार मछली की उछलकूद से समुंद्र कभी भी चंचल अथवा तरंगित नहीं होेता, गम्भीर ही बना रहता है, इसी प्रकार मनस्वी, विचारशील, ब्रह्मज्ञानी अथवा योगी को ब्रह्मांड का लालच देकर भी नहीं लुभाया जा सकता अन्य पदार्थो की बात ही क्या है।’’।। 75।।

भर्तृहरि कहते हैं-‘‘चन्द्रमा की किरणें मनोहारिणी हैं, हरी घास वाली भूमियां भी रम्य है, साधुओं को समागम का सुख भी आनन्ददायक है, काव्यों की गाथायें भी मनोरम हैं, प्रणय-कलह में क्रोध से उत्पन्न नेत्र के कोनों में टिकी हुयी अश्रु-बिन्दुओं से चंचल प्रिया का मुख भी मन को हरने वाला है, परन्तु जब से संसार की अनित्यता का ज्ञान हुआ है, तब से हमें ये रम्य और मनोहारी वस्तुएं भी अच्छी नहीं लगती हैं।’’।। 76।।

भर्तृहरि कुम्हार से कहते हैं-‘‘हे प्रिय मित्र! कुम्हार जिस प्रकार गीली मिटटी के लौंदे को चाक पर चढ़ाकर, चाक को डण्डे से बार-बार घुमाता है और उससे अपनी इच्छानुसार बर्तन बनाता है, उसी प्रकार संसार का निर्माण करने वाला ब्रह्मा हमारे चित्त को चिन्ता के चाक पर चढ़ाकर चाक को विपत्तियों के डण्डे से लगातार घुमाता हुआ हमारा क्या करना चाहता है-यह हमारी समझ में नहीं आता।’’।। 87।। इसी बात को कबीरदास जी ने कुछ अलग ढ़ंग से रखा है-‘‘मांटी कहै कुम्हार से तू क्यों रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंदूगी तोय।’’

भर्तृहरि कहते हैं-‘‘वे योगी  धन्य हैं जो पर्वत की कन्दराओं में रहते हुये ब्रह्मज्योति का ध्यान करते हैं, और पक्षीगण उनकी गोद में बैठकर उनके आनन्द-आश्रुओं का निर्भय होकर पान करते हैं। हम लोगों का जीवन तो मनोरथों के महल की बावड़ी के किनारे के क्रीड़ा-उद्यान में क्रीड़ा करते हुये व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा है।’’ ।। 90।।


भर्तृहरि समझाते हैं कि भूख-प्यास और कामाग्नि एक प्रकार की औषधी ही हैं-‘‘जब मनुष्य का कंठ प्यास से सूखने लगता है तब वह शीतल जल का पान करता है, भूख से सताये जाने पर मनुष्य शाक व स्वादिष्ट शाली के चावलों के भात से अपनी क्षुधा-निवृत्ति करता है, कामाग्नि के प्रदीप्त होने पर वह स्त्री का गाढ़ालिंगन करता है। विचार करने से ज्ञात होता है जल-पान आदि एक-एक रोग की एक-एक औषधी है परन्तु मूर्ख लोग वास्तविक तथ्य को न जानकर इन्हीं में सुख समझते हैं।’’।। 83।।

भर्तृहरि लिखते हैं कि एकान्त सेवन हर किसी को योगी नहीं बना सकता-‘‘ज्ञान सत्पुरुषों के मान और मद आदि का नाश करता है परन्तु वही ज्ञान दुष्टों के मद और मान आदि अवगुणों की वृद्धि करता है, जैसे एकान्त स्थान, योग-साधना की स्थली होने के कारण योगियों के लिये तो मुक्ति दिलाने वाली होती है परन्तु वही स्थान कामियों की काम-ज्वाला को बढ़ाने वाला होता है।’’।। 81।।

भर्तृहरि अंतिम विदाई मांगते हुये कहते हैं-‘‘हे माता पृथ्वी! हे वायु पिता! हे मित्र अग्नि! हे सुबन्धो जल! हे सहोदर भाई आकाश! अब मैं आपको अन्तिम विदाई का प्रणाम करता हूँ, क्योंकि आपकी संगति के कारण मैंने पुण्य-कर्म किये और पुण्यों के फलस्वरूप मुझे निर्मल ज्ञान की प्राप्ति हुई उस ज्ञान के द्वारा सांसारिक मोह माया दूर हो गयी है, जिससे अब मैं परबह्म परमात्मा को प्राप्त हो रहा हूंँ-मुक्ति को प्राप्त हो रहा हूंँ।’’।। 78।।
(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)
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महाराज भर्तृहरि का वैराग्य शतकम्!

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भर्तृहरि 
वैराग्य शतकम् में भर्तृहरि ने कारुण्य और निराकुलता के साथ संसार की नश्वरता और वैराग्य की आवश्यकता पर बल दिया है। संसार एक विचित्र पहेली है-कही वीणा का सुमधुर संगीत है, कही सुन्दर रमणीयाँ दिख पड़ती है तो कहीं कुष्ठ पीडि़त शरीरों के बहते घाव तो, कही प्रिय के खोने पर बिलखते स्वजन, अतः पता नहीं, यह संसार अमृतमय है या विषमय, वरदान है या अभिशाप। आओ देखें वैराग्य शतकम् में भर्तृहरि क्या कहते हैं-

भर्तृहरि लिखते हैं कि-‘‘बुद्धिमान लोग ईर्ष्या ग्रस्त हैं, राजा अथवा धनी लोग धन के मद में मत्त हैं, अन्य लोग अज्ञान से दबे हुये हैं अतः सुभाषित (उत्तम काव्य)   शरीर   में   ही   जीर्ण  हो  जाते  हैं।  ‘‘।। 2।।

