सूरदास के भ्रमर गीत की विशेषताएं क्या हैं?

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भ्रमर गीत से क्या आशय है? 

सूरदास जी के ये गीत श्रीमद्भागवत के 10 वे स्कंध के 47 वें श्लोक में दिया गया हैं जिसमें गोपियां ऊधव को और श्रीकृष्ण को उलाहने देती हैं। वैसे अनेकों पुस्तक में यह भी बताया गया है कि पहले महिलायें किसी पराये पुरूष से सीधे बात नहीं करती थीं, ऊधव श्रीकृष्ण का संदेश गोपियों को दे रहे थे तभी वहां एक भौरां आ जाता है, तो गोपियां अपनी सारी बातें उसी भौंरे का संबोधित करते हुये कहती हैं, इसलिए इसका नाम भ्रमर गीत पड़ा।

सूरदास जी के काव्य नायक श्रीकृष्ण हैं। उन्होंने कृष्ण के जीवन चरित के बाल्यकाल, किशोरावस्था और तरूणावस्था का सबसे ज्यादा काव्यमय चित्रण किया है। वैसे कुछ आलोचकों का कहना है कि सूरदास ने श्रीकृष्ण के चरित का रति (Love प्रधान बना दिया है। परन्तु यदि हम समालोचना की दृष्टि से देखें तो इस रति के भी तीन रूप दिखायी देते हैं-भगवत विषयक रति, वात्सल्य रति और दाम्पत्य रति। वात्सल्य और दाम्पत्य रति का चित्रण सूर ने जिस प्रकार किया है उसे देखकर लगता है कि सूरदास किस स्तर के मनोवैज्ञानिक व उत्कृष्ट स्तर के भावुक कवि रहे होंगे। आइये अब जानते हैं कि सूरदास के भ्रमर गीत की विशेषताएं क्या हैं?

सूरदास के भ्रमर गीत की विशेषताएं


जब श्री कृष्ण उद्वव को मथुरा भेज रहे थे तो उनसे नन्द के लिए क्या संदेश दे रहे हैं-
कहियो नन्द कठोर भये
हम दोउ वीरै डारि पर-घरै किए मानो थाती सौपि गए।

उसके बाद यशोदा को संदेश देते हुए कहते हैं-
पथिक! संदेसौ कहियो जाय।
आवैगे हम दोनों भैया मैया जनि अकुलाय।।

सूरदास आगे कन्हैया की बाल सुलभ मन का कितना सुन्दर चित्रण करते हैं-
नीके रहियो जसुमति।
आवेंगे दिन चार-पांच में, हम हलधर दोए भैया।।
जा दिन ते हम तुम ते बिछड़े काहु न कहयो कन्हैया।
कबहु प्रान न कियो कलेवा, सांझ न पी-ही धैया।।
वंशी वेनु संभारि राखियों, और अबेर सबेर।
मति लै जाय चुराय राधिका, छुक खिलौनों मेरो।
इस पद में सूरदास ने ‘‘काहु न कहयो कन्हैया’’ और ‘मति लै जाय चुराय राधिका कछुक खिलौना मेरो’’ वात्सल्य सुलभ मन व मां के ममत्व का कितना सुन्दर चित्रण किया है। 

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दाम्पत्य जीवन का कितना सुन्दर क्रमिक विकास सूरदास के काव्य में उजागर होता है, वैसा कहीं अन्य स्थान पर देखने को नहीं मिलता, जब गोपियां स्वयं कहती हैं- 
लरिकाई का प्रेम कहो अलि कैसे करिके छूटत।
सूरदास मोहि निमिष न बिसरत मोहन मूरति सोवत जागत।।
हे उद्धव! यह बचपन का प्रेम है, ये अब नहीं छूट सकता, हम तो मोहन की छवि को एक निमिष के लिए भी नहीं भूल सकती।

गोपियां उद्धव से कितने सुन्दर शब्दों में कहती हैं, कि हमने कितने संदेश कृष्ण जी को लिख कर रखे हैं, उनसे हमारे कुंए भर गये हैं जो भी पथिक यहां से राजमहल जाते हैं वो वापस ही नहीं लौटते, क्या उनको श्याम ने समझा-बुझा दिया है या फिर वो सारे बीच में ही मर गये हैं-
संदेसनि मधुबन कूप भरे।
जो कोउ पथिक गए हैं यहौं तें फिरि नहिं अवन करें।।
कै वै स्याम सिखाय समोधे कै वै बीच मरे।

किसी के वियोग में पुरानी बातें याद आती हैं उन्हें याद कर-करके हम दुःखी होते हैं यही दशा गोपियों की भी है-
मेरे मन इतनी सूल रही।
एक दिवस मेरे गृह आये, मैं हो मष्यति दही।
देखि तिन्है हौ मान कियो, सो हरि गुसा गही।
गोपियां कहती हैं कि मेरे मन में इस बात को सोच कर अत्यंत पीड़ा होती है, एक दिन कृष्ण मेरे घर आये थे, मैं दही मथ रही थी, मैंने ना तो उनकी ओर देखा ना ही उनका मान किया, कदाचित् इसी कारण से कृष्ण हमसे रूष्ट हो गये हैं।

