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विदुर बताते हैं, कौन से व्यक्ति अपनी आयु पूर्ण नहीं कर पाते!

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‘विदुर नीति’ महाभारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है। इसमें महात्मा विदुर ने राजा धृतराष्ट्र को कल्याण करने वाली अनेक बातें बतायी थीं। महाभारत में उद्योगपर्व के 33 वें से 40 वें अध्याय तक आठ अध्याय इसी प्रसंग से संबंधित हैं। इन आठ अध्यायों में महात्मा विदुर ने राजा धृतराष्ट्र को नीति, धर्म, सत्य, परोपकार, राजधर्म आदि के बारे में बड़े ही सुन्दर व मार्मिक ढ़ंग से समझाया है। विदुर नीति पर मैं पहले ही पांच आलेख लिख चुका हूं जिनके लिंक आपको इसी पोस्ट में मिल जायेंगे। इस छठे आलेख में नये श्लोकों को सम्मिलित किया गया है पहले आलेखों के श्लोकों को इस पोस्ट में सम्मिलित नहीं किया गया है। आइये पढ़ते हैं महात्मा विदुर का नीति संबंधी ज्ञान-

विदुर बताते हैं, कौन से व्यक्ति अपनी आयु पूर्ण नहीं कर पाते!


विदुर कहते हैं कि ‘‘जो मनुष्य जैसा बर्ताव करे, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए, यही नीति धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपटपूर्ण बर्ताव करें और अच्छा बर्ताव करने वालों के साथ अच्छा बर्ताव ही करना चाहिए।’’ (5, 7)

विदुर बताते हैं कि ‘‘बुढ़ापा रूप का, आशा धैर्य का, मृत्यु प्राणों का, असूया धर्माचरण का, काम लज्जा का, नीच पुरूष की सेवा आचरण का, क्रोध लक्ष्मी का और अभिमान सर्वस्व का नाश कर देता है।’’ (5, 8)

धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा जब वेदों में पुरूष को सौ वर्ष की आयु वाला बताया है तो वह किस कारण से अपनी आयु पूर्ण नहीं कर पाता है? महाराज विदुर ने उत्तर दिया-राजन! ‘‘अत्यंत अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता और मित्र से द्रोह ये छः तीखी तलवारें देह धारियों की आयु को काटती हैं। ये ही मनुष्य का वध करती हैं, मृत्यु नहीं।’’ (5, 9-10-11)

विदुर बताते हैं-‘‘जो अपने ऊपर विश्वास करने वाली स्त्री के साथ समागम करता है, जो गुरू स्त्रीगामी है, ब्राहमण होकर शुद्र की स्त्री से संबंध रखता है, शराब पीता है तथा जो बड़ों पर हुक्म चलाने वाला है, दूसरों की जीविका नष्ट करने वाला है, ब्राह्मण से सेवा कार्य कराने वाला है और जो शरणागत के साथ हिंसा करने वाला है-ये सब के सब ब्रह्महत्यारे के समान हैं, इनका संग हो जाने पर प्रायश्चित करना चाहिए, ऐसी वेदों की आज्ञा है।’’ (5, 12-13)

विदुर बताते हैं कि कौन से व्यक्ति स्वर्गगामी होते हैं-बड़ों की आज्ञा मानने वाला, नीतिज्ञ, दाता, यज्ञ शेष अन्न भोजन करने वाला, हिंसा रहित, अनर्थकारी कार्यों से दूर रहने वाला, कृतज्ञ, सत्यवादी और कोमल स्वभाव वाला विद्वान स्वर्गगामी होते हैं।’’ (5, 14)


ऋषिवर आगे कहते हैं कि हे राजन! सदा प्रिय वचन बोलने वाले मनुष्य तो सहज में ही मिल सकते हैं, किन्तु जो अप्रिय होता हुआ हितकारी हो, ऐसे वचन के बोलने वाले और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ होते हैं।’’ जो धर्म का आश्रय लेकर तथा स्वामी को यह प्रिय लगेगा या नहीं लगेगा-इसका विचार छोड़कर अप्रिय होने पर भी हित की बात कहता है, उसी से राजा को सच्ची सहायता मिलती है।’’ (5, 16-17)

