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मौत से मुलाकात !! (रोमांच-कथा)


https://jyotesh.blogspot.com/2021/03/maut-se-mulakat-true-story.html
सौरभ भारतीय विद्या भवन नई दिल्ली से ‘‘ज्योतिष अलंकार‘‘ कर रहा था। उसकी कक्षाऐं सप्ताह में शनिवार व रविवार को ही लगती थी। वो अपने शहर से ट्रेन से आता था व सदर बाजार स्टेशन, नई दिल्ली से ही वापसी की ट्रेन पकड़ता था। सौरभ अपनी कक्षा अटेंड करके सायं 6 बजे के आसपास वापस आने के लिए अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी दो आदमी उसके पास
 आये और उसकी ही बेंच पर बैठ गये। बातचीत प्रारम्भ हुई, पता चला इन्हें भी उसी ट्रेन से गाजियाबाद जाना है, जिससे सौरभ को अपने शहर जाना था। 
    सदर बाजार स्टेशन से यात्रा करनेे वाले पाठकबन्धु परिचित होंगे, कि प्लेटफार्म नं0 2 पर गाजियाबाद की तरफ से आने वाली लाइन पर खतरनाक मोड है, वहां उस तरफ से आती ट्रेन तब स्टेशन से नजर आती है, जब वह मात्र स्टेशन से 50 मी0 की दूरी पर रह जाती है।
      तभी उनमें से एक बोला- ‘‘वह ट्रेन तो सामने वाले प्लेटफार्म पर आ रही है।" यह कहकर उसने सौरभ का हाथ पकड़ लिया, चलो! लाइनपार करके उस स्टेशन पर चलते हैं?
      सौरभ बोला-‘‘मैं कभी स्टेशनों पर लाइनपार नहीं करता, यदि ट्रेन आयेगी भी, तो भी मैं पुल से ही जाऊंगा, भले ही ट्रेन निकल जाये!"
      उस व्यक्ति ने सौरभ का हाथ पकड़े रखा, और बोला- तुम ‘‘सिवेलियन" के साथ ये ही दिक्कत है, कि तुम डरते बहुत हो!
       उसका दूसरा साथी फोन पर बात करने में मग्न था और पीछे ही खड़ा था।
     भाई! मैं तो सामने वाले प्लेटफार्म पर जा रहा हूं, उसने सौरभ के पकड़े हुए हाथ को "मज़बूरी" में छोड़ते हुए कहा, और वह बिना दाएं-बाएं देखे पटरियों पर कूद गया। उसका दूसरा साथी अब भी फोन पर बात करने में व्यस्त था।
      उसके पटरी पर कूदते ही, उसी लाइन पर सौरभ को ट्रेन आती दिखी, वो तो लाइन पार कर ही रहा था, परन्तु सौरभ भी स्टेशन पर होकर भी रेलवे लाइन के इतना नजदीक था, यदि वह वही खड़ा रहता तो ट्रेन की पूरी तरह जद में था, क्योंकि तीव्र गति से आती ट्रेन से उत्पन्न वायुवेग से उसके भी हवा में लहराकर, ट्रेन से टकराने की शत-प्रतिशत संभावना थी, सौरभ तुरन्त पीछे हटा और जमीन पर तेजी से गिरते हुए (क्योंकि जमीन पर लेटने से उसके हवा में उड़ने की सम्भावना बहुत कम थी) पटरी पार कर रहे, व्यक्ति की ओर चीखा-भाई ट्रेऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽन----।
      सौरभ की बात पूरी भी न हो पायी थी कि नाॅन स्टाॅप राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म से गुजर रही थी, सौरभ ने भय से अपनी आंखे बन्द कर ली, कदाचित इतनी दर्दनाक मौत वो नहीं देख पाता।
      तभी ट्रेन के इमरजेन्सी ब्रेक लगने की आवाज आयी, सौरभ ने धीरे से आंखे खोलकर देखा कि ट्रेन के पहिये चिंगारी उगल रहे हैं, इसका मतलब था ट्रेन के इमरजेन्सी ब्रेक लग रहे हैं। ट्रेन स्टेशन से दूर जाकर रूक गई। लगता था, ड्राइवर को आभास हो गया था कि कोई ट्रेन के आगे कूदा है।
      उसका साथी भी फोन हाथ में लिए सौरभ के पास भाग कर आ गया और पटरियों की तरफ झांकते हुये बोला-‘‘खुद तो मरा, तुम्हें भी ले मरता, परन्तु मुझे तो जीते-जी ले मरा!!’’
     भाई!!! तुम्हे क्यों ले मरा?? तुम तो ठीक ठाक खड़े हो? सौरभ ने आहिस्ता से जमीन पर बैठते हुए, अपने कपड़ों की धूल झाड़ते हुए पूछा??
      अरे यार! हम दोनों पुलिस में हैं, और ‘‘ऑन डयूटी" हैं, गाजियाबाद अपने पर्सनल काम से जा रहे थे!" इस युवक के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं।
     इतने में रेलवे पुलिस के 4-5 सिपाही भागे हुए प्लेटफार्म पर आ गये, हमसे बोले ट्रेन के आगे कौन कूदा है??? वो कहां हैं??? 
     सौरभ जमीन पर ही बैठा रहा और उसने कोई जवाब नहीं दिया!
    आगे कूदने वाले सिपाही का साथी दूर जाकर फोन मिलाने लगा, उसके चेहरे की चिंता और भावों को देखकर साफ लगता था, कि वह उसे ही फोन मिला रहा है जो अभी ट्रेन के आगे कूदा है। अचानक उसका चेहरा खिल उठा, सौरभ तुरंत उठकर उसके पास पहुंचा-पूछा! क्या वो "सेफ" है?
    वो बोला! थैक्स गाॅड! वो ठीक है! ट्रेन उसे छूकर निकली थी, परन्तु वो चपेट में आने से बच गया है, सामने वाले प्लेटफार्म पर पैसेंजर्स की भीड़ में दुबक गया है, कही पुलिस उसे आत्महत्या के प्रयास के जूर्म में गिरफ्तार न कर ले। इतना कहते ही उसने जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगायी और उस स्टेशन पर जाने के लिए पुल की तरफ तेजी से बढ़ गया।
    सौरभ की ट्रेन उसी प्लेटफार्म पर आयी, जिस पर वो लोग खड़े थे, सौरभ उसमें जाकर बैठ गया, अब भी सौरभ बुरी तरह घबरा रहा था, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, वह अपनी दिल की धड़कनों को नियंत्रित करने के लिए प्राणायाम करने लगा। सौरभ की लाइफ में ऐसे कई हादसें बहुत जल्दी-जल्दी हो चुके थे। 
     ट्रेन चल पड़ी, मन्दिर की घंटियों ने सौरभ की तंद्रा भंग कर दी, सौरभ अपने बैग में अपनी "गोमुखी और माला" देखने लगा। सोचने लगा पता नहीं कौन सी ‘‘शक्ति" या ‘‘दुआ" मेरी हिफाजत कर रही है, तभी उसे एक शायर साहब का 'शेर' याद आ गया-
न जाने कौन 'दुआओं' में याद रखता है,
मैं   डूबता    हूं   समुद्र   उछाल  देता  है।
      और सौरभ अपने मन को, माला के, मनकों के माध्यम से "मन्त्र" की अतल गहराईयों में उतारने का प्रयास करने लगा।
                              लेखक-संजय कुमार गर्ग (sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
(प्रस्तुत कहानी  
सत्य घटनाक्रम पर आधारित है। पात्रों के नाम,स्थान आदि सभी काल्पनिक हैं।)

