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'डर' से डरना क्या.....? (विचारोत्तेजक लेख)

'डर' से डरना क्या.....? (विचारोत्तेजक लेख)

मेरे पड़ोस में रहने वाले भईयां को रास्ते में मैंने स्कूटी पर बैठा लिया, क्योंकि मैं भी घर जा रहा था, वो स्कूटी पर बैठ तो गये, उन्होंने स्कूटी को दोनों साइड से कस कर पकड़ लिया, कदाचित् स्कूटी पर उन्हें डर लग रहा था, जबकि मैं सामान्य स्पीड से स्कूटी चला रहा था, बराबर में यदि कोई वाहन आ जाता तो उस वाहन से बचने के लिए वो फोरन अपना वजन दूसरी साइड में डाल देते, मेरी स्कूटी एकदम से डिसबैंलेस होने लगती, या तो उन्हें स्कूटी पर बैठने में डर लगता था या फिर उन्हें  ट्रैफिक से डर लगता था, कदाचित् उन्हे "टैकोफोबिया" था। टैकोफोबिया में सड़क पर चलने वाले वाहनों या तेज गति से चलने वाले वाहनों में बैठने से डर लगता है। यह एक फोबिया है जिसके पीछे कभी दुर्घटना या फिर आनुवंशिक कारण हो सकते हैं। हम में अनेकों को टैकोफोबिया होता है।

इसी प्रकार से एक दिन रोहित रात्रि में अपने पुत्र से बोला, दूसरे कमरे में मेरा लैपटाॅप रखा है जरा उठा लायो? 10 वर्षीय बेटा रात्रि में अपने ही घर में दूसरे कमरे में जाने से डर रहा था, जब रोहित ने उससे दूसरे कमरे में ना जाने का कारण पूछा तो बोला, पापा! वहां भूत हो सकता है, क्योंकि भूत रात में ही आते हैं? इसलिए मुझे वहां जाने से डर लग रहा है, रोहित फिर अपने बेटे को साथ लेकर उस कमरे में गया, ताकि उसका भय दूर कर सके, बेटा डरते-डरते उसके साथ गया, तब रोहित ने उस कमरे से अपना लैपटाॅप उठाया। विशेष रूप से भारतीय बच्चों में भूत-प्रेत का डर आम समस्या है, क्योंकि बचपन से ही हमने उन्हें भूत प्रेतों से डरा-डरा कर बड़ा किया है। दूध पी लो नहीं तो भूत आ जायेगा, सो जाओं नहीं तो भूत आ जायेगा, खाना खा लो नहीं तो भूत बाबा आ जायेगा आदि आदि। बड़े होने तक यहां तक कि जवान होने तक भी उनमें ये मानसिक समस्या बनी रहती है। हम अपने जरा से आराम के लिए अपने बच्चों को एक मानसिक समस्या अनायास ही दे देते हैं?

'डर' से डरना क्या.....? (विचारोत्तेजक लेख)

एक दिन मैं चौराहे पर खड़ा था, मेरी साइड का ट्रैफिक रूका हुआ था, दूसरी साइड का  ट्रैफिक चल रहा था, तभी 12-13 साल के दो बच्चे जो शायद किसी मदरसे के तालिब (विद्यार्थी) थे, साईकिल पर सवार हो के आये और बन्द साइड से रोड पार करने का प्रयास करने लगे, पुलिस वाले ने उन्हें जोर से कहा, वहीं रूकों!! पुलिस वाले की आवाज सुनकर वो इतनी जोर से डरे कि वे अपनी बड़ी सी साईकिल से गिरते-गिरते बचे। जैसे-तैसे करके उन्होंने साईकिल संभाली, और साईकिल को वापस मोड़ कर पुलिस वाले के चेहरे को उल्टे मुड़कर डरावने भाव से देखने लगे, शायद उन्होंने वहीं रूकों!!?? का गलत अर्थ निकाल लिया था, उनको बहुत ज्यादा डरता हुआ देख,  पुलिस वाला भी मजाकिया मूड में आ गया, उसने फिर कहां-क्या हुआ? वहीं रूकों...? कहते हुए उनकी ओर एक कदम बढ़ा...। पुलिस वाले का एक कदम अपनी तरफ आते देख कर वो बच्चे इतना डर गये कि, बिना साईकिल पर बैठे ही पैदल साईकिल समेत बड़ी तेजी से वापस भागे, उनकी लगायी गयी टोपियां भी हवा में उड़ कर जमीन पर गिर गयी...। मेरी साइड की रूकी हुई भीड़ भी इस दृश्य को देख रही थी, उनके भी इस कुछ सैकेण्ड के दृश्य से हंसते-हंसते पेट दुखने लगे। ये सब क्या था? ये पुलिस नाम का फोबिया था, जो उन बच्चों में बचपन से ही बैठा हुआ था, केवल अपने मदरसे तक ही उनकी दुनिया सीमित थी, रोड पर चलने के नियम, सामाजिक नियमों से पूरी तरह अनभिज्ञ थे?

इसी प्रकार बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को कड़े अनुशासन में रखते हैं, उनकी नियमित कड़ी दिनचर्या बनायी जाती है, उस पर चलना उनके  लिए अनिवार्य होता है, यदि उस में थोड़ी सी भी लापरवाही की तो फिर उन पर अच्छी मार पड़ती है। साइकालोजिस्ट के अनुसार ऐसे कड़े अनुशासन व दिनचर्या से पलने वाले बच्चे, अच्छे पुत्र तो बन सकते हैं? परन्तु समाज में उनकी स्थिति सरकस में करतब दिखाने वाले शेर-हाथियों जैसी हो जाती है, जो अत्यधिक अनुशासन और डर के कारण अपनी ताकत अपने अस्तित्व को ही भूल जाते हैं और डरपोक व दब्बू बन जाते हैं, यदि वे नौकरी करते हैं तो बाॅस या अपने साथियों से भय खाते हैं, शादी होने के बाद पत्नि से भय खाते हैं, वे किसी से भी बात करते हुए डरते हैं क्योंकि उन्हें मार खाने व डांट खाने का भय उनके मानसिक क्षेत्र में घर कर गया होता है? बचपन से मिली मार-डांट उन्हें समाज में डर कर रहने को मजबूर कर देती है।
 
साइकाॅलोजिस्ट कहते हैं कि अपने बच्चों को अत्यधिक अनुशासन में न रखें, उनको बात-बात पर न डाटें, उनकी बातों को भी सुने, केवल उनके साथी-संगियों का ध्यान रखें कि कहीं वे उसे गलत रास्ते पर तो नहीं ले जा रहे हैं? अतः अपने बच्चों को भय के फोबिया से बाहर लाये, कहीं उनका पूरा भविष्य, भय के अंधकार में ना चला जाये?