विदुर बताते हैं कि ‘‘कुल की रक्षा के लिए एक मनुष्य का, ग्राम की रक्षा के लिए कुल का, देश की रक्षा के लिए एक गांव का और आत्मा के कल्याण के लिए सारी पृथ्वी का त्याग कर देना चाहिए।’’ (5, 17) बिल्कुल ऐसी ही बात चाणक्य नीति के अध्याय 3 के 10 वें श्लोक में भी कही गयी है।

विदुर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि ‘‘सावधान मनुष्य विश्वास करके सायंकाल में कभी किसी दूसरे अविश्वस्त मनुष्य के घर न जाये, रात को छिपकर चैराहे पर न खड़ा हो और राजा (बलवान व्यक्ति) जिस स्त्री को ग्रहण करना चाहता हो उसे प्राप्त करने का यत्न न करें।’’ (5, 28)


महात्मा विदुर बताते हैं कि निम्न के साथ लेन-देन (रूपये पैसे का लेनदेन) का व्यवहार न करें-‘‘अधिक दयालु राजा, व्यभिचारिणी स्त्री, राजकर्मचारी, पुत्र, भाई, छोटे बच्चों वाली विधवा, सैनिक और जिसका अधिकार छीन लिया गया हो, पुरूष इन सबके साथ लेन-देन का व्यवहार न करें।’’ (5, 30)

विदुर बताते हैं कि नित्य स्नान करने से क्या लाभ मिलते हैं-‘‘नित्य स्नान करने वाले मनुष्य को बल, रूप, मधुर स्वर, उज्ज्वल वर्ण, कोमलता, सुगन्ध, पवित्रता, शोभा, सुकुमारता और सुन्दर स्त्रियां ये दस लाभ प्राप्त होते हैं।’’ (5, 33)

विदुर बताते हैं कि कम भोजन करने से निम्न लाभ प्राप्त होते हैं-‘‘आरोग्य, आयु, बल और सुख तो मिलते ही हैं, उसकी संतान सुन्दर होती है तथा ‘यह बहुत खाने वाला है’ ऐसा कहकर लोग उस पर आक्षेप नहीं करते।’’ (5, 35)

विदुर आगे कहते हैं कि ‘‘जो अर्थ की पूर्ण सिद्धि चाहते हो, उसे पहले धर्म का ही आचरण करना चाहिए। जैसे स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता, उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।’’ (5, 48)

विदुर इसी बात का आगे बढ़ाते हुये कहते हैं कि ‘‘जो क्रोध और हर्ष के उठे हुए वेग को रोक लेता है और आपत्ति में भी धैर्य को नहीं खो बैठता, वहीं राजलक्ष्मी का अधिकारी होता है।’’ (5, 51)

संकलन-संजय कुमार गर्ग 

विदुर बताते हैं, किन मनुष्यों के सारे काम सिद्ध होते हैं!

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मैंने इससे पहले भी चार पोस्ट विदुर नीति पर प्रकाशित की हैं जिनका लिंक नीचे दिया गया है। इस आलेख में मैंने नीतिज्ञ, महात्मा विदुर के अन्य श्लोकों को सम्मिलित किया है जो पहले प्रकाशित पोस्ट में नहीं है। चलिए पढ़ते हैं महात्मा विदुर का महान नीति संबंधी ज्ञान-


किन मनुष्यों के सारे काम सिद्ध होते हैं!