भर्तृहरि लिखते हैं कि मैंने ‘‘धन प्राप्ति की आशा से (गड़ा हुआ धन मिलेगा) भूमि को खोदा, मैनसिल आदि पर्वत की अनेक धातुओं को स्वर्ण-प्राप्ति की इच्छा से फूंक डाला, मोतियों की प्राप्ति की आशा से समुद्रों को मथ डाला, बड़े प्रयत्न से राजा आदि श्रीमानों को भी संतुष्ट किया, सिद्धिदायक मन्त्राराधन में तत्पर होकर श्मशान में भी कितनी ही रात्रियां व्यतीत की परन्तु मुझे कानी कौड़ी की भी प्राप्ति नहीं हुई। हे तृष्णा! अब तो तू मेरा पिण्ड छोड़ दे।‘‘।। 4।।

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भर्तृहरि कहते हैं इतने पर भी मुझे संतुष्टी नहीं मिली-‘‘अनेक प्रकार के जल, वृक्ष, पर्वतादि दुर्ग के कारण दुर्गमनीय देशों-स्थानों का भ्रमण किया, परन्तु कुछ भी फल नहीं पाया, जाति और कुल का अभिमान छोड़कर श्रीमानों की सेवा की परन्तु सब व्यर्थ, अपने मान-सम्मान को तिलांजलि देकर दूसरों के घर पर लोभवश कव्वे के समान भोजन करता रहा, इतने पर भी, पाप कर्म में प्रवृत्त करने वाली तृष्णे! तू संतुष्ट नहीं हुयी।‘‘।। 5।।

भर्तृहरि आगे लिखते हैं-‘‘सूर्य के उदय और अस्त होने के साथ-साथ प्रतिदिन आयु भी घटती जाती है। बहुत ये देय-गेय संबंधी कार्याे से (जीवनोपाय के उद्योगों से) समय के व्यतीत होने का ज्ञान नहीं होता। जन्म, जरा, कष्ट, और मृत्यु को देखकर भी मनुष्य को भय उत्पन्न नहीं होता इससे ज्ञात होता है कि सारा जगत मोहरूपी मदिरा का पान करके मतवाला हो रहा है।‘‘।। 7।।

भर्तृहरि का श्रृंगार शतकम स्त्री सौन्दर्य का 'विश्व कोष'! 

भर्तृहरि लिखते हैं कि जीने की इच्छा अब तक समाप्त नहीं हुई है-‘‘सांसारिक विषयों की वासना समाप्त हो गयी, लोगों में पहले जो आदर मान और सम्मान था वह भी कम हो गया। समव्यस्क प्राणों के समान प्रिय मित्र भी दुरवस्था भोगने से पूर्व ही स्वर्ग सिधार गये, हम भी लकड़ी के सहारे धीरे-धीरे उठ पाते हैं, दृष्टि क्षीण हो गयी है फिर भी ज्ञानहीन शरीर मरने की बात सुनकर चौंक पड़ता है अर्थात इतना सब के बाद भी जीने की इच्छा बनी हुई है।‘‘।। 9।।

भर्तृहरि आगे लिखते हैं-‘‘खाने के लिये वृक्षों के फल पर्याप्त हैं, प्यास मिटाने के लिये झरनों का स्वादिष्ट जल भी भरपूर है, सोने के लिये विशाल पृथ्वी है और तन ढकने के लिये वल्कल वस्त्र भी बहुत उपलब्ध हैं-ऐसी दशा में अभी-अभी प्राप्त धन रूपी मदिरा के पान से जिनकी सारी इन्द्रियां भ्रान्त हो रही हैं, ऐसे दुष्ट जनों  की  अनादरपूर्वक  बातें  सुनने  को  मेरा  उत्साह  नहीं है।‘‘।। 20।।

भर्तृहरि कहते हैं कि हमें राजसभा में कौन पूछता है-‘‘हम न तो नट हैं जो भिन्न-भिन्न प्रकार का वेष धारण कर विचित्र ढ़ंग से नृत्य करते हैं और न विट हैं जो पर-स्त्रियों के लम्पट होते हैं, न गायक हैं, न असभ्यों की अश्लीलतापूर्ण बातचीत करने में प्रसिद्ध हैं और न स्तनों के भार से कुछ झुके अंगों वाली स्त्रियां ही हैं फिर राज सभा में हमें पूछता ही कौन है? अर्थात राजसभा में उपरोक्त की ही पूछ होती है।‘‘।। 25।।

निम्न अवस्थाओं के बाद व्यक्ति को जंगल मेें निवास करने की सलाह भर्तृहरि देते हैं-‘‘मान-सम्मान प्रतिष्ठा के कम होने पर, धन के नष्ट होेने पर, याचक के निराश होकर निरर्थक लौट जाने पर, स्त्री-पुरूष और संबंधियों के परलोक सिधार जाने पर, सेवक-वर्ग के चले जाने पर और शनै-शनै यौवन के ढल जाने पर बुद्धिमानों को यही उचित है कि वे गंगा के जल से पवित्र पत्थर वाले गिरीन्द्र हिमालय की गुहा के आस-पास किसी कुंज में निवास करें अर्थात समाज से नाता तोेड़कर आत्मअनुसंधान करें।‘‘।। 29।।

भर्तृहरि लिखते हैं कि वैराग्य ही निर्भय है-‘‘विषय-भोगोें को भोगने में रोग का भय, वंश में आचार भ्रष्टता, जाति-विच्छेद अथवा संतान-विच्छेद का भय है, धन की समृद्धि में राजा द्वारा छीने जाने का भय है, मौन रहने पर दीनता का, बल में शत्रुओं का, रूप-सौन्दर्य मे वृद्धावस्था, शास्त्र में शुष्कवाद का अथवा प्रतिवाद द्वारा पराजित होने का, गुण में दुष्टों द्वारा व्यर्थ निन्दा का, शरीर को काल का भय हैै। इस प्रकार पृथ्वी पर सभी वस्तुयें भय से युक्त हैं केवल एक वैराग्य ही निर्भय है।‘‘।। 32।।