एक 'लुटेरी' रात !! (रोमांच-कथा)

http://jyotesh.blogspot.in/2016/02/ek-luteri-raat-courageous-story.html

एक 'लुटेरी' रात !! (रोमांच-कथा)

रात काफी हो गयी थी, सौरभ के शहर को जाने वाली बसें बन्द हो गयी थी, रोडवेज अड्डे पर लम्बे-मार्ग (लांग रूट) की एकमात्र बस थी, सौरभ चालक-परिचालक से काफी निवेदन करके उस बस में बैठ पाया था, वो भी इस शर्त पर कि बाई-पास पर ही उतार दिया जायेगा। सौरभ टिकट लेकर सीट पर जा बैठा और अपना बैग नीचे रख दिया। वह पूस की एक सर्द रात थी। कुछ ही देर में गाड़ी रवाना हो गयी। दिन भर की भागदौड़ से थके सौरभ की आंखे लग गई। 

अचानक सौरभ को किसी ने तेजी से झिझोड़ा। वह एकदम चैंक कर उठा, ‘‘क्या मेरा शहर आ गया? (सौरभ ने सोचा कि परिचालक ने उसे शहर आने पर उठाया है) पर तुम बोल कैसेऽऽऽऽऽऽ‘‘ उसके शब्द गले में ही अटक कर रह गये, उसने देखा कि एक आदमी उसके सिर पर तमंचा लिये खड़ा था। ‘‘निकाल तेरे पास क्या है ?‘ सौरभ ने उसे अपनी जेब से पैसे निकाल कर दे दिये, सौरभ की घड़ी भी उसने ले ली।

कुल मिलाकर वो 5 लुटेरे थे। सबके मुंह पर कपड़े बन्धे थे उनमें से एक ड्राइवर के पास पिस्तौल लिए खड़ा था। बाकि सब यात्रियों से रूपये, पैसे, कीमती सामान छीनकर एक गन्दे से थैले में भरते जा रहे थे। जो भी आनाकानी करता उस पर फौरन हमला कर देते, एक आदमी ने हिम्मत दिखाई तो उस पर भी हमला करके उसे घायल कर दिया। कुल मिलाकर बस का वातावरण भयावह हो गया था। बस के बाहर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था, ऐसा लगता था कि बस किसी जंगल में खड़ी थी। सौरभ को भरी सर्दी में पसीना आने लगा।

सुरक्षा की दृष्टि से सौरभ ने अपना मोबाइल पहले ही बैग में रख दिया था, चूंकि उसमें किताबें इत्यादि ज्यादा थी, इसलिए फोन पर उनकी निगाह नहीं पड़ी थी। 

अचानक सौरभ के फोन की घंटी बज उठी, जो पूरी बस में गूंज गयी, एक बदमाश उसकी ओर बढ़ा, और उसके बैग से फोन निकाल लिया, सौरभ ने उसके हाथ से फोन ले लिया, और उस लुटेरे से कहा- मुझे इसमें से सिम निकाल लेने दो, परन्तु वो उसे समय देने के लिए तैयार नहीं था, उसने तमंचा सौरभ के सिर पर दे मारा।

इस छिना-झपटी में एक ओर बदमाश उसकी तरफ बड़ा, सौरभ ने मोबाइल हाथ से छोड़ दिया,
दूसरा बदमाश अचानक बोला ‘‘गुरूजीन (गुरू जी का) फोन उल्टा दे दे, -तिल्ली।‘‘
पहले बदमाश ने उसे घूरते हुए सौरभ को मोबाइल वापस दे दिया-सौरभ आश्चर्यचकित था।
दरअसल सौरभ एक विद्यालय में शिक्षक था जिसमें आसपास के गांवों के काफी बच्चे पड़ते थे और वह विद्यालय उसी क्षेत्र के आसपास था जहां से होकर उस बस को जाना था।