कोरोना ने लाखों घरों को बर्बाद कर दिया, लाखों लोगों की जान ले ली। लोग सालों तक घरों में कैद रहने को मजबूर हो गये, नौकरी करने वाले काफी लोगों ने सालों तक घर से ही आफिस किया था। कोरोना काल के बाद लोगों की हेल्थ, शरीर, इम्यूनिटी को लेकर काफी चर्चे हुये और लोग जागरूक भी हुये, परन्तु इस काल में मिली एक बिमारी की कभी चर्चा नहीं हुई, वो है एक मानसिक समस्या ‘‘होम सिकनेस’’। सालों तक घर में कैद रहने के कारण लोगों में होम सिकनेस की बीमारी घर कर गयी, उन्हें काफी समय तक बाहर जाने से डर लगता रहा, मेरे बाद घर पर पत्नि-बच्चे कैसे रहेंगे, घर में कोई आया तो उसे कैसे बात करेंगे, घर का दरवाजा ठीक से बन्द किया भी होगा या नहीं आदि आदि, ऐसी अनेक बातें जिन्हें वह कोरोना काल में वह खुद ही करते थे? उसे यह चिन्ता रहती थी कि वे सब काम अब मेरी पत्नि-बच्चे कैसे करेंगे?

जब जाॅब पर जाना मजबूरी बन गया तो काफी समय बाद यह डर लोगों के जहन से दूर हुआ, अब भी काफी लोग इस डर के कारण घर से ही आफिस कर रहे हैं? 

प्रिय प्रबुद्ध पाठकों! ऊपर मैंने डर के कई उदाहरण दिये, ये अनेक प्रकार के हो सकते हैं, जैसे पानी से डर, आग से डर, ऊंचाई से डर, जंगली जानवरों से डर आदि आदि। ध्यान से देखा जाये तो अधिकतर के ये डर हमारी मन द्वारा उत्पन्न किये हुए होते हैं, उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता।

एस्ट्रोलाॅजर होने के कारण मैं डर का ज्योतिषीय कारण भी अवश्य दूंगा, साथियों! ज्योतिष में राहु-केतु नाम के दो ग्रह होते हैं, जिन्हें छाया ग्रह कहा जाता है, ये सूर्य और चन्द्रमा की छाया से उत्पन्न होते हैं, कुण्डली में यदि इनकी स्थिति अच्छी नहीं हैं तो ये जातक को उपरोक्त प्रकार के मानसिक रोग, फोबिया देते हैं। ऐसे चीजों का भय दिखाते हैं जिनका अस्तित्व ही नहीं है, और इंसान रस्सी को सांप समझकर डरने लगता है।

इसी प्रकार साइक्लोजिस्ट का भी कहना है कि हमारे मन के 90 प्रतिशत डर छदम या वहम होते हैं वास्तव में उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। हम अपनी पूरी जिन्दगी एक अनाम-आशंका के खौफ में बिता देते हैं। 

यदि हम इन समस्याओं के बारे में किसी साइकेट्रिस्ट से मिलते हैं तो वह सम्मोहन की अवस्था में गहरी नींद में ले जाकर, केवल मानसिक सजेशन या सुझाव द्वारा ही इनका ट्रिटमेंट करते हैं, ज्यादा गंभीर स्थिति में नींद की गोलियां दी जाती हैं। 

अच्छा तो यह है कि यदि हमें स्कुटी, गाड़ी, पानी, ऊंचाई, भूत-प्रेत आदि से डर लगता है तो इसे हम अपने आप को मानसिक सुझाव देकर भी, इस फोबिया का स्वयं ट्रीटमेंट कर सकते हैं, स्वयं को मानसिक सुझाव या सजेशन देने का सबसे अच्छा समय है, जब आप अपनी पूजा, या मैडिटेशन कर चुके होते हैं, यदि पूजा मैडिटेशन के बाद अपने आप को मानसिक सुझाव दिये जायें तो वो बहुत जल्दी कारगर सिद्ध होते हैं, और वे सम्मोहन वाले सजेशन के समान ही लाभ देते हैं। क्या व किस प्रकार सुझाव दें इस बारे में आप चाहे तो मुझसे व्हाट्सएप पर संपर्क कर सकते हैं या फिर किसी साइकेट्रिस्ट से मिल सकते हैं। 

छोटे बच्चों में यदि इस प्रकार के फोबिया है तो उनको हम समझा-बुझा कर दूर कर सकते हैं, यदि बच्चा पुलिस से डरता है तो बच्चे की पुलिस मैन से मुलाकात करायी जा सकती है। बच्चा रात में घर में भी इधर-उधर जाने से डरता है तो उसका हौंसला बढ़ाकर उसे प्रोत्साहित करें, और उसे अपने साथ दूसरे कमरों में लेकर जायें, इससे उसकी डरने की प्रवृति दूर होगी। यदि नदी आदि में नहाने से डरता है तो उसे अपने साथ सुरक्षित रूप से स्वीमिंग पुल में नहलाने ले जाये, उससे उसका पानी से भय दूर हो जायेगा। साथ ही पैरेन्टस बच्चों को बहुत ज्यादा कड़े अनुशासन में न रखें, उनकी प्रतिभा को भी पनपने व निखरने का अवसर दें।
ताकि हमारे साथ वे भी कह सके कि डर से डर क्या!!!

‘शहरयार’ के एक शेर से अपनी बात समाप्त करता हूं-
बे-नाम  से  इक  खौफ  से  दिल  क्यूं है परेशां
जब तय है, कि कुछ वक्त से पहले नहीं होगा।

आलेख पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा में आपका अनुज-
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर 8791820546 Whats-app
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम से उपयोग करना गैर कानूनी है ।)
 
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धीरे-धीरे रे मना.....!! (विचारोत्तेजक लेख)

धीरे-धीरे रे मना.....!! (विचारोत्तेजक लेख)

रामकिशन ने एक नयी दुकान खोली थी, अच्छी साज-सज्जा, काफी सामान रखने के बाद उसने दुकान का भव्य उद्घाटन किया, आसपास के दुकानदारों को भी बुलाया चाय-नाश्ता कराया। चूंकि नयी दुकान थी ग्राहक एकदम तो आते नहीं हैं, आते आते ही आते हैं, दो महीने में ही उसकी हिम्मत जवाब देने लगी, वह कम बदलने व स्थान बदलने की सोचने लगा, अनुभवी व्यक्तियों ने उसे अभी और इंतजार करने की सलाह दी। परन्तु रामकिशन धैर्य न रख सका और कुछ महीने के बाद ही उसने लाखों रूपये घटाने के बाद वह दुकान बन्द कर दी। और अब वह एक नये स्थान व नये काम की तलाश कर रहा है..., वह सही समय का इंतजार धैर्य रखकर नहीं कर पाया, समय से पहले किसी को मिलता कहां हैं भाई??