काल को नमस्कार करते हुये भर्तृहरि लिखते हैं- ‘‘यह रमणीक नगरी, वह चक्रवती सम्राट, उसके मांडलिक राजाओं का समूह, तथा प्रसिद्ध विद्धानों की सभा, चन्द्रमा की चन्द्रिका के समान सुन्दर मुख वाली ललनाएं, उद्दंड राजपुत्रों का समूह, स्तुति करने वाले बन्दीगण, बन्दीजनों के द्वारा कथन की गयी उत्तम-उत्तम कथाएं-जिसके कारण ये सब वस्तुयें स्मृति-मात्र रह गयी हैं, इस सब का संहार करने वाले काल को बारम्बार नमस्कार है।‘‘।। 33।।

भर्तृहरि संसार की ‘नश्वरता‘ के बारे में लिखते हैं-‘‘जिस स्थान पर अथवा घर में अनेक प्राणी थे, वहां आज एक ही शेष रहा है। किसी स्थान पर जहां पहले एक था, फिर अनेक हुये और अन्त में एक भी नहीं रहा। ऐसा प्रतीत होता है कि दिन-रात रूपी पासों से काल-रूपी जुआरी संसार रूपी चौपड़ में प्राणियों को गोट बनाकर कालों के साथ खेल खेल रहा है अर्थात काल इच्छानुसार प्राणियों को नचा रहा है।‘‘ ।। 35।।

भर्तृहरि कहते हैं इस ‘अल्पकालीन‘ जीवन में हम क्या करें? ‘‘हम लोग तप करते हुए वैराग्यपूर्वक गंगा के तट पर रहें? अथवा सौभाग्यसुशीलता आदि गुणों से अलंकृत सुन्दर भार्या का सांसारिक धर्म से अनुसरण करें? या शास्त्रों के समूह का अर्थ ह्दयगंम करें? या काव्यमृत का  अस्वादन  करेें?  कुछ  समझ  नहीं  आता कि इस  अल्पकालीन  जीवन  में  हम  क्या  करें?‘‘।। 36।।

भर्तृहरि जी आगे जीवन की समानता बताते हुये कहते हैं-‘‘हमारे लिये देवों के देव महादेव ही एकमात्र उपास्य देव है, गंगा ही एकमात्र सेवनीय नदी है, पर्वतोें की गुुफायें ही सुन्दर घर हैं, दिशाएं ही भव्य वस्त्र हैं, काल ही मित्र है और निर्भयता एवं अदीनता ही हमारा व्रत है और क्या कहें नाना प्रकार की सुख-सुविधा पहुंचाने के काण वट-वृक्ष ही हमारी प्रिय भार्या है।‘‘ ।। 39।।

महाराजा भर्तृहरि जी ने ‘संसार‘ को ‘नदी‘ के समान बताकर कितनी सुन्दर उपमाएंँ दी हैं-‘‘इस संसार में आशा नामक एक नदी है। यह नदी मनोरथ (खान-पान विहार आदि इच्छा रूपी) जल से परिपूर्ण है। इसमें तृष्णा (अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्ति रूपी इच्छा) की तरंगे उठ रही है। अभीष्ट पदार्थो के प्रति राग और द्वेषरूपी मगरमच्छों से ये भरी हुयी हैं। तर्क-वितर्क रूपी जल-पक्षियों से आकीर्ण हैं। धैर्य रूपी वृक्षों को यह उखाड़ फेंकने वाली हैं। इस नदी में अज्ञान-वृत्ति-दर्प-दम्भ रूपी भंवर पड़ रहे हैं, यह पार करने में अत्यंत दुस्तर है। चिन्ता रूपी ऊंचे-ऊचे इसके तट हैं। इसे पार करना अत्यंत कठिन है, परन्तु शुद्धान्तकरणः योगी इस नदी को पारकर ब्रह्मानन्द में मग्न होकर आनन्दित होते हैं।‘‘
चित्र गूगल-इमेज से साभार!)
                            -संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.
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भर्तृहरि का 'श्रृंगार-शतकम्' "काम व कामिनी‘" का विश्वकोष!

भर्तृहरिकाश्रृंगार-शतकम्
भर्तृहरि का 'श्रृंगार-शतकम्
महाकवि भर्तृहरि की कविताएं जितनी प्रसिद्ध हैं, उनका व्यक्तित्व उतना ही अज्ञात है, जनश्रुति के आधार पर वे महाराजा विक्रमादित्य के बड़े भ्राता थे। चीनी यात्री इत्सिंग ने भर्तृहरि नाम के लेखक की मृत्यु 654 ई0 में लिखी है, उन्होने यह भी लिखा है कि भर्तृहरि सन्यास जीवन के आनन्द तथा गृहस्थ जीवन के प्रमोद की रस्सियों से बने झूले में सात बार झूलते रहे। पाश्चात्य अन्वेषक भी इत्सिंग के कथन व जनश्रुति के आधार पर ही भर्तृहरि को, महाराजा विक्रमादित्य के बड़े भ्राता, राजा भर्तृहरि को ही मानते हैं।