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सूरदास कहते हैं कि गोपियां सोचती थी कि श्री कृष्ण किसी भी प्रकार यहां आ जाये बस तरह-तरह से उन्हें रिझाने मनाने का प्रयास करती हैं, कभी व नंद यशोदा की व्यथा तो कभी गायों की व्याकुलता के बारे में बताती हैं-
ऊधो! इतनी कहियो जाय।
अति कृशगात भई ये तुम बिन परम दुःखारी गाय।

सूरदास जी के विरह वर्णन में इतनी व्यापकता है कि विरह की सभी दशाओं का उन्होंने सुन्दर व मार्मिक वर्णन प्रस्तुत किया है, वे लिखते हैं कि कभी गोपियां अपनी विरह की दशा का वर्णन करती हैं तो कभी वृषभानु की लाडली राधा रानी की दशा का वर्णन करती हैं-
उधौ बिरहौ प्रेम करौ।
ज्यों बिनु पुट पट गहत न रंगहि पुर गहि रसहि परौ।
अति मलीन वृषभानु कुमारी।
हरि स्रमजल भीज्यौ उर अंचल तिहि लालच न धुवावति सारी।।
राधा अति मलीन हो गयी हैं, उनकी साड़़ी का आंचल श्री कृष्ण की स्मृति में रोते-रोते आंसुओं से भीग गया है, क्योंकि आंचल श्री कृष्ण की स्मृति में भीगा है अतः राधा अपनी सारी को धुलवाती ही नहीं हैं।

वियोग की दशा में दुःखिया का मन कभी स्थिर नहीं रहता है। इसी प्रकार गोपियों भी कभी यमुना जी को यम बताने लगती हैं कि उन्होंने ही हमारे और कृष्ण के बीच व्यवधान उत्पन्न कर दिया है जिससे हम उनसे नहीं मिल पा रहे हैं, क्योंकि नन्दगांव और मथुरा के बीच यमुना जी बहती हैं। महाकवि लिखते हैं-
मोके माई जमुना जमवय वय रहै।
कैसे मिलौं स्याम सुन्दर कौ वैरलि बीच रहै।

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कभी गोपियां ऊधव से कहती हैं कि हमें क्यों समझा रहे हों हम तो नंद गांव की रहने वाली सीधी-साधी गोपियां हैं, तुम्हारे ब्रहमा की अष्ट सिद्धियों से हमें क्या काम है, कितना सुन्दर वर्णन सूरदास जी ने किया है-
हम तो नंद घोस की बासी।
नाम गोपाल, जाति कुल गोपहि, गोप-गोपाल-उपासी।।
गिरवरधारी   गोधनचारी,   वृन्दावन - अभिलाषी।
राज नंद जसोदा रानी,  जलधि  नदी  यमुना  सी।।
प्रान हमारे  परम  मनोहर  कमलनयन  सुखरासी।
सूरदास प्रभु कहौं कहां लौं अष्ट  महासिधि दासी।।

सूरदास ने विरह की परकाष्ठा का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है कि जब गोपियां अपनी खीज मिटाने के लिए श्री कृष्ण को ही बुरा-भला कहने लगती हैं, आप काहे के गोपीनाथ हो, आप गोकुल क्यों नहीं आते, और सपने की जान-पहचान बता कर हम पर कलंक क्यों लगवा रहे हों।
काहे को गोपीनाथ कहावत?
जो पै मधुकर कहत हमारे गोकुल काहे न आवत?
सपने की पहिचानि जानि कै हमहिं कलेक लगावत।

हरि के प्रेम विरह में दुःखी गोपियों का वर्णन जैसा सूरदास ने किया है, अन्यंत्र मिलना कठिन है, गोपियां ऊधों से कहती हैं हमारे हरि, हारिल की लकड़ी हैं (हारिल पक्षी जो प्रायः एक लकड़ी या तिनका अपनी चोंच में हमेशा लियेे रहता है) हमने उन्हें दृढ़ता से पकड़ रखा है, हम जागते सोते हमेशा हरी-हरी की रट लगाये रहते हैं। हमें तो तुम्हारा योग कड़वी ककड़ी की तरह लग रहा है।
हमारे हरि हारिल की लकड़ी
मन बच क्रम नंद नंदन सों उर यह दृढ़ करि पकरी।।
जागत, सोबत, सपने सौंतुख  कान्ह-कान्ह  जक री।
सुनतहि जोग लगत ऐसो अलि! ज्यों करूई ककरी।।

कभी गोपियां कहती हैं कि हमें तो केवल हरि की कथा ही सुननी है अपनी ज्ञान कथा को तुम मथुरा ही जाकर सुनाना, कितना सुन्दर उपालंभ (ताना), गोपियां ऊधो को देती हैं-
हमको हरि की कथा सुनाव।
अपनी ज्ञानकथा  हो  ऊधो!  मथुरा  हीलै  गाव।।
नागरि नारि भले बूझैंगी अपने  वचन  सुभाव ।।
सूरदास मीनन को जल बिनु नाहिंन और उपाय।
इस आलेख में इतना ही फिर किसी आलेख में सूरदास जी के ओर पदों को लेकर आउंगा।

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, एस्ट्रोलाॅजर, वास्तुविद् मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
sanjay.garg2008@gmail.com  (All rights reserved.)

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