इसी प्रकार रोहित ने बड़े जोश के साथ जिम ज्वाइन किया, कि मैं अपनी अच्छी पर्सनल्टी बनाउंगा, सभी लोगों मेरी बाॅडी की प्रशंसा करेंगे। परन्तु एक महीने में ही उसका जोश ठंडा पड़ गया, उसका धैर्य जवाब दे गया। जबकि वह चाहता था कि उसकी बाॅडी एक बाॅडीबिल्डर की तरह दिखे। जब मैंने उससे जिम छोड़ने का कारण पूछा तो उसका उत्तर था-भाईया एक महीने में बाॅडी कुछ भी नहीं बनीं...? मेहनत बहुत ज्यादा है...? मैं तो थक जाता हूं..?? आदि आदि उसके अनेकों एक्सक्यूज??? क्या एक महीने में, एक-दो घंटे एक्सरसाइज करके उसका शरीर किसी पहलवान की तरह बन सकता था? हां!! बन भी सकता था जब कि वह नियमित पांच-छह महीने एक्सरसाइज करता, परन्तु धैर्य कहां हैं आजकल हममें???

एक दूसरा उदाहरण देखिए, मोहित प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था, बड़े जोश और संकल्प के साथ उसने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी प्रारम्भ की। वह अपने आप को एक बैंक अधिकारी देखना चाहता था, पहली बार उसने परीक्षा बड़े जोश के साथ दी, उसमें असफल हो गया, दूसरी बार में भी असफल हो गया, अब उसका धैर्य जवाब दे गया, उसने परीक्षा की तैयारी छोड़ दी और अब वह बीएड या एलएलबी करने का विचार कर रहा है। हम चाहते हैं कि हमें पहले प्रयास में ही सफलता मिल जाये.....यदि नहीं मिलती तो निराश और हताश हो जाते हैं?? अरे भाई! "शिशु का पहला रोना सुन कर तो मां भी दूध नहीं पिलाती...वो भी प्रतिक्षा करती है, क्या इसे वास्तव में भूख लग रही है, या वैसे ही रो रहा है?? बिल्कुल ऐसे ही हमारी 'जगतजननी प्रकृति माता' भी हमारी टोह लेती है कि इसे वास्तव में इस चीज की भूख है भी, या नहीं?? और हम एक बार ही रो कर ही चुप हो जाते हैं, क्योंकि वास्तव में हम भूखे होते ही नहीं?? यदि हम वास्तव में भूखे होते तो फिर रोते..... और फिर रोते? यानि फिर प्रयास करते और फिर प्रयास करते...एक के बाद एक..., देखते तो सही, कैसे 'जगतजननी प्रकृति माता' हमारे सारे काम सिद्ध करने के लिए दौड़ी चली आ रही है.....!"

इसी प्रकार हमारे पड़ोस में रहने वाले किशन अंकल जी अपने डाक्टर से भिड़ गये, मेरा बुखार ठीक क्यों नहीं हो रहा है, ये बार-बार क्यों चढ़ जाता है, तुम ठीक से दवाईयां क्यों नहीं दे रहे हों आदि आदि। डाक्टर ने अपने गुस्से पर नियंत्रण रखते हुए कहा, अंकल! एकदम से तुम्हारा बुखार ठीक नहीं होगा, इसे ठीक होने में कम से कम 10 दिन तो लगेंगे ही, आप धैर्य रखिए और साथ ही बीपी की दवाईयां और खाइये, इस उम्र में आपके लिए ज्यादा गुस्सा करना हानिकारक हो सकता है??

प्रिय पाठकों! ऐसे अनेक उदाहरण हमें अपने दैनिक जीवन में देखने को मिलते हैं, हम अपनी जरा सी मेहनत का तुरन्त बड़ा परिणाम चाहते हैं? हम चाहते हैं कि आज बीज बोये और कल से ही फल मिलने प्रारम्भ हो जायें, भला ऐसा होता है क्या??

प्रिय प्रबुद्ध पाठकों! हम सभी जानते हैं आइंसटीन ने बल्ब का अविष्कार किया था, परन्तु उसे अपने इस प्रयोग में दर्जनों बार असफलता मिली थी..परन्तु उसने धैर्य नहीं छोड़ा, और अंत में उसने दुनिया में उजाला लाने वाले बल्ब का अविष्कार किया। इसलिए आइंस्टीन कहा करते थे ‘‘आप कभी फेल नहीं होते, जब तक आप प्रयास करना नहीं छोड़ देते।’’

रामकिशन ने उस क्षेत्र में कोई अच्छी चलती दुकान देख कर वहां पर दुकान खोलने का निर्णय तो ले लिया, क्या उसने पता किया कि वह दुकानदार वहां पर पिछले दस सालों से दुकान कर रहा है.....प्रारम्भ में तो उस दुकानदार ने भी ऐसी ही समस्या फेस की थी जो कि आज रामकिशन ने की थी, परन्तु अंतर केवल इतना है उसने धैर्य नहीं छोड़ा और वह डटा रहा, और अंत में सफल हो गया। आज उसकी दुकान उस एरिया की अच्छी दुकानों में गिनी जाती है। 

इसी प्रकार रोहित जैसे लड़के बाॅडी बिल्डर तो बनना चाहते हैं, परन्तु उन्होंने क्या कभी किसी फेमस बाॅडी बिल्डर की दिनचर्या का अध्ययन किया है, कि वो किस प्रकार, कितनी देर, एक्सरसाइज करते हैं और क्या खाते हैं? प्रिय पाठकों!! बाॅडीबिल्डर पूरे दिन में घंटों एक्सरसाइज करते हैं, कोई भी दिन छोड़े बिना, और अपने एक सही डाइट प्लान पर चलते हैं। साथ ही आप को मैं एक बात और बताना चाहता हूं, आपने बाॅडी बिल्डर का शरीर देखा है कभी उसकी हथेली देखना, वो इतनी ज्यादा एक्सरसाइज करते हैं, कि उनकी हथेली की रेखाएं तक वजन उठाते-उठाते मिट जाती हैं, तब जाकर वो अपना एक सुन्दर दर्शनीय शरीर बना पाते हैं।

इसी प्रकार मोहित जैसे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले बच्चों से मैं कहना चाहूंगा कि एक प्रतियोगी परीक्षा में हजारों-लाखों विद्यार्थी बैठते हैं, सफल केवल सैंकड़ों या हजारों में ही होते हैं, वहीं सफल होते हैं जो सही दिशा में, पूरी मेहनत, लगन और धैर्य के साथ, तैयारी करते हैं, इनमें से अनेकों, अनेकों बार असफल भी हुये होते हैं परन्तु जो अपना धैर्य नहीं छोड़ते, और मेहनत, लगन से लगे रहते हैं, अन्त में विजयीश्री उनका ही वरण करती है। इसलिए जयशंकर प्रसाद ने लिखा है-

धैर्य  न टूटे  चाहे चोट पड़े सौ घन की
यही दशा होनी चाहिए, निज मन की।


प्रिय पाठकों! किसी भी कार्य में सफल होने के लिए आवश्यक है कि सबसे पहले आत्मविश्लेषण करें कि क्या हम इस कार्य को करने लायक हैं, इस काम को करने की क्षमताएं व गुण हममें हैं भी या नहीं? यदि आप सोचते हैं कि हां! हम इस कार्य को करने लायक हैं और हमारे अंदर इस काम को करने की क्षमता और गुण हैं! तो फिर उस क्षेत्र के सफल व्यक्तियों के बारे में अध्ययन करें कि वे किस प्रकार सफल हुए हैं? और कितने समय में सफल हुए हैं? क्या उतना समय और धैर्य हमारे अंदर है? यदि आपमें हैं तो तभी उस कार्य में हाथ डाले। अन्यथा उस कार्य से दूर ही रहें! 