श्रृंगार शतकम् में कवि ने श्रृंगार का चटकीला चित्रण किया है, इस शतक में कवि ने स्त्रियों के हाव-भाव, प्रकार, उनका आकृषण व उनके शारीरिक सौष्ठव के बारे में विस्तार से चर्चा की है, वैसे तो उनके अनेक श्लोकों से मैं सहमत नहीं हूँ, और उनके बहुत सेे श्लोक अश्लीलता की श्रेणी में आ जाते हैं, फिर भी ’काम-कामिनी‘ के संबंध में उनका ज्ञान अभूतपूर्व है। जिसे मैं आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूंँ- 

शतक के मंगलाचरण में ही कामदेव को नमस्कार करते हुये भर्तृहरि लिखते है-’’जिसने विष्णु और शिव को मृग के समान नयनों वाली कामिनियों के गृहकार्य करने के लिये सतत् दास बना रखा है, जिसका वर्णन करने में वाणी असमर्थ है ऐसे चरित्रों से विचित्र प्रतीत होने वाले उस भगवान पुष्पायुध (कामदेव) को नमस्कार है।‘‘ ।। 1।।
 
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वे बताते हैं कि स्त्री किस प्रकार मनुष्य के संसार बन्धन का कारण है-’’मन्द मुस्कराहट से, अन्तकरण के विकाररूप भाव से, लज्जा से, आकस्मिक भय से, तिरछी दृष्टि द्वारा देखने से, बातचीत से, ईर्ष्या के कारण कलह से, लीला विलास से-इस प्रकार सम्पूर्ण भावों से स्त्रियां पुरूषों के संसार-बंधन(?) का कारण हैं।‘‘।2।

स्त्रियों के अनेक आयुध (हथियार) भर्तृहरि ने बताये हैं-’’भौंहों के उतार-चढ़ाव आदि की चतुराई, अर्द्ध-उन्मीलित नेत्रों द्वारा कटाक्ष, अत्यधिक स्निग्ध एवं मधुर वाणी, लज्जापूर्ण सुकोमल हास, विलास द्वारा मन्द-मन्द गमन और स्थित होना-ये भाव स्त्रियों के आभूषण भी हैं और आयुध (हथियार) भी हैं।‘‘।। 3।।

भर्तृहरि कहते हैं संसार में निम्न वस्तुओ की उत्पत्ति का कारण स्त्रियां ही हैं-’’इस संसार में नव-यौवनावस्था के समय रसिकों को दर्शनीय वस्तुओं में उत्तम क्या है? मृगनयनी का प्रेम से प्रसन्न मुख। सूंघने योग्य वस्तुओं में क्या उत्तम है? उसके मुख का सुगन्धित पवन। श्रवण योग्य वस्तुओं में उत्तम क्या है? स्त्रियों के मधुर वचन। स्वादिष्ट वस्तुओं में उत्तम क्या है? स्त्रियों के पल्लव के समान अधर का मधुर रस। स्पर्श योग्य वस्तुओं में उत्तम क्या है? उसका कुसुम-सुकुमार कोमल शरीर। ध्यान करने योग्य उत्तम वस्तु क्या है? सदा विलासिनियों का यौवन विलास।‘‘।। 7।।

भर्तृहरि कहते है कि नारी को ’अबला‘ कहना मूर्खता होगी-’’जो कविवर नारी को हमेशा अबला (बलहीन) कहते हैं, वे निश्चिय ही अल्प बुद्धि वाले हैं। जिन कामनियों ने अपने अत्यंत चंचल नेत्र के कटाक्षों द्वारा महान  सामर्थ्यशाली इन्द्र आदि को भी जीत लिया है, उन्हें अबला कैसे कहा जा सकता हैै।‘‘।। 10।।

भर्तृहरि कहते है कि स्त्रियां ’वैराग्य‘ के साधनों से पूर्ण होने के बाद भी मनुष्य को ’अनुरागी‘ ही बनाती हैं-’’हे सुन्दरी! तुम्हारे केश संयमी-सुगन्धित तेलों द्वारा संवारे हुये अथवा यम-नियम आदि में संलग्न होने के कारण संयमशील हैं। तुम्हारे नेत्र श्रुति-कान के अंतिम छोर तक पहुंचे हुये होने के कारण अत्यंत विशाल हैं अथवा वेद विचार में पारंगत हैं, वेद के मर्मज्ञ हैं। तुम्हारा अंतरमुख स्वभावतः शुद्ध द्विज-ब्राह्मण या दांतों के समूह से सुशोभित है। तुम्हारे दोनों स्तन रूपी घट जीवन-मुक्तों अथवा मोतियों (मोतियों की माला) के सतत् निवास स्थान हैं। हे! कृशांगि! इस प्रकार वैराग्य के साधनों में पूर्ण अथवा प्रसन्न, तुम्हारा शरीर हम लोगों को ’विरागी‘ नहीं बनाता, अपितु ’अनुरागी‘ ही बनाता हैै।’‘।। 12।।

भर्तृहरि ने ग्रहों के अनुसार स्त्रियों की व्याख्या करके अपने 'ज्योतिषीय ज्ञान' का परिचय दिया है-’’स्तन भार के कारण देवगुरू बृहस्पति के समान, कान्तिमान होने के कारण सूर्य के समान, चन्द्रमुखी होने के कारण चन्द्रमा के समान, और मन्द-मन्द चलने वाली अथवा शनैश्चर-स्वरूप चरणों से शोभित होने के कारण सुन्दरियां ग्रह स्वरूप ही हुआ करती है।‘‘।।16।। पाठकजनों!! भर्तृहरि जी के इस श्लोक में मैंने अपनी ओर से कुछ जोड़ने की धृष्टता की है, जिसे भर्तृहरि जी ने छोड़ दिया है-’’लम्बे शरीर, तेजस्वी नेत्रों, व रक्तवर्णीय मुख वाली स्त्रियां मंगल स्वरूप, सांवले रंग, लेकिन तीखी भावभंगिमा वाली व तीव्र मेधा वाली स्त्रियां बु़द्ध स्वरूप,  गौर वर्ण व तीखे नाक-नक्श वाली, अत्यन्त रूपवती स्त्रियां, जो दृष्टि मात्र से पुरूषों का मन हर लेती हैं, ऐसी स्त्रियों को शुक्र-स्वरूप-सुन्दरी कहा जा सकता है।‘‘

