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जोश मलीहाबादी के कुछ प्रसिद्ध शेर!
बशीर बद्र की 5 दर्द भरी गजलें!
कहीं कारोबार सी दोपहर, कहीं बदमिजाज सी शाम है
कहां अब दुआओं की बरकतें, वो नसीहतें, वो हिदायतें
ये जरूरतों का खुलूस है, ये मतालबों का सलाम है
यूूं ही रोज मिलने की आरजू बड़ी रख रखाव की गुफ्तुगू
ये शराफतें नहीं बे गरज उसे आप से कोई काम है।
वो दिलों में आग लगायेगा मैं दिलों की आग बुझाउंगा
उसे अपने काम से काम है, मुझे अपने काम से काम है
न उदास हो, न मलाल कर, किसी बात का न ख्याल कर
कई साल बाद मिले हैं हम, तिरे नाम आज की शाम है
कोई नगमा धूप के गांव सा, कोई नगमा शाम की छांव सा
जरा इन परिन्दों से पूछना ये कलाम किस का कलाम है।
खुशबू की तरह आया वो तेज हवाओं में
मांगा था जिसे हमने दिन रात दुआओं में
तुम छत पे नहीं आए मैं घर से नहीं निकला
ये चांद बहुत भटका सावन की घटाओं में
इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है गजल जैसी
बिजली सी घटाओं में खुशबू सी हवाओं में
मौसम का इशारा है खुश रहने दो बच्चों को
मासूम मुहब्बत है फूलों की खताओं में
भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली
मजलूम परिन्दों की मासूम सभाओं में
दादा बड़े भोले थे सबसे यही कहते थे
कुछ जहर भी होता है अंग्रेजी दवाओं में।
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया
कागज में दब के मर गये कीड़े किताब के
दीवाना बे पढ़े लिखे मशहूर हो गया
महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये
लेकिन जमीं से चांद बहुत दूर हो गया
तनहाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना अहं
आईना बात करने पे मजबूर हो गया
सुब्हे विसाल पूछ रही है अजब सवाल
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया
कुछ फल जरूर आएंगे रोटी के पेड़ पर
जिस दिन मेरा मतालबा मंजूर हो गया। मांग

उसे याद करके न दिल दुखा जो गुजर गया सो गुजर गया
न गिला किया, न खफा हुए, यूं ही रास्ते में जुदा हुए
न तू बे वफा, न मैं बे वफा, जो गुजर गया सो गुजर गया
वो गजल की कोई किताब था, वो फूलों में एक गुलाब था
जरा देर का कोई ख्वाब था, जो गुजर गया सो गुजर गया
मुझे पतझड़ों की कहानियां न सुना सुना के उदास कर
तू खिजां का फूल है मुस्कुरा, जो गुजर गया सो गुजर गया
वो उदास धूप समेट कर कहीं वादियों में उतर चुका
उसे अब न दे मिरे दिल सदा, जो गुजर गया सो गुजर गया
ये सफर भी कितना तवील है, यहां वक्त कितना कलील है लंबा, छोटा
कहां लौट कर कोई आयेगा, जो गुजर गया सो गुजर गया।
(5)
वो प्यासे झोंके बहोत प्यासे लौट जाते हैं
जो दूर-दूर से बादल उड़ा के लाते हैं
कोई लिबास नहीं दिल की बे लिबासी का
सितारे खोए हुए बच्चे हैं जिन्हें अक्सर
वो साथ खेले हुए दोस्त याद आते हैं
कसीदा हुस्न का और हुस्न को सुनाओगे
बताओ फूल को खुशबू कहीं सुंघाते हैं
सितारा बन के भटकते हैं सारी सारी रात
जो वादा करके वफा करना भूल जाते हैं
गुलाब सा वो बदन क्या हवाए दर्द में तो
घने दरख्तों के जंगल भी सूख जाते हैं
हमारे शेर गुनाहे जमीं का वो नगमा हैं
जिसे फलक के फरिश्ते भी गुनगुनाते हैं।
गोपाल दास "नीरज" के सदाबहार मुक्तक!
ओमप्रकाश आदित्य के खट्टे-मीठे और तीखे मुक्तक!