विदुर कहते हैं कि "मनुष्य अकेला पाप करता है और उस पाप की कमायी ये बहुत से लोग सुख भोगते हैं, सुख भोगने वाले तो पाप से छूट जाते हैं परन्तु उसका कर्ता यानि करने वाला उस पाप का भागी होता है।" (1, 47)

विदुर बताते हैं कि कौन सी व्यक्तियों की रात्रि में क्या स्थिती होती है ‘‘सौतवाली स्त्री, जूए में हारे हुए जुआरी और भार ढोने से व्यथित शरीर वाले मनुष्य की रात में जो स्थिति होती है, वहीं स्थिति उल्टा निर्णय करने वाले व्यक्ति (न्यायाधीश) की भी होती है।"(3, 31)

विदुर कहते हैं कि "जैसे-जैसे व्यक्ति कल्याण के कार्यों में मन लगाने लगता है, वैसे-वैसे उसके सारे अभिष्ट सिद्ध होने लगते हैं, इसमें जरा भी संदेह नहीं है।" (3, 42)

विदुर बताते हैं कौन सा मनुष्य कष्ट को प्राप्त होता है-"गुणों में दोष देखने वाला, मर्म पर आघात करने वाला, निर्दयी, शत्रुता करने वाला और शठ मनुष्य पाप का आचरण करता हुआ शीघ्र ही महान कष्ट को प्राप्त करता है।" (3, 64)

विदुर बताते हैं कि ‘अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक गुरू हैं, दुष्टों के शासक राजा हैं और छिपे-छिपे पाप करने वालों के शासक सूर्य पुत्र यमराज हैं।’’(3, 71)

ऋषिवर आगे कहते हैं कि "ऋषि, नदी, महात्माओं के कुल तथा स्त्रियों के दुष्चरित्र का मूल नहीं जाना जा सकता।" (3, 72)

विदुर बताते हैं कि "दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं गाली न दें, क्षमा करने वाले को रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है और उसके पुण्य को भी हर लेता है।’’(4,5)

विदुर कहते हैं कि "जैसे वस्त्र जिस रंग में रंगा जाये वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असज्जन, तपस्वी अथवा चोर की सेवा करता है तो वह उसी के वश में हो जाता है, उस पर उन्हीं का रंग चढ़ जाता है।" (4, 10)

वाणी के संबंध में विदुर कहते हैं कि "बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है, यानि मौन की अपेक्षा भी दूना लाभप्रद है। सत्य भी यदि प्रिय बोला जाये तो यह तीसरी विशेषता है और वह भी यदि धर्मसम्मत कहा जाय जो यह वचन की चैथी विशेषता है।"(4, 12)

विदुर बताते हैं कि कौन हर्ष-शोक से परे हो जाता है "जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता, न दूसरों को जीतने की इच्छा करता है, न किसी के साथ बैर करता और न दूसरों को चोट पहुंचाना चाहता है, जो निन्दा प्रशंसा में समान भाव रखता है, वह हर्ष-शोक से परे हो जाता है।"(4, 15)

विदुर सेवा करने के विषय में बताते हैं "जो अपनी उन्नति चाहता है, वह उत्तम पुरूषों की ही सेवा करें, समय आ पड़ने पर मध्यम पुरूषों की भी सेवा कर ले, परन्तु अधम पुरूषों की सेवा कदापि न करें।" (4, 20)

विदुर आगे कहते हैं कि "मनुष्य बार-बार मरता है और जन्म लेता है, बार-बार हानि उठाता है और बढ़ता है, बार-बार स्वयं दूसरों से याचना करता है और दूसरे उससे याचना करते हैं तथा बार-बार वह दूसरों के लिए शोक करता है और दूसरे उसके लिए शोक करते हैं। सुख-दुख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि, और जीवन-मरण-ये बारी-बारी से सबको प्राप्त होते रहते हैं, इसलिए धीर पुरूष को इनके लिये हर्ष और शोक नहीं करना चाहिए।’’(4, 46-47)

विदुर बताते हैं कि "सम्यक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्य कर्म और अच्छी तरह से की गयी तपस्या के अंत में सुख की वृद्धि होती है।" (4, 54)

विदुर बताते हैं "नित्य सींचकर बढ़ायी हुई पतली लताऐं बहुत होने के कारण बहुत वर्षों तक नाना प्रकार के झोंके सहती हैं, यह बात सत्पुरूषों के विषय में भी समझनी चाहिए। वे दुर्बल होने पर भी सामूहिक शक्ति से बलवान हो जाते हैं। भारतश्रेष्ठ! धृतराष्ट्र! जलती हुई लकड़ियां अलग-अलग होने पर धुआं फेंकती हैं और एक साथ होने पर प्रज्ज्वलित हो उठती है। इसी प्रकार जातिबन्धु भी फूट होने पर दुःख उठाते हैं और एकता होने पर सुखी रहते हैं।" (4, 59-60)