’श्लेषालंकार’ का सुन्दर प्रयोग भर्तृहरि ने इस श्लोक में किया है-’’हे आर्याे! ईर्ष्या-द्वेष या पक्षापात को त्याग, कर्तव्यकर्म का विचार कर मर्यादा का ध्यान रखते हुये उत्तर दो कि तुम पर्वतों के नितम्ब अर्थात कटि प्रदेशों (गुहा, कन्दरा आदि) का आश्रय लेना चाहते हो या फिर कामवेग से मुस्काती विलासिनियों के कटिप्रदेश का सेवन करना चाहते हो।‘‘।। 18।।

भर्तृहरि इस श्लोक में समझाते है कि स्त्रियां ’रत्नस्वरूपा‘ ही होती हें-’’मुख चन्द्रकान्ति के समान, केश इन्द्रनीलमणि के तुल्य और हाथ पदमराग मणि के समान होने के कारण स्त्रियां रत्न-स्वरूपा ही हैं।‘‘।।20।।

भाग्यशाली मनुष्य ही स्त्री सुख प्राप्त करते हैं ऐसा भर्तृहरि का मानना है-’’कुछ भाग्यशाली पुरूष ही, पुरूषायित सुरत के समय हृदय पर आरूढ़ होने वाली, सुरत-वेग से बिखरे हुये केश वाली, लज्जा के कारण मीलित (बन्द) नेत्रवाली तथापि उत्सुकता वश अर्धखुली आंखों वाली, मैथुन-श्रम से उत्पन्न स्वेद-बिन्दुओं से आर्द्र गण्डस्थलों (कपोलों) वाली वधुओं के अधर मधु का पान करते हैं।‘‘।। 26।।

भर्तृहरि कहते हैं कि कामातुर मनुष्य अपना मान सम्मान सब कुछ खो देता है-’’मनुष्य का गौरव, विद्वता, कुलीनता और विवेक, सद्विचार आदि तभी तक बने रहते हैं जब तक अंगों में कामाग्नि प्रज्वलित नहीं होती। कामपीडि़त व्यक्ति अपना मान-सम्मान सब कुछ खो देेेता है।‘‘।। 61।। भर्तृहरि का निम्न श्लोक प्रसिद्ध उक्ति ’’कामातुराणां न भयं न लज्जा‘‘ को सिद्ध करती प्रतीत होती है।

भर्तृहरि ने संसार रूपी नदी को पार कर पाने में स्त्री को बाधा(?) बताया है-’’ऐ संसार! तुम्हारा अन्तिम छोर बहुत दूर नहीं है, समीप ही है। यदि मध्य में अशक्य महानदियों की भांति मदिरा से पूर्ण नयन वाली ये सुन्दरियां न होती तो तुझे तर जाना कठिन न होता।‘‘ ।। 68।।

भर्तृहरि कहते हैं पता नहीं स्त्रियों को ’प्रिया‘ क्यों कहते हैं-’’जो स्मरण करने पर संताप(?) को बढ़ाती हैं, दिखाई पड़ने पर काम को बढ़ाती है और उन्मत्त बना देती हैं तथा स्पर्श करने पर मोहित कर लेती है-ऐसी स्त्रियों को लोग पता नहीं ’प्रिया‘ क्यों कहते हैं।’’।। 73।।

स्त्रियों की मानसिक ऊहापोह का विलक्षण वर्णन भर्तृहरि एक मनौवैज्ञानिक की भांति करते हुये कहते हैं-’’स्त्रियां वार्तालाप तो किसी से करती है, हावभाव के साथ देखती किसी और को हैं, और हृदय में किसी अन्य से ही मिलने के विषय में सोचती हैं। ऐसी स्थिति में यह पता ही नहीं चलता कि इनमें स्त्रियों का सबसे प्रिय कौन है? अथवा स्त्रियां बात किसी से करती हैं देखती किसी को हैं, हृदय में किसी और का चिन्तन करती हैं फिर स्त्रियों का प्रिय कोैन है अर्थात कोई नहीं है‘‘।।81।।

भर्तृहरि अपने ’मन‘ से कहते हैं-"हे मन रूपी यात्री ! कुच रूप पर्वतों के कारण दुर्गम, कामिनी के शरीर रूपी वन की ओर मत जा क्योंकि वहां कामदेव रूपी लुटेरा रहता है।"।।84।।

भर्तृहरि कहते हैं कि जिस पुरूष के मन में स्त्री का देखकर विकार उत्पन्न नहीं होता, वे धन्य हैं-’’सुन्दर, चंचल एवं विशाल नेत्रों वाली, यौवन के गर्व से अत्यंत पुष्ट स्तनों वाली, क्षीण, उदर के ऊपर मध्यभाग में त्रिवली लता से शोभायमान विलासिनियों की आकृति को देखकर भी जिसके मन में विकार उत्पन नहीं होते, वे ही पुरूष धन्य हैं।‘‘।।92।।

इस श्लोक में भर्तृहरि ने स्त्रीयों के संबंध में अति ही कर दी है-’’संशयों का भंवर......... पाश (बन्धन) वह स्त्री रूपी यन्त्र किसने निर्मित किया है?‘‘।।76।। पाठकजनों!! महाराज भर्तृहरि स्त्री द्वारा ठगे गये थे फलस्वरूप उन्होने स्त्री जाति के लिये चुन-चुन कर कटु, कठोर व अयुक्त शब्दों का प्रयोग किया है। किसी एक स्त्री के दोषों को सारी स्त्री-जाति पर लादना अनुचित है।