साथ ही यदि आज बीज बोये, कल फल की कल्पना न करें, धैर्य से उसके पेड़ बनने का इंतजार करें, समय आपके या हमारे अनुसार नहीं चलेगा, इसीलिए कबीदास जी ने कहा है- 

धीरे-धीरे  रे  मना  धीरे  सब  कुछ  होय,
माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय।

धन्यवाद, जय हिन्द! आपके बहुमूल्य कमैंटस की प्रतीक्षा में!!!

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर 8791820546 Whats-app
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम से उपयोग करना गैर कानूनी है ।)
 
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भय बिन होय न प्रीत...?? (विचारोत्तेजक लेख)

भय बिन होय न प्रीत...?? (विचारोत्तेजक लेख)

हमारे पड़ोस में रहने वाले गुप्ता जी अपनी गाड़ी से कहीं जा रहे थे, फैमिली के साथ कहीं पिकनिक का कार्यक्रम था, वापस आये तो 2000 हजार का ऑनलाइन चालान आ गया। उसे देखकर गुप्ता जी बहुत बड़बड़ा रहे थे, ये क्या लूटमारी चल रही है? लोकल में भी सीट बैल्ट ना लगाने पर चालान काट दिया, ये तो अंधी कट रही है? आदि आदि बातें कहते हुए बड़बड़ा रहे थे। क्या उनका चालान गलत काटा गया? क्या यह चालान हमारे फायदे के लिए नहीं है?? 

इसी प्रकार की दूसरी घटना शर्मा जी के नाबालिग पुत्र के साथ घटी, अपने पिता की बुलैट लेकर स्कूल गया था, कि आज अपने साथियों पर टशन दिखायेगा, दिखाया भी था?... परन्तु स्कूल से वापस आते समय पता नहीं कहां से ट्रैफ़िक वालों ने उस बेचारे का फोटो खींच लिया, आ गया शर्मा जी के फोन पर 5000 हजार का इनाम...? साॅरी....चालान? शर्मा जी उछले-उछले बहुत देर तक पूरे मौहल्ले में घूमे...., जी भर का सरकार व पुलिस का कोसा.....। क्या ये गलत हुआ? कदाचित् ऐसा नहीं होना चाहिए था?? अरे भाई हम गलती करेंगे तो भुगतेंगे भी हम ही... पड़ोसी तो नहीं भुगतेंगे?

एक लड़का शराब पीता था, सिगरेट पिता था, उसके पिता को पता चला, पहले तो उसके पिता ने उसे बैठा कर अच्छी प्रकार समझाया, परन्तु वह नहीं माना, एक दिन पिता ने उसे पकड़कर अच्छी प्रकार से धो..? दिया। अब उस पुत्र के लिए उसके पिता गलत थे? जिन्होंने उसे नशे की रंगीन दुनिया में जाने से रोका??

सरकार या पिता ही नहीं, हमें तो गलतियां करने पर हमारा शरीर भी हमें बीमारी रूपी दण्ड देता है, बताइये.... क्या नहीं देता....?? ज्यादा खाने पर पेट खराब, मुंह में छाले, एसीडिटी, मोटापा आदि आदि न जाने क्या क्या हो जाता है। ज्यादा मीठा खायेंगे, परन्तु योगा-व्यायाम कुछ नहीं करेंगे तो शरीर भी हमें डायबिटीज रूपी दण्ड भी दे डालता है। इसी प्रकार हमारे गलत खान-पान से होने वाली अनेकों प्रकार की बीमारियां शरीर हमें दण्ड के रूप में ही तो देता है। इन बीमारियों के होने का कसूरवाद भी हम किसी और को ही ठहराने का प्रयास करते हैं?

हमने पृथ्वी का दोहन करके डाल दिया, पानी को बर्बाद करने लगे, पेड़ों को काट दिया, इन गलतियों के कारण तो प्रकृति भी हमें बाढ़, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी आदि न जाने किस-किस तरह से दंडित ही तो कर रही है। परन्तु हम इसमें भी अपनी गलती नहीं मानते, उल्टे प्रकृति को ही दोषी मानने लगते हैं। 

हम अब दूसरे पहलू की बात करते हैं, कि ना तो सरकार, ना ही पिता, ना शरीर और ना ही प्रकृति आपको दंडित करेगी तो फिर क्या होगा? कभी आपने विचार किया है?

गुप्ता जी आज तो लोकल में बिना सीट बैल्ट के ड्राइव कर रहे थे, यदि उनका चालान न काटा जाता तो वे कल लांग ड्राइव पर भी सीट बैल्ट लगाना भूल जाते और ईश्वर न करें कोई हादसा हो जाता तो फिर क्या होता?? हादसे-दुर्घटनायें बता कर नहीं आते, जरा सी गलती की सजा पूरे परिवार को भुगतनी पड़ती? परन्तु अब गुप्ता जी चालान के भय से, लांग ड्राइव की बात छोड़ो लोकल में भी बिना सीट बैल्ट के नहीं निकलेंगे।

शर्मा जी का एकलौता बेटा बिना हेल्मेट, बिना लाइसेन्स के बुलेट दौड़ा रहा था, यदि उसका चालान न किया जाता और उनका लड़का बिना डर भय के बुलैट दौड़ाता रहता और किसी दिन कोई हादसा हो जाता, तो शर्मा जी का एकमात्र सहारा भी छिन जाता, और उन्हें जिन्दगी भर का दर्द दे जाता? परन्तु अब दोबारा चालान कटने के भय से शर्मा जी उसे बालिग होने तक बुलैट को हाथ भी नहीं लगाने देंगे?

यदि वह शराब-सिगरेट पीने वाले लड़का पिता के दण्ड के भय से शराब पीना नहीं छोड़ता तो आज वह शराबी बनकर इधर-उधर गिरता फिरता, और एक दिन बड़ी बीमारी का शिकार भी बन सकता था? जैसा हम अक्सर अपने आसपास शराबियों का हाल देखते ही होंगे?