अपने सूजे हुये सिर पर हाथ रखे, सौरभ फोन लेकर सीट पर बैठ गया, अचानक उसके मस्तिष्क में कुछ कौंधा और वह सीट से उछल कर खड़ा हो गया। सौरभ ने उनसे कहा भाई! मेरा फोन भी ले जाओ, तुम पता नहीं कौन हो जो मुझे ‘गुरू जी‘ कह रहे हो, मैं तुम्हे नहीं जानता? यदि आप को वापस ही करना है तो सबका सामान वापस करो, नहीं तो आप मेरा फोन भी ले जाओ, यदि आपने ऐसा नहीं किया तोे सब यात्री मुझे आपका साथी समझेगेें, और मेरी खैर नही। सौरभ एक सांस में घबराता हुआ बोलता चला गया।

‘‘यदि आाप नहीं माने तो मैं भी आपके साथ इसी जंगल में उतर जाऊंगा, यात्रियों और पुलिस से पीटने से तो यही बेहतर है।‘‘ सौरभ ने घबराहट से आ रहे पसीने पौंछते हुये उनसे कहा।

डकैतों ने कुछ देर आपस में बातें की, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे, अचानक उनमें झगड़ा प्रारम्भ हो गया और आपस में पिस्तौले तन गयी, सभी यात्री घबरा गये, तभी उनमें से एक ने जो उनका ‘‘सरदार‘‘ लगता था उनका बीच-बचाव करवाया, उन्हे शान्त किया और सौरभ से बोला-

‘‘मास्दर जी तमने म्हारे गरोह में फूट डाल दी है, म्हारे दो आदमी चाहै हैं कि समान उल्टा दे दे और दो मना करें हैं, अब या समान देना ह या लेना, या मेरे ऊपर ह। या के लये तमे मेरे एक प्रसन का जवाब देना पडेगा, का तम राजी हो।‘‘

भाई साहब! तुम ‘‘यक्ष‘‘ हो सकते हो पर मैं ‘‘युद्धिष्ठर‘‘ नहीं हूंँ-सौरभ ने धीरे से कहा! 
परन्तु यदि आपके प्रश्न का उत्तर देने से यात्रियों का समान बच सकता है तो मैं आपके प्रश्नों का उत्तर देने के लिये तैयार हूंँ-सौरभ ने डरते-डरते धीरे से कहा!

सरदार, गब्बर सिंह की तरह जोर से हंसा और बोला-‘‘तम तो घबरारिये हो मास्दर जी‘‘ मैं तो उस मास्दर की समझ देखनीं चाहूं हूं जा ने म्हारे गरोह मा फूट डाली ह‘‘
‘‘ठीक है भाई साहब! पूछो‘‘ सौरभ की हिम्मत बढ़ सी गयी थी।
‘‘मास्दर जी! हम का बस या बता दो कि या गाड़ी का मुंह किस दिशा में कू है। कोनो मशीन का परयोग नहीं करना है।‘‘ 

यह कहते हुए उसने अपनी जेब से शराब की एक थैली निकाली और मुंह की तरफ से थोड़ा सा ‘ढ़ाटा‘ (चेहरे पर ढका कपड़ा) हटाया और थैली को आम की तरह चूस कर, गाड़ी के बोनट पर बैठ गया। 

सौरभ ने कहा ठीक है, खिड़की खोलो, मुझे आसमान की ओर देखने दो, मैं अभी बता देता हूंँ।
वा कैसे? सरदार बोला!
लेखक-संजय कुमार गर्ग (sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)

सप्तऋषि मंडल (सात तारों का समूह) हमेशा उत्तर दिशा की ओर इंगित करता है। दूसरा इस समय आकाश में ‘शतभिषा नक्षत्र’ भी दिखाई दे रहा होगा वह भी उत्तर दिशा को दर्शाता है, उन्हे देख कर मैं आसानी से आपको दिशा बता सकता हूंँ!-सौरभ ने आत्मविश्वास से कहा।

रूको!!!!! सरदार बोला, ‘‘आसमान की माई देखके त कोई भी दिशा का, टेम भी बता सकता ह।‘‘
‘‘तम मुझ आसमान में देखे बगैर, आसपास देख के दिशा बताओ।‘‘ मैं भी देखन चाहूं तम मास्दर हो या ऐसे ही काम चलाउ सरकार! और तम टेम की चिन्ता न करियों जहां या गाड़ी खड़ी ह, वहा से 10-10 कोस ते कोई आबादी ना ह, बस जंगल ह-कहते हुये सरदार ने एक बीड़ी सुलगाई और बस के बोनट पर पलोथी लगा कर बैठ गया।

सौरभ ने थोड़ा सोचा, सभी यात्री उसकी ओर आशा की दृष्टि से देख रहे थे।
ठीक है! आप मुझे अपनी टार्च दीजिये और मुझे बाहर देखने दें-सौरभ ने हिम्मत करते हुये उनसे कहा।
सौरभ ने ड्राईवर को सीट से हटाकर उसकी खिड़की खोल दी, पके हुये अमरूदों की खुशबू गाड़ी में भर गयी वह एक अमरूद का बाग था, जहां गाड़ी खड़ी थी। सौरभ ने टार्च मारकर अमरूदों का निरीक्षण किया, वह कुछ आश्वस्त था, फिर उसने बाग के अन्दर टार्च मारी, शक्तिशाली टार्च की रोशनी से सारे बाग में प्रकाश फैल गया। सामने एक मजार थी, मजार का मिनट भर निरीक्षण कर सौरभ पूरी तरह आश्वस्त हो गया था, उसने खिड़की बन्द कर दी और सरदार से बोला-

भाई जी! गाड़ी का मुंह पश्चिम दिशा में है और पीठ पूर्व में!
सरदार का चेहरा खिल गया और बोला- 
अब या बताओ तम ने कैसे पता करा या तम तुक्का लगा रिये हो।

सौरभ ने बताया-सबसे पहले मैंने अमरूदों का निरीक्षण किया, फल सबसे पहले व सबसे ज्यादा पूर्व दिशा की ओर से पकता है, अतः अमरूद को देखकर मैं थोड़ा आश्वस्त था, परन्तु मजार को देखकर मैं पूरी तरह आश्वस्त हो गया क्योंकि मजार का सिर हमेशा उत्तर दिशा में और पैर दक्षिण दिशा में होते हैं।