एकता के संबंध में विदुर आगे कहते हैं कि "यदि वृक्ष अकेला है तो वह बलवान, दृढ़भूत तथा बहुत बड़ा होने पर भी एक क्षण में आंधाी के द्वारा बलपूर्वक शाखाओं सहित धराशायी किया जा सकता है। किन्तु जो बहुत से वृक्ष एक साथ रहकर समूह के रूप में खड़े हैं, वे एक दूसरे के सहारे बड़ी से बड़ी आंधी को भी सह सकते हैं।" (4, 62-63)

विदुर बताते हैं कि कौन अवध्य (न मारने योग्य) होते हैं "ब्राह्मण, गौ, कुटुम्बी, बालक, स्त्री, अन्नदाता और शरणागत ये सभी अवध्य होते हैं।"

संकलन-संजय कुमार गर्ग 

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विदुर नीति के अनुसार लक्ष्मी किस पर कृपा करती हैं!


विदुर नीति के अनुसार लक्ष्मी किस पर कृपा करती हैं!
विदुर नीति
महाभारत काल के महान नीतिज्ञ विदुर जी ने बताया कि प्रकृति हमें अपने बुरे कर्मो के लिये किस प्रकार दंडित करती है- "ईश्वर चरवाहों की तरह डंडा लेकर पहरा नहीं देते, वे जिनकी रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं और जिनका बुरा करना होता है उनकी बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं।" ।।40/3।।

नीतिज्ञ विदुर के अनुसार निम्न कार्य हमें भयमुक्त व भययुक्त दोनों कर सकते हैं-"आदर के साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौन का पालन, आदर पूर्वक स्वाध्याय और आदर के साथ यज्ञ का अनुष्ठान-ये चार कर्म भय को दूर करने वाले हैं, किंतु यदि ये ठीक प्रकार से सम्पादित न हों तो ये ही भय को प्रदान करने वाले बन जाते हैं।" ।।45/3।।


महात्मा विदुर कितनी सुन्दर बात इस श्लोक में लिखते हैं-"बुढ़ापा सुन्दर रूप को, आशा धीरता को, मृत्यु प्राणों को, दोष देखने की आदत धर्माचरण को, क्रोध लक्ष्मी को, नीच पुरूषों की सेवा सत्स्वभाव को, काम लज्जा को, और अभिमान सर्वस्व नष्ट कर देता है।" ।।50/3।।

लक्ष्मी किस व्यक्ति पर कृपा करती हैं विदुर कहते हैं कि-"शुभ कर्मो से लक्ष्मी की उत्पत्ति होेती है, प्रगल्भता से वह बढ़ती है, चतुरता से जड़ जमा लेती है और संयम से सुरक्षित रहती है।" ।।50/3।।


महात्मा विदुर कहते हैं कि निम्न आठ गुण मनुष्य की शोभा बढ़ा देते हैं-"बुद्धि, कुलीनता, दम, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम, ज्यादा न बोलना, यथा क्ति दान देना और समय पर काम आने वालों के प्रति कृतज्ञ होना।" ।।52/3।।

महात्मा विदुर ने धर्म के आठ मार्ग बतायें हैं-"यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ (लालच रहित)-ये धर्म के आठ प्रकार के मार्ग बताये गये हैं।" ।।57/3।।


विदुर ऐसी सभा (मिटिंग) को सभा नहीं मानते थे-"जिस सभा में बड़े-बुढ़े न हो वह सभा, सभा नहीं, जो धर्म की बात न कहे, वे बुढ़े नहीं, जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं और जो कपट से पूर्ण हो, वह सत्य नहीं।" ।।58/3।।

महात्मा विदुर ने निम्न दस साधन स्वर्ग के बताये हैं-"सत्य, विनय का भाव, शास्त्र ज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और चमत्कारपूर्ण? बात कहना-ये दस स्वर्ग के साधन हैं।" ।।59/3।।