इसी प्रकार यदि हमें प्रकृति के दण्ड का भय नहीं होता तो हम सारे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर लेते और इसके बाद हमारे भूखे-प्यासे मरने की नौबत आ जाती।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमें अपनी जिन्दगी, अपने शरीर व प्रकृति की रक्षा के लिए अनुशासित होना अति आवश्यक है, अनुशासित दो प्रकार से हुआ जा सकता है पहला या तो हम स्वयं अनुशासित हों या फिर भय से अनुशासित हों। यदि हम स्वानुशासित होते तो सरकारी-सामाजिक-शारीरिक व प्राकृतिक नियमों को तोड़ते ही नहीं और हमें दण्ड ही नहीं मिलता? हम केवल दण्ड के भय से ही अनुशासित होना जानते हैं, और होते भी हैं। अब गुप्ता जी व शर्मा जी में सरकारी दण्ड का भय है अब वो गलती नहीं करते, लड़के में पिता का भय है अब वह शराब का सेवन नहीं करता, अब हम ज्यादा नहीं खाते, क्योंकि हमें बीमारी का भय है, अब हम वृक्षारोपण कर रहे हैं क्योंकि हमें प्रकृति के दण्ड का भय है और इसी प्रकार हठी समुद्र ने श्रीराम को समुद्र पार करके का रास्ता बताया क्योंकि उसे श्रीराम के क्रोध का भय था। 
अतः तुलसीदास जी ने उचित ही कहा है कि भय बिनु होय न प्रीत....!

बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति 
बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीत।

धन्यवाद, जय हिन्द! आपके बहुमूल्य कमैंटस की प्रतीक्षा में!!!

प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर 8791820546 Whats-app
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम से उपयोग करना गैर कानूनी है ।)
 
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जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि होती है!! (विचारोत्तेजक लेख)

जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि होती है!! (विचारोत्तेजक आलेख)
यूएसए में एक गौरी मेम ने एक काले बच्चे को जन्म दिया, बच्चे के रंग को देखकर सभी अचंभित थे, गौरी मेम के हसबैण्ड घर पर बहुत कम रहते थे, वो अपने बिजनेस के कारण टूर पर ज्यादा रहते थे। अब जब गौरे अंग्रेज के घर काले बच्चे का जन्म होता है तो वह अपनी पत्नि के चरित्र पर शक करता है, और कोर्ट में तलाक की अर्जी लगा देता है। उसकी पत्नि ने कोर्ट में तलाक देने से साफ इंकार कर दिया और यह शपथपत्र लगाया कि यह बच्चा उसका और उसके पति का ही है। न्यायाधीश ने यह केस एक साइक्लाॅजिस्ट व परामनोवैज्ञानिक को ट्रांसफर कर दिया। हमारे देश में जो लोग झाड़-फूंक करने वाले बाबा जी कहलाते हैं वहीं विदेशों में उनका नाम परामनोवैज्ञानिक होता है, हमारे बाबाजियों और वहां के परामनोवैज्ञानिकों में बस ये अन्तर होता है, वहां के ये व्यक्ति पढ़े-लिखे, डिग्रीधारी और अध्यात्मिक शक्तियों के जानकार होते हैं। अब साइक्लाॅजिस्ट व परामनोवैज्ञानिक द्वारा गौरी मेम के घर की निरीक्षण किया गया, तो उन्होंने पाया कि स्त्री अपनी प्रेगनेन्सी की अवस्था में जिस कमरे में अपना अधिकतर समय बिताती थी उसमें एक काले हब्शी बच्चे की तस्वीर लगी थी और उस काले बच्चे की शक्ल हुबहू उस बच्चे से मिलती थी जिस बच्चे को उस गौरी मेम ने जन्म दिया था। मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया कि क्योंकि प्रेगनेन्सी की अवस्था में अपना अधिकतर समय उस कमरे में बिताने के कारण उस मेम की दृष्टि बार-बार उस काले हब्शी बच्चे पर पड़ती थी, इसी कारण बार-बार पड़ने वाली दृष्टि ने अपने बच्चे के रंग-रूप की सृष्टि ही परिवर्तित कर दी और उसने एक काले बच्चे का जन्म दिया।
 
प्रबुद्ध पाठकों! ये होती है, दृष्टि की शक्ति, हमारे नजरें जैसी चीजों को देखकर जैसी भावना बना लेती हैं उसी के अनुरूप वे अपनी मानसिक व शारीरिक सृष्टि का निर्माण करने लगती हैं।
 
पूर्ण चन्द्रमा को देखकर अलग-अलग प्रकृति के व्यक्ति अपनी अलग-अलग सृष्टि का निर्माण करते हैं-एक कवि की दृष्टि पूर्ण चन्द्रमा पर पड़ती है तो वो ‘‘चारू चन्द्र की चंचल किरणें........’’ जैसी कालजयी रचना की सृष्टि करता है, वहीं एक प्रेमी शायर की दृष्टि पड़ती हैं तो वह "कल चौदहवीं की रात थीं शब भर चर्चा तेरा..." एक खूबसूरत गजल की सृष्टि कर डालता है, वहीं चन्द्रायण व्रत रखने वाले साधकों को शायद यह एक रोटी सी नजर आता है क्योंकि आज वे पूर्ण भोजन ग्रहण करेंगे, वहीं वैज्ञानिक की दृष्टि में ये स्थिति चन्द्रमा का सूर्य के बिल्कुल सामने आने का परिणाम मात्र है। तो हमारी मानसिक स्थिति की दृष्टि ही एक अलग सृष्टि का निर्माण करती है।
 
प्रिय पाठकों! कदाचित् आप जानते होंगे कि स्वाति नक्षत्र में सींप के मुंह में जो बारिश की बूंद गिरती है वहीं बूंद उसमें मोती का निर्माण करती है। उसी नक्षत्र की वहीं बूंद यदि सांप के मुंह में चली जाये तो वहीं बूंद सांप में जहर का निर्माण करेगी और यदि अन्न के दाने पर गिर जाये तो वहीं नक्षत्र वहीं बूंद अन्न का निर्माण करेगी, अर्थात हमारी जैसी मानसिक दृष्टि होती है उसी के अनुसार हम अपनी सृष्टि की रचना करने लगते हैं। यह दृष्टि न केवल हमारी मानसिक स्थिति का निर्माण करती है बल्कि हमारे शरीर के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक अन्य उदाहरण देकर मैं आपको अपनी बात समझाने का प्रयास करता हूं।
 
आपने जिम या व्यायामशालाओं में बहुत सारे दर्पण लगे हुए देखें होंगे, क्या आपने कभी सोचा है कि जिम में इतने सारे दर्पणों का क्या काम है?, क्या व्यायाम करने वाले इन्हें देखकर अपने बाल, कपड़ों को संभालते या ठीक करते रहते हैं?? नहीं!, नहीं! बिल्कुल नहीं। इन्हें लगाने का असली उद्देश्य है कि जिम में एक्सरसाइज करने वाले, एक्सरसाइज करते समय अपने शरीर पर दृष्टि जमाये रखे, और अपने आप को अपने सुन्दर व बलिष्ठ शरीर बनने का मानसिक सजेशन देते रहे, बार-बार ऐसा करने से, इसका प्रभाव उनके शरीर पर पड़ने लगता है, और इस दृष्टि का परिणाम ये होता है, कि वह अपने एक सुन्दर व बलिष्ठ शरीर की सृष्टि करने में सफल हो जाते हैं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि हमारी दृष्टि का पाॅजिटिव या नेगेटिव प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ सकता है। एक एस्ट्रोलाॅजर होने के कारण एक उदाहरण मैं ज्योतिष का भी जरूर दूंगा।
 