मास्दर जी तम वास्तव में गुरू हो, हम अपनी लूट छोड़ते हैं और तमे सलाम करते हैं-सरदार ने खुश होकर कहा, फिर अपने साथियों को इशारा किया और वे लूट का माल बस में छोड़कर जंगल में गायब हो गये। 
सौरभ जल्दी-जल्दी ड्राइवर को बस का रास्ता समझाने लगा, यात्रियों ने उसे प्रसन्नता से गोदी में उठा लिया।

                        लेखक-संजय कुमार गर्ग (sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
(प्रस्तुत कहानी काल्पनिक घटनाक्रम पर आधारित है। पात्रों के नाम,स्थान आदि सभी काल्पनिक हैं।)

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वह उसकी बेटी ही थी!
थप्पड़ की आवाज से सारा घर गूंज उठा, नीलेश ने अपनी बेटी के कई थप्पड़ जड़ दिये।
कुछ करती-धरती नहीं है, बस हमेशा खाने के पीछे पड़ी रहती है, पढ़ाई में जीरो-काम में जीरो-बस खाने में सबसे आगे...नीलेश अपनी बेटी को डांटे जा रहा था, बेटी रो रही थी। नीलेश की पत्नि भी अपने पति का ही साथ दे रही थी।
नीलेश की दो बेटियों में उसकी छोटी बेटी कुछ सीधी थी या कहो प्रीमैच्योर थी, 13 साल की होने के बाद भी उसका मन 7-8 साल के बच्चों जैसा था, जबकि शारीरिक विकास सामान्य था, पढ़ाई में भी ज्यादा अच्छी नहीं थी। उसके कारण पति-पत्नि दोनों चितिंत रहते थे। आध्यात्मिक प्रवृत्ति का निलेश वैसे अपनी दोनो बेटियों को बहुत प्यार करता था, परन्तु कभी-कभी गुस्से में आपा खो देता था। आफिस से आते ही पत्नि द्वारा छोेटी बेटी की शिकायत करने पर वह गुस्से से पागल हो गया था।
 
तुमने ये चाकलेट बिना पूछे क्यों खायी? जवाब दो? अब आगे से ऐसा करोगी। बेटी रो रही थी, परन्तु पीटने के बाद भी ढीट बनी कोई उत्तर नहीं दे रही थी। इससे नीलेश और ज्यादा आगबबूला हो गया और खड़ी हुई बेटी को पीछे की ओर धक्का दे दिया, पीछे पड़े हुये डबल बैड से उसका सर टकरा गया और बेटी चीख कर बेहोश हो गयी। नीलेश का सारा गुस्सा हवा हो गया, जल्दी से डाक्टर के पास बच्ची को ले जाया गया, परन्तु ब्रेन हैमरेज हो जाने के कारण बच्ची ना बच सकी। घर वालों ने जल्दी-जल्दी बच्ची का अन्तिम संस्कार कर दिया, परन्तु नीलेश डिप्रेशन में चला गया, उसे अपनी छोटी बेटी को खोने का गहरा सदमा लगा, अनेक डाक्टरों व साइक्लोजिस्ट से उसका महिनों इलाज चला, कहा भी जाता है, वक्त का मरहम बड़े से बड़े जख्म को भर देता है, व 10-11 महीनों में सामान्य हो गया।
 
वह अपनी बेटी के मरने के बाद 10-11 महीनों के बाद आज रात्रि में अपने अध्ययन कक्ष में गया था। कमरे का ताला खोलकर, कमरे की थोड़ी सफाई की और एक किताब लेकर पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते उसे रात्रि का एक बज गया था। अचानक हवा का एक हल्का झौंका उसके शरीर से टकराया, पहले तो उसने ध्यान नहीं दिया परन्तु जब बार-बार एक ठंडी हवा का झौंका उसके शरीर से टकराने लगा तो उसने अपने कमरे की खिडकियों व दरवाजे की ओर देखा वे सब बन्द थे, पंखा भी नहीं चल रहा था, उसका ध्यान भंग हो गया, तभी उसे लगा कि कोई उसे पुकार रहा है-
पापाऽऽऽऽऽऽ पापाऽऽऽऽऽ।
 
नीलेश बुरी तरह घबरा गया और उसने उठने का प्रयास किया।
पापाऽऽ प्लीज डरनाऽऽऽ मत, जाना.... मत मैं आपकी ही बेटी हूं! नीलेश को केवल आवाजें आ रही थी, उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, वह आवाज को पहचान गया, ये उसकी मृत बेटी की आवाज थी।
पापाऽऽऽ ये आपने मुझे किस दुनिया में भेज दिया, मैं ना तो जिन्दा हूं ना मर ही पायी हूं। किसी से बोलने की कोशिश करती हूं तो वो सुन नहीं पाता, छूती हूं तो हाथ से निकल जाता है, हवा में उड़़ती रहती हूं, खाने की सारी चीजें मेरे सामने होती हैं परन्तु खा नहीं पाती, केवल उनकी खूशबू आती रहती है।
पिता का डर समाप्त हो गया और उसकी आंखों में आंसू आँसू आ गये।
 
पापाऽऽऽऽ आप तो कहते थे ”every girl’s may not be queen to her husband, but she is always princess to her father!”
पापाऽऽऽ आपने अपनी राजकुमारी को ये कहा भेज दिया?
पिता की सुबकियां बंध गयी, वह गिरने ही वाला था कि उसने कुर्सी को पकड़ लिया और बोला, बेटी! मैं तेरा गुनाहगार हूं..., तू.....मुझे माफ कर दे। 
पापाऽऽ एक रात मैंने मम्मी से बोलने का प्रयास किया तो वो मुझे देख कर डर गयी थी, और आपने यज्ञ-हवन करा कर मुझे मेरे घर से ही बाहर कर दिया? प्लीज पापाsss अब मैं इस तीसरी मंजिल पर आपके स्टडी रूम में रहती हूं, प्लीज!!! मुझे यहां से बाहर मत निकालना? मैं आपकी कोई चीज नहीं छेडूंगी, पक्काss प्रामिश! पापाऽऽ!!!!
 