दिन, माह, वर्ष व उम्र भर कैसे सुखी रहे, विदुर जी कहते हैं कि-"दिन भर में वह कार्य कर लें, जिससे रात में सुख से सो सके और आठ महीनों में वह कार्य कर लें, जिससे वर्षा के चार महीने सुख से व्यतीत हो सकें, पहली अवस्था में वह कार्य करें, जिससे वृद्धावस्था में सुख-पूर्वक रह सके और जीवन भर वह कार्य करें, जिससे मरने के बाद भी सुख से रह सके।" ।।68/3।।

विदुर कहते हैं कि निम्न कार्यो की प्रशंसा कब होती है-"सज्जन पुरूष पच जाने पर अन्न की, निश्कलंक जवानी बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्वज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं।" ।।69/3।।
(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)-

किन व्यक्तियों को विदुर के अनुसार गवाह न बनायें...


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विदुर नीति 
महात्मा विदुर कहते हैं समझदार व्यक्ति को ये कार्य करने से बचना चाहिये-न करने योग्य काम करने से  व करने योग्य काम में प्रमाद करने से बचना चाहिए तथा कार्य के सिद्ध होने से पहले ही मन्त्र को प्रकट नहीं करना चाहिये और जिससे नशा हो ऐसा पेय नहीं पीना चाहिये। ।। 43/2।।
 
दरिद्र और धनियों के संबंध में विदुर ने बहुत सुन्दर बात कही है-दरिद्र (निर्धन) पुरूष सदा स्वादिष्ट भोजन ही करते हैं, क्योंकि भूख उनके भोजन में खाद उत्पन्न कर देती है और वह भूख धनियों के लिये सर्वदा दुर्लभ है। संसार में धनियों में प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती, किन्तु दरिद्रों के पेट में काठ भी पच जाता है। ।। 50,51/2।।

भय के विषय में विदुर महाराज बहुत गहरी बात लिखते हैं-अधम पुरूषों को जीविका न होने का भय होता है, मध्यम श्रेणी के मनुष्यों में मृत्यु का भय होता है, परन्तु उत्तम श्रेणी के पुरूषों को तो अपमान से ही महान भय होता है। ।। 52/2।।
 
मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि के विषय में विदुर कितना सुन्दर उदाहरण देते है-मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और इन्द्रियां उसके घोड़े हैं। इनको वश में करके सावधान रहने वाला चतुर एवं धीर पुरूष काबू में किये हुये घोड़ों से रथी की भांति सुखपूर्वक यात्रा करता है। शिक्षा न पाये हुये तथा काबू में न आने वाले घोड़े जैसे मूर्ख सारथी को मार्ग मे मार गिराते हैं, वैसे ही ये इन्द्रियां वश में न रहने पर पुरूष को मार डालने में भी समर्थ होती हैं। ।।59,60/2।।

महात्मा विदुर वाणी का प्रयोग सोच समझ कर करने की सलाह देते हैं- वाणों से बींधा हुआ तथा फरसों से काटा हुआ वन भी पनप जाता है, किन्तु कटु वचन कह कर वाणी से किया हुआ भयानक घाव नहीं भरता। ।। 78/2।।
 
विदुर महाराज कहते हैं कि निम्न कार्यो को त्याग देना चाहिये-शराब पीना, कलह, समूह के साथ वैर, पति-पत्नि में भेद उत्पन्न करना, कुटुम्ब वालों में भेदबुद्धि उत्पन्न करना, राजा के साथ द्वेष, स्त्री-पुरूष में विवाद और बुरे रास्ते-ये सब त्यागने योग्य हैं। ।। 43/3।।

विदुर महाराज इन सातों को गवाह न बनाने की सलाह देते हैं-हस्तरेखा देखने वाला, चोरी करके व्यापार करने वाला, जुआरी, वैद्य, शत्रु, मित्र, और नर्तक-इन सातों को कभी भी गवाह न बनाये।   ।। 44/3।।
 