साथियों!! एक लग्न, एक समय में हजारों-लाखों बच्चों का जन्म होता है, परन्तु उनमें से कुछ सफल व्यवसायी, प्रोफेसर, लेखक या वक्ता आदि बनते हैं, वहीं कुछ गरीबी से लाचार होकर अपनी पूरी जिन्दगी रोते कल्पते बिता देते हैं, वहीं लग्न, वहीं समय, वहीं कुण्डली फिर ऐसा क्यों?? वजह फिर वहीं कि जैसे परिवार के, जैसे माहौल में, जैसी दृष्टि रखकर बच्चे का पालन-पोषण किया जाता है, वहीं दृष्टि बच्चे के अच्छे या बुरे भविष्य की सृष्टि करती है, वहीं दृष्टि बच्चे को राजा या फिर रंक बना देती है। एक ही राशि का होने के बाद जहां "राम" पुरूषोत्तम, पितृ भक्त बनकर भगवान की उपाधि से विभूषित किये गये वहीं परमज्ञानी, परम शिवभक्त होने के बाद भी रावण को "राक्षस" की उपाधि दी गयी।
 
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हमारी दृष्टि ही सृष्टि का निर्माण करती है, अच्छी दृष्टि से अच्छा और रचनात्मक निर्माण संभव है और वही बुरी दृष्टि से बुरा होना भी संभव है। छोटे बच्चों को माताएं काला टीका लगाती हैं जो उन्हें बुरी नजर या बुरी दृष्टि से बचाता है, वहीं आज भी बड़े-बड़े बिल्डर अपनी बहुमंजिला इमारतों में नजर ना लगने की हांडियां टांगते हैं, जो उनकी बहुमंजिला इमारतों को बुरी नजरों से बचाते हैं। तो इस प्रकार ये बात सिद्ध हो जाती है कि जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि होती है!! 
 
जलील मानिकपूरी के शेर के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं-
 
निगाह बर्क  नहीं  चेहरा  आफ्ताब  नहीं,     बिजली, चन्दा
वो  आदमी है मगर देखने की  ताब नहीं।     शक्ति-आग

धन्यवाद, जय हिन्द! आपके बहुमूल्य कमैंटस की प्रतीक्षा में!!!
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम पर उपयोग करना गैर कानूनी है ।)
 
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लोगों को कहने दो, मंजिल की ओर चलते चलो....

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सौरभ एक दिन अपने नाना जी के साथ अपने ननिहाल से शहर जा रहा था, उस समय साईकिल का काफी चलन था, उसके नाना जी ने उसे साइकिल पर बैठाया और शहर की ओर चल दिये, कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में कुछ महिलायें जा रही थी, उनमें से एक बोली देखों इस लड़के को बुड्डा साईकिल चला रहा है और ये आराम से बैठा है, इसे शरम नहीं आती, बुड्डे से साइकिल चलवाते हुए.....!! सौरभ को बहुत बुरा लगा वह अपने नाना जी से बोला नाना जी आप बैठिऐ, मैं साईकिल चलाता हूं, काफी मना करने के बाद उसके नाना जी साईकिल पर बैठ गये और सौरभ साईकिल चलाने लगा... कुछ दूर जाने के बाद रास्ते में कुछ आदमी मिले, उन्होंने सौरभ के नाना जी पर कमैंटस कसा कि आराम से बैठा है और लड़के से साईकिल चलवा रहा है....। अब नाना जी को बुरा लगा तो वे साईकिल से उतर गये, और उन्होंने सौरभ को पीछे बैठा लिया। ये एक सच्ची घटना है, ऐसी जैसी कि आपने एक कहानी में पढ़ी होगी जिसमें एक किसान, उसका लड़का गधे को लेकर जा रहे थे, इस कहानी में कभी किसान गधे पर बैठता तो कभी उसका लड़का, और कभी दोनों गधे पर बैठ जाते, यहां तक कि उन्होंने गधे को ही सिर पर उठा लिया। परन्तु उनकी हर स्थिति में रास्ते भर उनकी आलोचना होती रही। उन की हर स्थिति-परिस्थिती में उनको आलोचक मिलते रहे। साथियों!! ऐसी ही अनेक स्थितियां आपको भी अपने दैनिक जीवन में देखने को मिलती होगी।
 
ऐसी ही एक दूसरी सच्ची घटना आपसे शेयर करना चाहता हूं-एक मध्यमवर्गीय युवक ने सैकेंड हैंड गाड़ी खरीदी, और अच्छी प्रकार से उसे चलाने भी लगा, तब भी उसकी आलोचना हुई, या कहना चाहिए कानाफुसी हुई, ‘‘गाड़ी लाया है, औकात है इसकी गाड़ी की???’’ वह युवक अपनी बचत के पैसों से गाड़ी को सही तरीके से रखने लगा, दैवयोग से एक दिन गाड़ी से एक छोटी सी दुर्घटना हो गयी.. भई! जब गाड़ी सड़क पर चलेगी तो थोड़ा बहुत लग भी सकती है, उसकी भी कहीं लग गयी, अगले दिन उसकी गाड़ी पर निशान देखकर आलोचना/ कानाफूसी करने लगे देखों! ‘‘इसके बाप ने भी कभी गाड़ी चलाई है कि ये चला रहा था, ठोक दी?’’
 
इस प्रकार ये दुनिया हर स्थिति में आपकी आलोचना जरूर करेगी, चाहे आप कितना भी अच्छा क्यों न करके चलो!! कभी भी लोगों की आंखों को आईना मत बनाइये, केवल और केवल अपने दिल के आईने में झांक कर देखो कि क्या मैं सही हूं या नहीं??
 