नहीं...नहीं....मेरी बेटी! मैं अपने किये पर बहुत शर्मिदा हूं, उसने हवा में अपने हाथों को बांध कर अपनी बेटी को अपनी छाती से लगाने का असफल प्रयास करते हुये कहा! पिता की आंखों से आंसू नहीं रूक रहे थे।
तुम्हे मुझसे कोई अलग नहीं करेगा!! तुम इसी कमरे में रहो-पिता अपने आप को बहुत मुश्किल से संभाले कुर्सी पर बैठा रोये जा रहा था।
लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
 
पापाऽऽ प्लीज...... आप रोइये मत! मुझे बहुत दुःख हो रहा है, मैं आपके आंसू भी नहीं पौंछ सकती? एक ठन्डी हवा का झौंका पिता के चेहरे से टकराया।
पापा!!! मुझे आपके मोबाइल पर गाने सुनने और चाकलेट खाने का बहुत मन कर रहा है, प्लीजऽऽ डांटना मत!
परन्तु मेरी बच्ची!! तुम चाकलेट कैसे खाओगी? पिता ने रोते हुये कहा?
अचानक नीलेश के मस्तिष्क में कुछ आया, वह भागकर नीचे की मंजिल पर गया और छोटा सा हवन कुंड व चाकलेट और टांफिया ले आया। उसने टांफिया-चाकलेट इकट्ठा कर के उनमें आग लगा दी और बोला बेटी तुम खा तो नहीं सकती, परन्तु इनके जलने से आने वाली खुशबू तुम्हारी कुछ तृप्ति तो कर ही सकती है-पिता ने सुबकते हुये अपने आंसुओं को पौंछते हुये कहा।
 
बेटी!! मैं तुम्हारी आत्मा की शांति के लिये व तुम्हें अपने घर में वापस बुलाने के लिये चन्द्रायण व्रत व मां गायत्री का महापुश्चरण करूंगा, और ईश्वर से अपने पापकृत्य की क्षमा मांगते हुये प्रार्थना करूंगा, कि तुम्हे पुनः मेरे घर में मेरी बेटी बनाकर भेजें! 
 
नीलेश ने मोबाइल पर गाना चलाकर उसे मेज पर रख दिया और अपने अध्ययन कक्ष से रोते व लड़खड़ाते हुये नीचे चला गया।
टांफिया-चाकलेट की खुश्बू से पूरा स्टडी रूम महक रहा था, मन्दी-मन्दी आवाज में गाने चल रहे थे और आराम कुर्सी धीरे-धीरे अपने आप हिल रही थी, नीलेश की राजकुमारी उस पर आराम जो कर रही थी!

(प्रस्तुत कथा काल्पनिक घटनाक्रम पर आधारित है, मृतका से बातचीत व उसके अनुभव प्लेन चिट के विशेषज्ञों, परामनौवेज्ञानिकों व गरूण पुराण के दृष्टातों पर आधारित हैं , कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय अमेरिका की साइकिकल रिसर्च फाउडेशन के शोधों व प्रसिद्ध पश्चिमी पामिस्ट कीरो के अनुभवों को भी इसमें शामिल किया गया है) 
 
प्रस्तुति: संजय कुमार गर्ग, लेखक, वास्तुविद्, एस्ट्रोलाॅजर 8791820546 Whats-app
sanjay.garg2008@gmail.com  (All rights reserved.)
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बलवान बनो!! (लघु कथा)

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बलवान बनो! लघु कथा
'भावना' 'कुतर्क' के सामने हार गईं थी, क्योंकि वो अपनी ‘ईश्वर' रूपी ‘भावना' को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पायीं थीं। 'कुतर्क' जोर-जोर से अटठ्हास कर रहे थे।
कहां है तुम्हारा "ईश्वर" बुलाओ? नही तो शर्त के अनुसार अपनी चोटी-जनेऊ काट डालो!
ये 'कलिकाल' का शास्तार्थ था। पूरा सभागार ठहाकों से गूंज रहा था।
दिन छिपने लगा, मंदिरों की घंटियां बजने लगी, 'भावना' पूजा को उद्यत होने लगीं, वही सभागार में मदिरा के भरे गिलास आपस में टकराने लगे।
असुरी, सुरा, 'कुतर्क' के सर चढ़कर बोलने लगी। चोटी-जनेऊ से खेला जाने लगा। आज द्रोपदी रूपी 'भावना' की इज्जत बचाने भगवान आएंगें?
कहां है तुम्हारा "कृष्ण" !! हां हां!! बुलाओ?
ईश्वर के ध्यान में लीन, 'भावना' रूपी ‘विद्धानों‘ की आंखों से आंसू बह रहे थे!!
तभी अचानक पांच भीमकाय पहलवान सभागार में प्रवेश करते हैं, और मामला समझते ही चिल्लाते हैं-"इस कलयुग में भगवान नहीं आते, बन्दे आते हैं!" दुष्टों!! और कहकर एक 'कुतर्क' के मुंह पर मुक्का जड़ देते हैं, अन्य 'कुतर्क' भागने लगते हैं, उन पर भी मुक्कों की बरसात होने लगती है!
कौन है? माई का लालऽऽऽ? जो इन विद्धानों की चोटी-जनेऊ काटने की शक्ति रखता हो? पूरा सभागार उनकी आवाज से थर्रा उठा। सभागार में भगदड़ मच गई। उनका सामना करने के लिए कोई 'कुतर्क' तैयार नहीं था।
'पांचों' उन 'विद्वानों' को सभागार से लेकर बाहर की ओर चल दिये।
वेदों में कहा गया है-‘‘बलंवाव भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवाना कम्पयते‘‘ अर्थात बलशाली बनो, एक बलशाली सौ विद्धानों को कंपा देता है! 
 -लेखक-संजय कुमार गर्ग
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वह मेेरी "पत्नि" तो नहीं थी!! (रहस्य-कथा)
"रावण" ने मरने से इनकार कर दिया !
वह उसकी बेटी ही थी! (रहस्य कथा)
एक 'लुटेरी' रात !! (रोमांच-कथा)
एक मंकी मैन से मुकाबला?
आओ!! पढ़ें अफवाहें कैसी-कैसी!!!
ऊबकाई (लघु कथा)
प्यार में हम जो-जो आगे बढ़ते......(लघु कथा)
बलवान बनो!! (लघु कथा)