विदुर महाराज ने ये कार्य ब्रह्म हत्या के समान बताये हैं- घर में आग लगाने वाला, विष देने वाला, जारज संतान की कमाई खाने वाला, शराब बेचने वाला, शस्त्र बनाने वाला, चुगली करने वाला, मित्रद्रोही, परस्त्री लम्पट, गर्भ की हत्या करने वाला, गुरूस्त्रीगामी, ब्राह्मण होकर शराब पीने वाला, अधिक तीखे स्वभाव वाला, कौए की तरह कांय-कांय करने वाला, नास्तिक, वेद की निन्दा करने वाला, घूसखोर, पतित, क्रूर तथा शक्ति रहते हुए रक्षा करने की प्रार्थना करने पर भी जो हिंसा करता है-ये सब के सब कार्य ब्रह्म हत्या के समान हैं। ।। 46 से 48/3।।

महात्मा विदुर ने व्यक्ति की पहचान के लिये कितने उत्तम उपाय बताये हैं-जलती हुई आग से सोने की पहचान होती है, सदाचार से सत्पुरूष की, व्यवहार से साधु की, भय आने पर शूर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की, और कठिन आपत्ति में शत्रु और मित्र की परीक्षा होती है। ।। 49/3।।
संकलन-संजय कुमार गर्ग 
(सभी चित्र गूगल-इमेज से साभार!)
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विदुर के अनुसार आठ गुण पुरूषों की ख्याति बढ़ा देते हैं !
उन्नति चाहने वाले छः दुर्गुणों का त्याग दें.. विदुर नीति
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विदुर के अनुसार आठ गुण पुरूषों की ख्याति बढ़ा देते हैं !

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विदुर के अनुसार आठ गुण
विदुर मनुष्य लोक के छः सुखों की व्याख्या करते हैं-नीरोग रहना, ऋणी न होना, परदेश में न रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल रखना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निडर होकर रहना-ये छः मनुष्य लोक के सुख हैं।। 94।। 

महात्मा विदुर कहते हैं कि निम्न छः प्रकार के मनुष्य सदा दुखी रहते हैं-ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन-निर्वाह करने वाला-ये सदा दुखी रहते हैं।। 95।।

महात्मा विदुर कहते हैं कि राजा को निम्न सात दोषों को त्याग देना चाहिये-स्त्रीविषयक आसक्ति, जुआ, शिकार, मद्यपान, वचन की कठोरता, अत्यन्त कठोर दंड देना और धन का दुरुपयोग करना ये सात दुःखदायी दोष राजा को सदा त्याग देने चाहिये, इनसे दृढ़मूल राजा भी प्रायः नष्ट हो जाता है।। 96-97।। 


विदुर महाराज ने हर्ष प्राप्ति के निम्न साधन बताये हैं-मित्रों से समागम, अधिक धन की प्राप्ति, पुत्र का आलिंगन, मैथुन में प्रवृत्ति, समय पर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्ग के लोगों में उन्नति, अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति और समाज में सम्मान-ये आठ हर्ष के सार दिखाई देते हैं और ये ही लौकिक सुख के साधन भी होेते हैं।। 101-103 ।।

पुरुषों के ये आठ गुण ख्याति को बढ़ा देते हैं ऐसा महाराज विदुर का मानना है-बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति के अनुसार दान देना और कृतज्ञता-ये आठ गुण पुरूष की ख्याति बढ़ा देते हैं।। 104 ।।

महाराज विदुर कहते हैं कि निम्न दस प्रकार के लोग धर्म को नहीं जानते-नशे में मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी -ये दस हैं।  विद्वान व्यक्ति इन लोगों से आसक्ति न बढ़ाये।। 106-107।।

धीर कौन है महाराज विदुर कहते हैं-जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रु से बुद्धि पूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसंद नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है, वही धीर है।। 111।।  

विदुर कहते हैं, देवगण ऐसे व्यक्तियों के साथ होते हैं-जो दान, होम, देवपूजन, मांगलिक कार्य, प्रायश्चित तथा अनेक प्रकार के लौकिक आचार-इन कार्यो को नित्य करता है, देवगण उसके अभ्युदय की सिद्धि करते हैं।। 121।।