एक व्यक्ति टीका लगा कर पहली बार अपने आफिस गलती से पहुंच गया, हालांकि वह प्रतिदिन मंदिर जाता था और वहां टीका लगवाता था, परन्तु इस भय से कि लोग क्या कहेंगे...? वह पौंछ देता था, उस दिन उसके पौंछना याद नहीं रहा, सभी ने उसे गौर से देखा और टीका लगाने पर उसका मजाक बनाने लगे, पंडित जी हो गये हों??, क्या बात है जी??? आदि आदि उसका मजाक सा उड़ाने लगे, मजाक उड़ाने वालों सारे ही हिन्दू थे, उसके मुस्लिम साथियों ने इस पर कोई कमैंटस नहीं किया, उस व्यक्ति ने तब से टीका लगाकर आफिस जाना छोड़ दिया। क्या टीका लगाना गुनाह है??  ये तो ऐसा ही हो गया जैसा इश्क में रोते हुए इन शाॅयर साहब के साथ हुआ था-
इश्क ने खायी है लोकलाज से क्या मात।
दो कहकहे  लगे  तो मेरे अश्क थम गये।।
 
प्रबुद्ध पाठकों! हम दूसरों की मामूली आलोचना से ही परेशान हो जाते हैं, और जो कुछ सही भी कर रहे होते हैं उसे भी करना छोड़ देते हैं, जबकि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ‘‘जिस प्रकार एक निराश चोर चोरों को पकड़वाने वाला बन जाता है, या कहिए जब एक अपराधी मुखबीर बन जाता है, उसी प्रकार निराश होकर एक व्यक्ति आलोचक बन जाता है।’’
 
हमारे किसी काम की हंसी उड़ने के बाद हमें अपने काम को देखना चाहिए कि क्या यह नैतिकता की दृष्टि से सही है? क्या यह सामाजिकता की दृष्टि से सही है?? क्या यह धार्मिकता की दृष्टि से सही है?? यदि तीनों दृष्टि से आपका उत्तर हां!! में आये तो आपको अपने काम  को बीच में नहीं रोकना चाहिए, और आगे बढ़ते ही रहना चाहिए। ‘‘जर्मन की लोकोक्ति है कि एक शेर को भी मक्खियों से रक्षा करनी पड़ती है।’’
 
साथियों!! हम जब भी कोई काम करना चाहते हैं या फिर नया काम करने का प्रयास करते हैं तो उसकी आलोचना जरूर होती है। पूज्य गुरूदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य ने कहा है कि ‘‘जब आप कोई नया काम करना प्रारम्भ करते हैं तो उसे तीन स्थितियों से गुजरना पडता है, पहली स्थिती में आपकी आलोचना होती है, यदि आप तब भी अपने काम को करना जारी रखते हैं तो दूसरी स्थिती में लोग आपका विरोध करने लगते हैं, यदि आप फिर भी अपना काम नहीं रोकते तो तीसरी स्थिती में लोग आपके काम का समर्थन करने लगते हैं।’’ इस प्रकार हर नये-पुराने कार्यों का इन्हीं स्थितियों से गुजरना पड़ता है, इसलिए हमें आलोचनाओं से नहीं घबराना चाहिए बल्कि देखना चाहिए कि हमारा कार्य कौन सी स्थिति से गुजर रहा है।
 
जब भी आप अपने काम की आलोचना से परेशान हो जाये और आप उसे छोड़ने का मन बना लें तो सबसे पहले तो ये देखें कि क्या हमारा कार्य नैतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से उचित है? यदि हां!! है तो उसे मत रोकिये क्योंकि "दूसरे तुम्हारे विषय में क्या सोचते हैं, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसकी अपेक्षा अपने विषय में तुम्हारे विचार क्या हैं यह अधिक महत्वपूर्ण हैं।" इसलिए उपनिषदों में कहा गया है "चरैवेति चरैवेति" अर्थात चलते रहो, चलने और आगे बढ़ने का नाम ही जीवन है। जीवन में कभी भी हताश या निराश होकर लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती, इसलिए लोगों का कहने दो और मंजिल को ओर चलते चलो.......
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
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"परिवर्तन की पीड़ा" सहकर ही मिलता है "सफलता का आनन्द"

https://jyotesh.blogspot.com/2024/12/parivartan-ke-peda-se-safalta-ke-or-chale.html
मैं स्कूल से अपने घर लौट रहा था। मैंने देखा मेरा एक मित्र स्कूटी मैकेनिक से लड़ रहा है, कि तूने मेरी स्कूटी का हैंडल टेढा कर दिया है, मैकेनिक बार-बार कह रहा था कि नहीं भैया! मैंने तुम्हारी स्कूटी के टेढ़े हैंडल का सीधा किया है आप चला कर तो देखो? मेरा मित्र कह रहा था मैंने चला कर देख लिया ये हैंडल पहले ठीक था अब ये टेढ़ा है, इसे पहले जैसा ही करो! मैं खड़़ा हुआ उनकी बात सुन रहा था, मैंने पहले जाकर उसकी स्कूटी का हैंडल चेक किया, जो कि एक दम सीधा था, मैंने अपने मित्र से कहा आओ! स्कूटी पर बैठों, और उसे बैठा कर मैं अपने घर ले आया और उससे बोला बैठों मैं तुम्हें समझाता हूं ये क्या मामला है, मेरा मित्र अब मुझसे नाराज था कि मैंने उसका हैंडल ठीक क्यों नहीं होने दिया। तब मैंने अपने मित्र का समझाते हुए बताया-

मैंने तेरी स्कूटी पहले चलायी है और उस समय उसका हैंडल वास्तव में टेढ़ा था, अब तेरी स्कूटी का हैंडल सीधा है। क्योंकि तूने काफी समय तक टेढ़े हैंडल की स्कूटी चलायी, इस लिए तुम्हे टेढ़े हैंडल की स्कूटी ही सही लगने लगी, और जब तुम्हारे स्कूटी का हैंडल सीधा हो गया तो वो तुम्हे टेढ़ा लग रहा है, जो कि वास्तव में नहीं है, कुछ देर बाद मित्र को मेरी बात समझ आ गयी, और वो कुछ देर मेरे पास बैठकर अपनी स्कूटी लेकर चला गया। 
पाठकजनों! आपको भी मेरी बात समझ आ गयी होगी, यही परिवर्तन है, चाहे वो अच्छे के लिए हो, चाहे बुरे के लिए वो हमेशा हमें मानसिक कष्ट देता है, क्योंकि हमारा मन जिस ढर्रे पर चलने का आदि हो जाये वो उसमें परिवर्तन नहीं चाहता चाहे वो अच्छे के लिए ही क्यों ना हो। दूसरा उदाहरण देखिए-

सरकार ने रेलवे लाइन व खेत आदि खुले स्थानों पर शौच जाने को प्रतिबंधित कर दिया है, रेलवे पुलिस ने कई बार रेलवे लाइन पर शौच करने वालों पर डंडे भी बजायें हैं, सरकार घर में शौचालय बनाने के लिए अनुदान भी दे रही है, परन्तु ये परिवर्तन भी लोगों को पीड़ा दे रहा है। एक गांव के कुछ व्यक्तियों से मैंने बात की तो उनकी बात सुनकर मेरे मुंह से हंसी का जोरदार ठहाका निकला, उन्होंने कहा ‘‘साहब जी मुंह में गुटका भर कर, या फिर बीड़ी का गहरा कस खींचते हुए, जो ट्....... फिरने में मजा आवे है, वो घरों नहीं आता, घरों ते घर वाली मारेगी, यां ये सा.... पुलिस वाले मारे हैं, सरकार ना या अच्छा नहीं कियो।’’ बताइये मित्रों! ये परिवर्तन भी पीड़ा दे रहा है। क्योंकि हमारा मन परिवर्तन का हमेशा नापसंद करता है।