जातस्य हि ध्रुवों मृत्युध्र्रुवं..........("परकाया-प्रवेश" रहस्य कथा)

जातस्य हि ध्रुवों..
जातस्य हि ध्रुवों..
पिकनिक मनाने आये कुछ छात्र नदी के बहाव में बह गये थे।  उनमें से कुछ छात्रों के शव मिल गये थे, बाकि छात्रों की खोज चल रही थी। किसी के जीवित रहने की संभावना न्यून थी। शवों को खोेजने के लिए अनेक टीमें लगायी गयी थीं। नदी का जल रोक दिया गया था ताकि शवों को खोजने में परेशानी न हो। खोजते हुए एक टीम ऐसे स्थान पर पहुंची, जहां नदी घने जंगलों के बीच से जा रही थी। जेठ की तेज धूप में ‘दौड़-धूप‘ करती टीम जंगल में कुछ देर विश्राम के लिए चली गई। तभी उन्होेंने देखा एक युवक पेड़ों की छाॅव में, एक चट्टान पर ध्यानमग्न है। जिज्ञासावश पास जाकर देखा, तो वो युवक लापता छात्रों में से एक था, जो इस समय केवल लंगोटी बांँधे हुए ध्यानावस्थित था।
अरे ये तो ‘सौरभ‘ नाम का छात्र है!-टीम का मुखिया, बहुत सारे फोटो में से एक फोटो से उसका चेहरा मिलाते हुआ बोला।
लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
सभी तेजी से उसके पास पहुँंचे, और उसे झिझोड़ते हुए बोले, सौरभ! तुम जीवित हो? तुम यहां क्या कर रहे हो?
मैं सौरभ नहीं हूँ! ‘छात्र‘ ने अपनी आंखें खोलते हुए कहा।
आप यहां से जाइये, ये जंगल है, यहां जंगली जानवर हैं! छात्र ने कहा, और आंखें मूंदकर पुनः ध्यानमग्न हो गया।
खोजी टीम ने तुरन्त इसकी सूचना अपने वायरलैस से कंट्रोल रूम को दी। जहां पर अनेक छात्रों के परिजनों के साथ सौरभ के परिजन भी किसी बुरे/अच्छे समाचार की प्रतीक्षा में थे।
कुछ ही घंटों में सौरभ के माता-पिता व डाक्टरों की टीम वहां पहुंच गई।
सौरभ की माता ‘छात्र‘ को देखते ही उससे चिपटकर जोर-जोर से रोने लगी।
बेटा! सोनू! तुम ठीक हो ना? ये क्या भेष बना लिया है, तुमने?
मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूँ! युवक ने अपनी आंँखें खोलते हुए कहा!
तुम्हारी आवाज को क्या हो गया है सोनू? ये कैसे बदल गई? पापा! आपको नहीं डाटेगें, आप हमारे साथ चलो! मम्मी ने ‘‘सौरभ‘‘ के चेहरे पर प्यार से हाथ फिराते हुए कहा।
हांss बेटा!! इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी, ये एक दुर्घटना मात्र थी! पिता ने अपने आँंसू पूछते हुए कहा!
परन्तु माता! मैं तुम्हारा पुत्र नहीं हूंँ, तुम्हारा पुत्र तो मर चुका है! मैं तो एक ‘योगी‘ हूँ, मैंने तुम्हारे मृत-पु़त्र के शरीर में ‘परकाया प्रवेश‘ द्वारा अपनी ‘आत्मा‘ का प्रवेश करा दिया है! युवक ने गंभीर स्वर में कहा।
वहां उपस्थित सभी के चेहरे पर अविश्वास के भाव थे, सौरभ की माता उसे चिपट कर जोर-जोर से विलाप करने लगी।
नहींऽऽ बेटा! सोनू! ऐसा मत कहो! तुम हमारे साथ चलो, सब ठीक हो जायेगा! मां ने सिसकते हुए उससे कहा!
माता! मेरा विश्वास करो! मैं एक योगी हूँ, मेरी आयु सौ वर्ष से भी ज्यादा है, मेरा शरीर 'कृशकाय' हो चुका था, मैं काफी दिनों से एक युवा मृत शरीर की तलाश में था। कल मुझे नदी में बहते हुए तीन मृत शरीर मिले, दो शव काफी क्षत-विक्षत हो चुके थे, केवल इसी युवक का शरीर अच्छी स्थिति में था। अतः इस युवक के शरीर में मैंने योग क्रिया द्वारा अपनी आत्मा का प्रवेश करा दिया, और अपने 'कृशकाय' शरीर का अपने हाथों से ही अंतिम संस्कार कर दिया। ‘योगी-युवक‘ ने कुछ दूरी पर उठते हुये धुएं की ओर संकेत करते हुए कहा।
नहीं!! तुम मेरे सोनू ही हो! सौरभ की माता उससे चिपटते हुए, रोती हुई बोली।
दो शव कहां है? सौरभ के दादा जी ने उस ‘योगी-युवक‘ से पूछा।
वो मेरी कुटिया के पीछे रखे हैं, अभी मैंने उनका दाहसंस्कार नहीं किया है! ‘योगी-युवक‘ ने उत्तर दिया।
टीम तेजी से वहां पहुंची, देखा वास्तव में दो युवकों के शव, वहां घास से ढके रखे है, वे नदी में बहने वाले छात्रों के ही थे।
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हम कैसे विश्वास करें, आप जो कह रहे, वो सच है? सौरभ के दादा जी ने विनम्र स्वर में कहा।
क्या आप हमें उन दो मृत शरीरों में से किसी एक शरीर में अपनी आत्मा का प्रवेश करा कर दिखा सकते हैं? दादा जी गंभीर स्वर में बोले।
पुत्र! वो शरीर काफी क्षतिग्रस्त हैं, उसमें मेरी आत्मा ज्यादा समय तक नहीं रह सकती, तुम्हें विश्वास दिलाने के लिए मैं ये भी करने के लिए तैयार हूंँ। ‘योगी-युवक‘ ने कहा।