 
महाराज विदुर कहते हैं कि उस विद्धान की नीति श्रेष्ठ है-जो अपने बराबर वालों के साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बातचीत रखता है, हीन पुरूषों के साथ नहीं, और गुणों में बढे़ चढ़े पुरूषों को सदा आगे रखता है, उस विद्धान की नीति श्रेष्ठ है।। 122।। 

महाराज विदुर कहते हैं ऐसे पुरूषों को अनर्थ दूर से ही छोड़ देते हैं-जो अपने आश्रित जनों को बांटकर खाता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा मांगने पर जो मित्र नहीं है, उसे भी धन देता है, उस मनस्वी पुरूष के सारे अनर्थ दूर से ही छोड़ देते हैं। 123।।

बलवान के सम्मुख झुकने का परामर्श कितने सुन्दर उदाहरण से नीतिज्ञ विदुर देते हैं-जो धातु बिना गर्म किये मुड जाती है, उसे आग में नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे कोई झुकाने का प्रयत्न नहीं करता, अतः बुद्धिमान पुरुष को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिये, जो अधिक बलवान के सामने झुकता है, वह मानो इन्द्रदेवता को प्रणाम करता है।। 36-37/2।।  


किस वस्तु की किस प्रकार रक्षा करें, विदुर महाराज उदाहरणों द्वारा समझाते हैं-सत्य से धर्म की रक्षा होती है, योग से विद्या सुरक्षित होती है, सफाई से सुन्दर रूप की रक्षा होती है और सदाचार से कुल की रक्षा होेती है, तोलने से अनाज की रक्षा होती है, हाथ फेेरने से घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की तथा मैले वस्त्रों से स्त्रियों की रक्षा होती है।। 39-40/2।।

संकलन-संजय कुमार गर्ग 
(सभी चित्र गूगल-इमेज से साभार!)

उन्नति चाहने वाले छः दुर्गुणों का त्याग दें.. विदुर नीति

विदुर-नीति
विदुर-नीति
‘‘विदुर-नीति’’ महाभारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध और परम उपादेय प्रसंग है। महात्मा विदुर ने भी नीति संबंधी बहुत महत्वपूर्ण बातें राजा धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुये कहीं हैं, मैं उनमें से कुछ महत्वपूर्ण श्लोक आपके ज्ञानार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

महात्मा विदुर बताते हैं किसे जागने का रोग लग जाता है-’’जिसका बलवान के साथ विरोध हो गया हो, उस साधनहीन दुर्बल मनुष्य को जिसका सब कुछ हर लिया गया हो, कामी को, तथा चोर को रात में जागने का रोग लग जाता है।‘‘।। 13।।

विदुर कहते हैं, बुद्धिमान की बुद्धि का कोई विकल्प नहीं है-‘‘किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण सम्भव है एक को भी मारे या न मारे, मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती हैं।’’।। 48।।


महात्मा विदुर बताते हैं, किस को छोड़कर हम सुखी हो सकते हैं-‘‘एक (बुद्धि) से दो (कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य) का निश्चय करके चार (साम-दाम-भेद-दण्ड) से तीन (शत्रु, मित्र तथा उदासीन) को वश में कीजिये। पांच (इन्द्रियों) को जीतकर छः (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय रूप) गुणों को जानकर तथा सात (स्त्री, जूआ, मृगया, मद्य, कठोर वचन, दण्ड की कठोरता और अन्याय से धन का उपार्जन) को छोड़कर सुखी हो जाइये।’’।। 49।।

महामना विदुर कहते हैं, निम्न कार्य अकेले नहीं करने चाहिये-‘‘अकेले स्वादिष्ट भोजन न करें, अकेले किसी विषय का निश्चय न करें, अकेले रास्ता न चले और जहां बहुत से लोग सोये हों उनमें अकेला न जागते रहे।’’।। 51।।  