महाराज भर्तृहरि लिखते हैं कि संसार में कामदेव ने सभी का गर्व चूर कर दिया है-’’इस संसार में मतवाले गजराज के गण्डस्थों को विदीर्ण करने वाले शूर-वीर विद्यमान हैं। क्रोध में भरे हुुये अत्यंत प्रचण्ड सिंह का वध करने में चतुर और समर्थ वीर भी संसार में बहुत हैं परन्तु मैं बलवान के समक्ष दृढ़तापूर्वक कहता हूंँ कि कामदेव के गर्व को खण्डित करने वाला संसार में कोई बिरला ही मनुष्य होगा।‘‘ ।।58।। (महावीर हनुमान, भीष्म पितामह आदि ऐसे बिरले मनुष्य थे)

भर्तृहरि लिखते हैं कि कामदेव श्वान (कुत्ते) को भी पागल कर देते हैं-’’खाना न मिलने के कारण दुर्बल, काना, लगड़ा, कटे कान वाला, बिना पूंछ वाला, घायल और हजारों कृमियों से व्याप्त शरीर वाला, भूख का मारा हुआ, बुढ़ापे के कारण शिथिल, मिटटी के घड़े का मुंह जिसके गले में फंसा हुआ है-ऐसा कुत्ता भी मैथुनार्थ कुतियों के पीछे-पीछे दौड़ता है। अहो! कामदेव सब प्रकार से नष्ट उस कुत्ते को और भी मार रहा है।‘‘।। 63।।

भर्तृहरि अपने शतक के 98 वें श्लोक में स्वयं स्वीकार करते हैं-’’अब तक मुझे कामदेव रूपी तिमिर रोग से उत्पन्न अज्ञान था तब तक मुझे यह संसार नारीमय दिखाई देता था। परन्तु जब हमने विवेक रूपी अंजन अपनी आंखों में लगाया तब हमारी दृष्टि सम हो गई और तीनों लोक हमें, ब्रह्ममय दिखाई देने लगे हैं।‘‘।।98।।

इसके अतिरिक्त भर्तृहरि ने अपने शतक में वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त व शिशिर ऋतु में स्त्री व स्त्री प्रसंग का अत्यधिक श्रंगारिक (कामुक) वर्णन किया है, जिसका वर्णन यहां करना उचित नहीं होगा। पाठकजनों!! मैंने श्रृंगार शतक में से कुछ श्लोक आपके सम्मुख प्रस्तुत किये हैं, आप इनसे कहां तक सहमत हैं, ये तो आपके कमेण्टस से ही पता चलेगा। उपरोक्त श्लोंको को पढ़कर यदि हम भर्तृहरि के श्रृंगार शतक को काम और कामिनी का विश्वकोष कहें, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
चित्र गूगल-इमेज से साभार!)
                            -संकलन-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
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आओ! जाने क्या है ‘भर्तृहरि-नीति‘ ?

भर्तृहरिनीति
भर्तृहरि नीति 
छोटे-छोटे पद्य अथवा श्लोक लिखने में भारतीय सबसे आगे हैं। उनका रीति पर अधिकार, उनकी कल्पना की उड़ान, उनकी अनुभूति की गहराई और कोमलता-सभी अत्युत्कृष्ट हैं। जिन व्यक्तियो ने ऐसे पद्य लिखे हैं उनमें भर्तृहरि अग्रणी हैं। ये शब्द पाश्चात्य लेखक आर्थर डब्ल्यू राइडर ने लिखे हैं जिनसे सिद्ध होता है कि भर्तृहरि के पद्य भारतवासियों पर ही नहीं बल्कि विदेशियों पर भी अपनी छाप छोड़ने में सक्षम हैं।

भर्तृहरि ने अपने शतकम् को तीन भागों में बांटा है यथा नीति शतकम्-श्रंगार शतकम् व वैराग्य शतकम्। इस आलेख में, मैं नीति शतकम् के चुनिंदा श्लोक आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ -

नीति शतकम् में मनुस्मृति और महाभारत की गम्भीर नैतिकता, कालीदास की-सी प्रतिभा के साथ प्रस्फुटित हुई है। विद्या, वीरता, दया, मैेत्री, उदारता, साहस, कृतज्ञता, परोपकार, परायणता आदि मानव जीवन को ऊंचा उठानेेेे वाली उदात्त भावनाओं का उन्होेेेंनेेे बड़ी सरल एवं सरस पद्यावली में वर्णन किया है। उन्होंने इसमें जिन नीति-सिद्धांतों का वर्णन किया है वे मानव मात्र के लिए अंधरेेे में दीपक के समान हैं।


अज्ञानी की निन्दा करते हुये भर्तृहरि लिखते हैं-‘‘अज्ञानी को आसानी से समझाया जा सकता है ज्ञानी को और भी सरलता से समझाया जा सकता है किन्तु ज्ञान-लव-दुविर्दग्ध (थोड़ा जानकर ही अपने को पंडित मानने वाले को) को ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते।‘‘ (2)

मौन को एक महान गुण बताते हुये वे लिखते हैं-‘‘परमात्मा ने मौन रहना अपनेे अधीन और सदा लाभ पहुंचाने वाला एक ऐसा गुण बनाया है जो मूर्खता को ढ़के रहता है, उसे प्रकट नहीं होने देता। यह मौन विद्वत समाज में मूर्खो के लिए विशेष रूप से आभूषण बन जाता है।‘‘ (6)