‘योगी-युवक‘ ने गहरीे सांस खींची व अपने आँंखे मूंद ली। उसका शरीर निढाल होकर पत्थर पर लुढक गया, डाक्टर ने उसके शरीर का निरीक्षण किया। 
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अरे!! शरीर की धड़कने तो बन्द हो गयी हैं, शरीर की गरमाई भी समाप्त हो गयी है, मैं दावे से कह सकता हूँ कि ये अब जीवित नहीं है! डाक्टर ने अपना स्टेथोस्कोप कान से निकालते हुए कहा। सौरभ की माता शव से चिपटकर जोर-जोर से रोने लगी। सभी शव के चारों ओर खड़े थे।
पुत्र!!! देखो? एक परिचित सी तेज आवाज उनके पीछे से आयी।
पीछे देखते ही उनकी चीखें निकल गई, दो मैं से एक क्षत-विक्षत शव खड़ा था!
अब तो विश्वास है पुत्र! ‘योगी‘ की आवाज अब उस शव में से आ रही थी। यह कहकर वह शव जमीन पर लुढ़क गया। सभी आश्चर्य से उसे देख रहे थे।
सौरभ के शरीर में चेतना लौटने लगी, शरीर धड़कने लगा। शरीर पर हाथ रखे बैठा डाक्टर डर कर उछल पड़ा। 
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हे! मेरे ईश्वर! ये सब क्या है!! डाक्टर घबराकर पीछे हटता हुआ बोला।
निढाल पड़े सौरभ के शरीर में पुनः चेतना लौट आयी और वो इस प्रकार उठ कर बैठ गया, मानो किसी नींद से जागा हो।
बेटा!! तुम योगी हो या कुछ और तुम मेरे पुत्र सौरभ ही हो। तुम्हे हमारे साथ चलना ही होगा! सौरभ की मां ने सुबकते हुए, ‘योगी‘ का हाथ पकड कर खींचते हुए कहा।
मां! पिछले सौ वर्षो से दुर्गम स्थान व बियावान जंगल मेरी शरणस्थली रहे हैं, अपने माता-पिता, भाई-बन्धुओं को भी मैंने सौ वर्ष पहले त्याग दिया था, अब तो सारा संसार ही मेरा परिवार है। मां! मैं तेरे साथ कैसे जा सकता हूंँ? योगी कुछ देर शान्त रहे फिर बोले-परन्तु मां! मैं तेरा ऋणी हूँ, क्योंकि तेरे द्वारा प्रसूत व पोषित शरीर में मेरी आत्मा स्थिति है, अतः आज से तू मेरी माता हुई! यह कहकर योगी ने सौरभ के माता-पिता के सामने साष्टांग प्रणाम किया। सुबकते हुए माता-पिता के चरणों में ही योगी कुछ देर शान्त बैठे रहे, और फिर बोले!
मां!! मैं तुझे आज दो वचन देता हूंँ, पहला ये-जब भी और जहां भी, तू अपने पुत्र को याद करेगी, मैं सशरीर तेरे सामने उपस्थित हो जाऊंगा। दूसरा ये है कि तेरा मृत पुत्र ‘सौरभ‘ तेरा ‘नाती‘ बनकर, तेरी पुत्री के गर्भ से इस संसार में पुनः जन्म लेगा-‘योगी‘ के चेहरे पर गंभीर भाव थे। सभी की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।
अंधेरा होने वाला है, अब आप इस जंगल से जाइये! कहकर ‘योगी‘ पुनः उसी चट्टान पर बैठकर ध्यान मग्न हो गये।
खोजी दल ने दोनों शवों को स्ट्रेचर पर लाद लिया। सौरभ के पिता और दादा, सौरभ की माता को वहां से ले जाने लगे।
‘योगी‘ के मुख से, ‘अस्फुट‘ स्वर में ‘‘श्रीमद्भागवत‘‘ का श्लोक ‘प्रस्फुटित‘ होने लगा-
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्माद् परिहार्येऽर्थे न त्वं शोचि तुमर्हसि।।
अर्थात जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के पश्चात पुर्नजन्म भी निश्चित है। अतः अपने अपरिहार्य कर्त्तव्य पालन में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
 (कहानी के पात्र, स्थान, घटनाक्रम आदि काल्पनिक हैं)
   लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)

ऊबकाई (लघु कथा)


ऊबकाई
ऊबकाई
हाँ! जी खाना लग गया है! आ जाईये! रोहित की पत्नि ने रोहित को आवाज लगाई!
रोहित आकर खाना खाने लगा।
तभी उसके दो साल के बेटे ने पोट्टी (लेट्रीन) कर ली। रोहित को पता चलते ही ऊबकाई आने लगी और वह ऊबकाई लेता हुआ तेजी से वाॅशवेसन की ओर दौड़ पड़ा।

लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
 रोहित की यह एक ‘‘मनोवैज्ञानिक‘‘ समस्या थी, उसके खाते समय यदि कोई अभक्ष्य या गन्दगी की बात भी करता तो उसे ऊबकाई आने लगती थी और उल्टी हो जाती थी। रोहित और उसके परिवार वाले इस बात से बहुत परेशान थे। काफी इलाज कराने के बाद भी उसे लाभ नहीं हो पा रहा था।
रोहित किसी आवश्यक कार्य से शहर से बाहर गया हुआ था, वापस लौटते समय वह लघु शंका के लिए एक सुलभ शौचालय में गया। निवृत्त होकर जैसे ही वह वापस लौट रहा था, तभी उसे आवाज आयी।
‘‘एक रोटी और लीजिए?‘‘ उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा, भोजन, वो भी शौचालय में?