बच्चे जब बाल्यवास्था से किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं तो लड़कों के चेहरे पर हल्के बाल आने लगते हैं, आवाज भारी होने लगती है, लड़कियों में भी शारीरिक परिवर्तन आने लगते हैं, चिड़ियाओं की तरह चहकने वाली बच्चियों पर तरह-तरह की हिदायतें व बन्दिशें माताओं द्वारा लगायी जाती हैं, समझदार माता-पिता लड़कों की निगरानी भी बड़ा देते हैं कहीं व गलत संगत में ना पड़ जाये, परन्तु बचपन से किशोरावस्था में प्रवेश करते इन बच्चों को ये सलाह-हिदायतें बहुत नागवार गुजरती हैं, वो इस परिवर्तन को बड़ी मुश्किल से स्वीकार करते हैं। जबकि माता-पिता की ये हिदायतें गलत नहीं होती उनके उम्र-अनुभव की ये सीख होती हैं।

सन्यासी स्तर के साधु भी एक स्थान पर टिक कर नहीं रहते, उनके गुरूओं द्वारा उन्हें एक स्थान ना रूकने व स्थान परिवर्तन करते रहने की हिदायतें दी जाती हैं ताकि उन्हें स्थान विशेष व वहां के व्यक्तियों से उनका लगाव ना हो पाये, जो कि आगे चलकर उनके सन्यास व मोक्ष के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
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मैं स्वयं एक एस्ट्रोलाॅजर-वास्तुविद् हूं अतः ज्योतिष का भी एक उदाहरण देने लोभसंवरण नहीं कर पा रहा हूं। प्रबुद्ध पाठकों!! ज्योतिष में एक योग होता है ‘ग्रह-राशि परिवर्तन योग’ इसमें एक-दो या ज्यादा ग्रह एक दूसरे की राशि या घर में बैठे हुये होते हैं, इसका परिणाम ये होता है कि जातक के जीवन में परिवर्तन बहुत ज्यादा होते रहते हैं, वह अपने काम-धंधे, रहने के स्थान आदि ना चाहकर भी बदलता रहता है, इसका परिणाम ये होता है कि उसे एक जगह से-एक काम से मोह नहीं रहता, और अंत में ये परिवर्तन ही उसे जीवन की मोह-माया से दूर ले जाते हैं।

इसी प्रकार  नदियों का जल हमेशा परिवर्तित होता रहता है क्योंकि हमेशा बहता-चलता रहता है, उसमें ताजगी व स्वच्छता बनी रहती है, और तालाब का पानी गंदला जाता है क्योंकि वो एक स्थान पर रूक जाता है, मौसम भी हर दिन एक सा नहीं रहता, वो भी बदलता रहता है, ऋतुऐं भी परिवर्तित होती रहती हैं। वो भी एक समय में बदल जाती हैं। ये परिवर्तन पेड़-पौधौं में भी दिखायी देता है।

हमारे शरीर में भी नित्य परिवर्तन होते रहते हैं, शरीर के अणुओं-परमाणुओं-कोशिकाओं का मरण व नयी कोशिकाओं का निर्माण सतत चलता रहता है, हम बचपन-किशोरवस्था-जवानी-बुढ़ापे से मरण की ओर हमेशा अग्रसर होते रहते हैं। वहीं नारी युवती से मां बनने का एक पीड़ादायी सफर-परिवर्तन बच्चे के जन्म के समय सहन करती है, तभी वह मां बनने व भावी संतति को जन्म देने वाली जननि बनने की महान पदवीं प्राप्त करती है। क्या वह इस मृत्युतुल्य पीड़ा को सहने से इंकार करती है? यदि नही तो फिर परिवर्तन से पीड़ा क्यों?

वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि निर्जीव चीजें पहाड़, मिट्टी आदि में भी लगातार परिवर्तन हो रहे हेैं । एवरेस्ट पर्वत भी अपने आकार में बढ़ रहा है, वो बात अलग है कि ये परिवर्तन काफी समय बाद दृष्टिगोचर होते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि परिवर्तन सजीव ही नहीं निर्जीव वस्तुओं में भी आते हैं। परिवर्तन भगवान महाकाल का एक आवश्यक नियम है। ऐसे ही नियम हमें अपने दैनिक जीवन में दृष्टिगोचर होते हैं, जैसे कभी हम स्वस्थ होते हैं कभी अस्वस्थ, कभी नौकरी में प्रमोशन पाते हेैं कभी हमारा डिमोशन भी हो जाता है, कभी हमारा काम-धंधा ऊंचाईयों को छू रहा होता है कभी हमारा काम-धंधा फेल हो जाता है, कभी राजा तो कभी रंक हो जाते हैं, कभी हमें असीम सुख की प्राप्ति होती है कभी दुःख भी मिलता है, कभी पत्नि-बच्चों से अच्छी बाॅडिंग हो जाती है कभी लड़ाई भी हो जाती है, ऐसे ही अनेक परिवर्तन हमें दैनिक जीवन में देखने को मिलते हैं परन्तु ये स्थायी नहीं होते, बल्कि अस्थायी होते हैं, जैसे अंधेरी और कष्टदायी रात के बाद दिन की आनन्ददायक किरणें निकलना भी अवश्यसंभावी है।  
 
पूज्य माताजी भगवती देवी का कथन है कि ‘‘हमेशा सकारात्मक परिस्थितियों की कल्पना मत करो, क्योंकि ये संसार केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बना है।’’ अतः परिवर्तन रूपी विपरीत परिस्थितियों के लिए भी तैयार रहना चाहिए। जिस प्रकार अच्छी आमदनी के समय, धन जोड़ कर बुरे समय के लिए रखा जाता है। उसी प्रकार अच्छे समय में भी बुरे समय या विपरीत परिस्थितियों के लिए भी अपने आप को मानसिक रूप से तैयार रखना चाहिए, ताकि ऐसी परिस्थितियों का सामना साहस के साथ किया जा सकें। साथ ही जीवन में परिवर्तन को पीड़ा दायक न समझ कर उसे जीवन का आवश्यक नियम व सफलता का राजमार्ग समझा जा सकें और उसका हम खुले दिल से स्वागत करें। इस प्रकार हम कह सकते हैं "परिवर्तन की पीड़ा" सहकर ही "सफलता का आनन्द" मिलता हैं! धन्यवाद।
आलेख पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा में..............! 
 
अंत में एक शेर के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ-
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा1चाहे,
कि दाना ख़ाक2 में मिल कर गुल-ओ-गुलज़ार3 होता है
।
१-ऊँचा पद २-मिट्टी ३-फूलों-फलों से
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर मो0 6396661036 / 8791820546 (Wh.) 
(लेख का सर्वाधिकार सुरक्षित है, लेखक की अनुमति के बिना आलेख को प्रकाशित या किसी अन्य चैनल के माध्यम पर उपयोग करना गैर कानूनी है ।)
 
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