भर्तृहरि बताते हैं कि मुझे अपनी मूर्खता का पता कैसे चला-‘‘जब मैं अल्पज्ञ था तब मदोन्मत्त हाथी की भांति घमण्ड से अन्धा हो गया था और मैं यह समझता था कि ‘मैं सब कुछ जानता हूँ‘ परन्तु जब बुद्धिमानों के संसर्ग से कुछ-कुछ ज्ञान हुआ तब पता चला कि ‘मैं तो मूर्ख हूंँ‘, उस समय मेरा अभिमान ज्वर की भांति उतर गया।‘‘(7)


भर्तृहरि ज्ञानहीन को क्या कहते हैं?-‘‘जो मनुष्य साहित्य, संगीत कला, और कलाओं (शिल्प आदि) से अनभिज्ञ है वह बिना पूंछ और सींग का पशु ही है। यह मनुष्य रूपी पशु बिना घास खाये ही जीवित रहता है और यह प्राकृत पशुओं के लिए बड़े सौभाग्य की बात है, अन्यथा यह पशुओं का चारा और घास ही समाप्त कर देता।(11)

विद्याधन की प्रशंसा करते हुये भर्तृहरि लिखते हैं-‘‘विद्या ही मनुष्य की शोभा है, विद्या ही मनुष्य का अत्यंत गुप्त धन है। विद्या भोग्य-पदार्थ, यश और सुख देने वाली है। विद्या गुरूओं का भी गुरू है। विदेश में विद्या कुटुम्बी-जनों के समान सहायक होती है। विद्या ही सबसे बड़ा देवता है, राज्य सभाओं में विद्या का आदर सम्मान होता है, धन का नहीं! अतः विद्या-विहीन मनुष्य पशु के तुल्य होता है।‘‘(19)


भर्तृहरि कहते हैं निम्न व्यक्तियों को अलंकार की आवश्यकता नहीं है-‘‘मनुष्य के पास यदि क्षमा (सहनशीलता) हो तो उसे कवच की क्या आवश्यकता? जो क्रोधी है उसे शत्रुओं से क्या प्रयोजन? जिसकी जाति बिरादरी है उसे अग्नि से क्या? यदि हितैषी सच्चे मित्र हैं तो अमोघ व दिव्य औषधियों से क्या लाभ? यदि दुर्जनों के साथ सम्पर्क है तो सांपों का क्या काम? जिसके पास निर्दोष विद्या है उसे धन से क्या वास्ता? जो लज्जा शील है उसे अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता? जो सुन्दर कविता कर सकता है उसके लिए राज्य क्या वस्तु है।‘‘(20)

भर्तृहरि ने पुरूषों की तीन श्रेणियां बतायी हैं-‘‘नीच या अधम श्रेणी के मनुष्य विध्नों के भय से किसी कार्य को आरम्भ ही नहीं करते, मध्यम श्रेणी के लोग कार्य का आरम्भ करके भी विध्न आने पर विध्नों से विचलित होकर बीच में कार्य को छोड़ देते हैं परन्तु उत्तम श्रेणी के मनुष्य विध्नों के द्वारा बार-बार ताडि़त किये जाने पर भी प्रारम्भ किये हुये कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं छोड़ते।‘‘(26)

भर्तृहरि ‘मान-शौर्य‘ की प्रशंसा इस प्रकार करते हैं-‘‘मदमस्त गजराज के फाड़े हुये मस्तक के मांस को ही खाने की इच्छा रखने वाला, अभिमानियों में अग्रगण्य, भूख के कारण क्षीण, बुड़ापे के कारण दुर्बल एवं दीन, पराक्रम से हीन, शोचनीय दशा को प्राप्त, नष्टतेज और मरणासन्न सिंह क्या कभी सूखी घास खा सकता है? कभी नहीं।‘‘(28)


‘गम्भीरता‘ धारण करने को वे एक महान गुण मानते हैं-‘‘कुत्ता टुकड़ा देने वाले के सामने पूँछ हिलाता है, उसके पैरों पर गिरता है, फिर पृथ्वी पर लेट कर मुख और पेट दिखाता है, परन्तु गजराज अपने अन्नदाता की ओर गम्भीरता से देखता है और सैकड़ों खुशामदों के बाद ही भोजन करता हैै।‘‘(30)

भर्तृहरि कहते हैं, निम्न कार्यो की अति से बचना चाहिए-‘‘खोटी सम्पत्ति रखने से राजा, अधिक मेल-जोल से योगी, लाड़-प्यार से पुत्र, अध्ययन न करने से ब्राह्मण, कुपुत्र से कुल, दुष्टों के संग से शील, मद्यपान से लज्जा, देखभाल न करने से खेेती, विदेश में अधिक रहने से प्रेम, स्नेह न होने से मित्रता, अनीति से ऐश्वर्य और अन्धाधुन्ध दान देने या व्यय करने से धन नष्ट हो जाता हैै।‘‘(38)

भर्तृहरि ने धन की तीन गतियां बतायी-‘‘दान देना, उपभोग करना और नष्ट हो जाना-धन की ये तीन ही गतियां हैं। जो न दान देता है और न भोग करता है उसके धन को तीसरी गति (अर्थात नष्ट हो जाता है) प्राप्त होती है।‘‘(39)

भर्तृहरि बताते है, ‘‘निम्न की शोभा कृशता या दुर्बलता में ही हुआ करती हैं-‘‘खराद पर घिसा हुआ हीरा, शस्त्रों द्वारा घायल किया गया संग्राम-विजेता, मदमस्त हाथी, शरद ऋतु में कुछ-कुछ सुखे हुये किनारों वाली नदी, रतिक्रीडा में दली-मली गयी नवयौवना नारी, और अतिदान के कारण कंगाल हुआ पुरूष-इन सभी को शोभा कृशता अथवा दुर्बलता में ही होती है।‘‘(40)