महामना विदुर कहते हैं-‘‘जो धनी होने पर भी दान न दे और दरिद्र होने पर भी कष्ट सहन न कर सके-इन दोनों प्रकार के मनुष्यों को गले में मजबूत पत्थर बांधकर पानी में डुबो देना चाहिये।’’।। 65।।

महाराज विदुर कहते हैं-‘‘वरदान पाना, राज्य की प्राप्ति और पुत्र का जन्म-ये तीन एक ओर और शत्रु के कष्ट से छूटना-यह एक तरफ, वे तीन और यह एक बराबर ही हैं।’’।। 72।।

ऐसे लोग को पहचान लेने की सलाह महामना विदुर देते हैं-‘‘थोड़ी बुद्धि वाले, दीर्घसूत्री, जल्दबाज और स्तुति करने वाले (चापलूस) लोगों के साथ गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये-ये चारों महाबली राजा के लिये त्यागने योग्य बताये गये हैं। विद्वान पुरूष ऐसे लोगों को पहचान लें।’’।। 74।।

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अपने घर में ऐसे लोगों को सदा रखने की सलाह महामना विदुर देते हैं-‘‘गृहस्थ में स्थित लक्ष्मीवान को अपने घर में इन चार प्रकार  के मनुष्यों को सदा रखना चाहिये-अपने कुटुम्ब का बूढ़ा, संकट में पड़ा हुआ उच्च कुल का मनुष्य, धनहीन मित्र और बिना संतान की बहन।’’।। 75।।

इन व्यक्तियों की मन से सेवा करने की सलाह महात्मा विदुर देते हैं-‘‘पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरू-मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिये।’’।। 79।।

निम्न की पूजा करने की सलाह महात्मा विदुर देते हैं-‘‘देवता, पितर, मनुष्य, संन्यासी और अतिथि-इन पांचों की पूजा करने वाला मनुष्य शुद्ध यश प्राप्त करता है।’’।। 80।।

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इन छः दुर्गुणों का त्याग करने की सलाह महामना विदुर देते हैं-‘‘ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरूषों को नींद, तन्द्रा (ऊंघना), डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसू़त्रता (जल्दी हो जाने वाले कार्य में अघिक देरी लगाने की आदत) इन छह दुर्गुणों का त्याग देना चाहिये।’’।। 83।।

निम्न का त्याग करने की सलाह विद्वान विदुर देते हैं-‘‘उपदेश न देने वाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करने वाला होता, रक्षा करने में असमर्थ राजा, कटु वचन बोलने वाली स्त्री, ग्राम में रहने की इच्छा वाले ग्वाले तथा वन में रहने की इच्छा करने वाले नाई-इन छः को उसी भांति छोड़ देना चाहिये, जैसे समुन्द्र की सैर करने वाला मनुष्य फटी हुई नाव का त्याग कर देता है।‘‘।। 84.85।।

महामना विदुर कहते हैं-‘‘निम्न छः प्रकार के मनुष्य छः प्रकार के लोगों से अपनी जीविका चलाते हैं, सातवें की उपलब्धि नहीं होती। चोर असावधान पुरूष से, वैद्य रोगी से, मतवाली स्त्रियां कामियों से, पुरोहित यजमानों से, राजा झगड़ा करने वालों से तथा विद्वान पुरूष मूर्खो से अपनी जीविका चलाते हैं।’’।। 89.90।।

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महात्मा विदुर कहते हैं-‘‘क्षण भर भी देखरेख न करने से गौ, सेवा, खेती, स्त्री, विद्या तथा शूद्रों(?) से मेल-ये छः चीजें नष्ट हो जाती हैं।’’।। 91।।

विद्वान विदुर कहते हैं, ये छः सदा अपने पूर्व उपकारी का अनादर करते हैं-‘‘शिक्षा समाप्त हो जाने पर शिष्य आचार्य का, विवाहित बेटे माता का, कामवासना की शान्ति हो जाने पर मनुष्य स्त्री का, कृतकार्य पुरूष सहायक का, नदी की दुर्गम धारा पार कर लेने वाले पुरूष नाव का तथा रोगी पुरूष रोग छूटने के बाद वैद्य का तिरस्कार कर देते हैं।’’।। 92-93।।