क्यों करें सूर्य की वन्दना
सायरन से मिली है हमें
भोर होने की शुभ सूचना।
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कवि को रोटी न दो पेट भर
वर्ना खाकर वो सो जायेगा
पेट में दर्द पैदा करो
गीत का जन्म हो जाएगा।
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धन के संकेत हैं और हम
मस्ती क्या, मान क्या, मन है क्या
एक वेतन के दिन के सिवा
नौकरी में नयापन है क्या।
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सचाई पर सफेदी पुत रही है
सुहागा कोयलों पर चढ़ गया है
न तुम पीछे पड़ों इंसानियत के
जमाना बहुत आगे बढ़ गया है।
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दिन में पत्नी के ताने सुने
रात मच्छर के ताने सुनूं
एक ही कान से किस तरह
गालियां और गाने सुनूं।
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लिखा ‘टू लेट’ जिन्होने जिन्दगी भर
उन्हें गीता पढ़ाकर क्या करोगे
जिन्होंने बैंक में दिल रख दिये हैं
उन्हें कविता सुनाकर क्या करोगे।
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अगर मैं ‘शब्द’ के पीछे न पड़ता
तो बंगला आज आलीशान होता
किताबों से निकलता ‘अर्थ’ कोई
तो मैं सबसे बड़ा धनवान होता।
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हृदय का आईना किसको दिखाऊं
यहां सब शक्ल से पहचानते हैं
करूं निर्यात अपनी आत्मा का
विदेशी मोल इसका जानते हैं।
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सजावट को जरा-सी सादगी दो
कहीं दुकान मानव हो न जाये
न मन की खाट पर मखमल बिछाओ
कहीं इन्सान भीतर सो न जाये।
-ओमप्रकाश आदित्य
कुंअर बैचेन के सदाबहार मुक्तक
देह छूटते प्राण के प्रण हुए
फूल थे हम कभी, धुल का कण हुए
याद की एक श्रृंगार शाला में हम
खुद ही चेहरा हुए, खुद ही दर्पण हुए।
रूप की चांदनी में नहाता रहा
वो तिमिर में कहीं जगमगाता रहा
प्यार की उंगलियो से जरा छू लिया
देर तक आईना गुनगुनाता रहा।
याद फिर एक माला पिरोने लगी
सांस लेने लगी आखिरी हिचकियां
जिन्दगी आखिरी नींद सोने लगी।
जन्म से ही अमर प्यास है जिन्दगी
प्यास की आखिरी सांस है जिन्दगी
मौत ने ही जिसे बस निकाला यहां
उंगलियों में फंसी फांस है जिन्दगी।
आपने शीश पर हाथ जब धर दिया
यों लगा भूमि को एक अम्बर दिया
युग-युगों से यहां मैं बुझा दिया था
आपने फिर मुझे आरती कर दिया
सांस का हर सुमन है वतन के लिए
जिन्दगी ही हवन है वतन के लिए
कह गयी फांसियों में फंसी गर्दनें
यह हमारा नमन है वतन के लिए।
जब अंधेरे बढ़े रोशनी घट गयी
सामने से हमारे हंसी हट गयी
मौत से तो वो बचकर निकलती रही
जिन्दगी सांस की रेल से कट गयी।
बुलबुलों की तरह फूट जाते हैं हम
तीर की ही तरह छूट जाते हैं हम
पत्थरों को तो ठोकर लगाते रहे
फूल की ठेस से टूट जाते हैं हम।
प्यार की पांखुरी दर्द की बांसुरी
बीच से ही इसे आप मत तोड़िये
गीत है प्रीत की एक अंत्याक्षरी।
जब कि हम बीतते दिन भुलाने लगे
आप फिर से हमे याद आने लगे
जख्म भी फूल बनकर महकने लगे
उदय भानु हंस के बेहतरीन मुक्तक!
विष पीने के अभ्यास से मर जाओगे
औ बूंद को सागर से लड़ाने वालों
घुट-घुट के स्वयं प्यास से मर जाओगे।
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पंछी यह समझते हैं चमन बदला है
हॅंसते हैं सितारे कि गगन बदला है,
श्मशाम की खामोशी मगर कहती है
है लाश वही, सिर्फ कफन बदला है।
क्यों मिलन के अरमान सहन हो न सके,
ऐ दीप शिखा! क्यों तुझे अपने घर में
इक रात के मेहमान सहन हो न सके।
हंसता हुआ मधुमास भी तुम देखोगे
मरूस्थल की कभी प्यास भी तुम देखोगे,
सीता के स्वयंवर पै न झूमो इतना
कल राम का वनवास भी तुम देखोगे।
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मंझधार से बचने के सहारे नहीं होते
दुर्दिन में कभी चांद सितारे नहीं होते,
हम पार भी जाये तो भला जायें किधर से
इस प्रेम की सरिता के किनारे नहीं होते।
गालिब की गजल पत्थरों ने गाई है,
या चाॅंद की अलबेली दुल्हन चुपके से
यमुना में नहाने को चली आयी है।
प्यार दशरथ है सहज विश्वासी
जबकि दुनिया है मंथरा दासी,
किन्तु ऐश्वर्य की अयोध्या में
मेरा मन है भरत-सा संन्यासी।
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हर बोझ उठा लेता हूं कंगन की तरह
यह प्यार की मदिरा का नशा है, जिसमें
कांटा भी लगे फूल के चुम्बन की तरह।