भर्तृहरि दुष्टों व्यक्तियों के बारे में कहते हैं-‘‘दुष्ट लोग लज्जाशील को मुर्ख, व्रत में रूचि रखने वाले को दम्भी, पवित्र पुरूषों को कपटी, शूरवीर को दयाहीन, मुनि को विपरित बुद्धि, मधुर-भाषी को दीन, तेजस्वी को घमण्डी, सुवक्ता को बड़बड़ाने वाला, और धीर गम्भीर शान्त मनुष्य को असमर्थ कहते हैं। गुणियों का ऐसा कौन सा गुण है जिसे दुष्टों ने कलंकित न किया हो।‘‘ (50)


भर्तृहरि कहते हैं ये चीजें मुझे कांटों की तरह चुभती हैं-‘‘दिन के समय कांतिहीन चन्द्रमा, यौवनहीन स्त्री,(इस बात से मैं 'लेखक' सहमत नहीं?) कमल रहित सरोवर, सुन्दर पुरूष का विद्यारहित मुख, धन-लोलुप राजा, सदा दुर्दशा में पड़ा हुआ सत्पुरूष तथा राज्यसभा में सम्मानित दुर्जन-ये सातों मुझे कांटे की भांति चुभते हैं।‘‘ (52)

सेवा धर्म को भर्तृहरि बहुत कठिन मानते हैं-‘‘सेवक मौन रहने पर गूंगा, बातचीत करने में निपुण हो तो बावला, अथवा बकवासी, पास रहने पर ढीठ, दूर रहने पर बुद्धिहीन, क्षमा करने से डरपोक, और असहिष्णु होने पर अकुलीन कहलाता है अतः सेवा धर्म बहुत कठिन है, योगियों के लिए भी इसे निभाना और समझना कठिन है।‘‘(54)

दुर्जनों की प्रीति का वर्णन भर्तृहरि बड़ी बुद्धिमता से करते हैं-‘‘जैसे दिन के पहले भाग की छाया पहले लम्बी और फिर क्रमशः घटती चली जाती है वैसे ही दुष्ट की मित्रता भी पहले अत्यंत घनिष्ट प्रतीत होती है परन्तु धीरे-धीरे कम होती जाती है, इसके विपरीत सज्जन की मित्रता आरम्भ में स्वल्प-सी होती है परन्तु बाद में मध्याह्नोत्तर की छाया के समान उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है।‘‘(56)

भर्तृहरि कहते हैं, संगति से ही व्यक्ति में गुण-अवगुण आते हैं-‘‘गर्म लोहे पर पड़ी हुई पानी की बूंद का नामो-निशान नहीं रहता, वही बूंद कमल के पत्ते पर गिरकर मोती के समान चमकने लगती है, फिर वही बूंद स्वाति नक्षत्र में समुद्र की सीप मेें गिरकर मोती बन जाती है अतः यह सिद्ध हुआ कि अधम, मध्यम और उत्तम गुण मनुष्य में संत्सर्ग से ही उत्पन्न होते हैं।‘‘ (63)


निम्न में से एक को चुनने की सलाह भर्तृहरि देते हैं-‘‘मनुष्य को एक ही देव में भक्ति रखनी चाहिये, चाहे वो विष्णु हो अथवा शिव, एक ही मित्र बनाना चाहिए चाहे वह राजा हो या योगी, एक ही स्थान पर रहना चाहिए चाहे वह नगर हो या वन और एक ही पत्नी होनी चाहिए, चाहे व सुन्दर स्त्री हो या पर्वत की कन्दरा गुफा अर्थात वैराग्य।‘‘(65)

भर्तृहरि कहते हैं कि, परोपकारी से परोपकार करने के लिए कोई नहीं कहता-‘‘बिना याचना किये ही सूर्य कमल-समूह को विकसित करता है, चन्द्रमा भी बिना किसी प्रेरणा से स्वयं ही कुमुदों को प्रफुल्लित करता है, बादल भी बिना प्रार्थना के ही जल बरसाते हैं, इसी प्रकार सज्जन भी अपने आप परोपकार में लगे रहते हैं।‘‘(70)

भाग्य और पुर्वसंस्कार के बारे मे भर्तृहरि बहुत सुन्दर लिखते हैं-‘‘यद्यपि मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार फल मिलता है सुख-दुख की प्राप्ति होती है और बुद्धि भी कर्मानुसार ही प्राप्त होती है फिर भी बुद्धिमान मनुष्य को विचारपूर्वक ही कर्म करना चाहिए।‘‘(83)


भर्तृहरि कहते हैं भाग्य का लिखा कोई नहीं मिटा सकता-‘‘यदि करील के वृक्ष पर पत्ते नहीं लगते तो इसमें बसन्त ऋतु का क्या दोष? यदि उल्लू को दिन में नहीं दिखाई देता तो इसमें सूर्य का क्या अपराध? यदि चातक के मुंह में वर्षा की बूंदे नहीं पड़ती तो इसमें बादल का क्या दोष? भगवान ने जिसके भाग्य में जो लिखा है उसे कौन मिटा सकता है?‘‘(86)

भर्तृहरि कहते हैं निम्न परिस्थितियों में मनुष्य के पूर्वजन्म के संस्कार ही उसकी रक्षा करते हैं-‘‘वन में, युद्ध में, शत्रुओं से घिरने पर, जल में , अग्नि में, महासमुद्र में, पर्वत की चोटी पर, सुप्त अवस्था में, असावधानी की दशा में, तथा संकट पड़ने पर मनुष्य के पूर्व जन्मकृत कर्म ही उसकी रक्षा करते हैं।‘‘(89)     -संकलन-संजय कुमार गर्ग 87918205465 Whatsapp
  (चित्र गूगल-इमेज से साभार!)