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 वह आवाज की दिशा में गया तो उसने देखा, शौचालय के अन्दर ही एक ओर मेहतरानी खाना बना रही थी और मेहतर खाना खा रहा था। उसका मुंँह आश्चर्य से खुला रह गया।
वह सोचते-सोचते बस में आकर बैठ गया। अब रोहित समझ गया था, उसकी ‘‘ऊबकाई‘‘ एक मानसिक समस्या है, मन को सकारात्मक सुझाव देकर इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास की चमक थी, उस दिन से उसकी वह ‘‘मनोवैज्ञानिक‘‘ समस्या धीरे-धीरे दूर होने लगी थी।

लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
(कहानी के पात्र, स्थान, घटनाक्रम आदि काल्पनिक हैं)

प्यार में हम जो-जो आगे बढ़ते......(लघु कथा)



वैवाहिक जीवन का पहला पड़ाव- नयी-नयी शादी हुर्इ है, "पतिदेव" प्रात: सेविंग कर रहे हैं तभी उनको ब्लैड लग जाता है।
आहs की हल्की आवाज उनके मुंह से निकली, पत्नी किचिन से भागी हुर्इ आयी!

'डार्लिंग' ब्लैड लग गया! पति ने पत्नी से 'नार्मल' होते हुए कहा!
(पत्नी जल्दी से 'डिटाल' लाती है।)

लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
अरे! कितना सारा ब्लड निकल गया, आज आप आफिस मत जाइये, घर पर ही रेस्ट कीजिए! पत्नी दुःखी स्वर में 'डिटाल' लगाती हुर्इ बोली!
वैवाहिक जीवन का दूसरा पड़ाव- अब बच्चे हो जाते हैं, "पति महोदय" रोज की तरह सेविंग कर रहे है, उनको ब्लैड लग जाता है।
उफ!! नीरूsss ब्लैड लग गया, 'पति महोदय' होने वाले 'दर्द' से भी 'तेज' चिल्लाये।
आप! भी ना, इतने साल आपको सेविंग करते हुए हो गये, परन्तु अभी तक आपको सेविंग करनी नहीं आयी, ये लो 'फिटकरी' लगा लो, मैं आपका और बच्चों का लन्च तैयार कर रहीं हूँ। पत्नी झल्लाती हुर्इ 'फिटकरी' पटकते हुए वहां से चली गयी।

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वैवाहिक जीवन का तीसरा पड़ाव- बच्चों का विवाह हो चुका है। "पति जी" सेविंग कर रहे हैं और उनको ब्लैड लग जाता है!
हायsssss मर गया! अरे 'रितिक' की 'अम्मा' कहां है 'तू'?
''क्यों चिल्ला रहे हो, इतना गला फाड कर, ब्लैड ही लगा है, कोर्इ तलवार तो नहीं लगी? कितनी बार कहां है, अब अपने आप 'दाड़ी' मत बनाया करो, नार्इ से बनवा लिया करो, पर तुम्हे तो जवान बनने की लगी है ना!'' वृद्ध पत्नी बिस्तर में लेटे-लेटे चिल्लार्इ।
अलमारी में 'डिटाल' या 'फिटकरी' रखी होगी लगा लो!
ये कहकर पत्नी ने चादर मुंह तक तान ली!
किसी ने ठीक कहा है-
प्यार में  हम जो-जो आगे बढ़ते गये,
'आप' से 'तुम' तुम से 'तू'  होते गए!
लेखक-संजय कुमार गर्ग  sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)

भूत?होते हैं! मैने देखें हैं! क्या आप भी.........? (संस्मरण कथा)

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भूत?होते हैं
 बात काफी पुरानी है, जून का महीना चल रहा था, विधालय बन्द हो गये थे। मैं अपने छोटे से विधालय में कुछ कन्स्ट्रक्शन करा रहा था। दोपहर 1 बजे के करीब सभी लंच के लिए चले जाते थे। मैं भी दोपहर को थोड़ी देर के लिए आराम कर लेता था। इस दिन मैं सो के उठा, आफिस से बाहर आया, सोचा पेन्टरों को देख लूं क्या कर रहे हैं। मैंने देखा स्कूल की ''आया'' बढई के सामान में कुछ ढूंढ़ रही हैं। ''मैंने उससे पूछा- अम्मा! तुम यहां क्या रही हो?, मेरी चाय बना दो!'' मैं यह कहकर गैलरी कर तरफ चला गया, जहां पेन्टर काम कर रहे थे। वहां पहुंचा तो देख कर एकदम चौंक गया, देखा ''आया'' तो यहां बैठी है। मैंने कहां अम्मा! तुम यहां बैठी हो तो फिर वहां कौSSSSSSSSSSSS है?
-लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)

      मैंने अपनी आवाज को दबा लिया, और जल्दी से भागकर वापस आया देखा, वहां पर कोई नहीं था।
      मैं आफिस में जाकर चुपचाप बैठ गया, मेरे दिमाग में स्कूल के चौकीदार और बच्चों की बातें गूंज उठी। चौकीदार ने मुझसे कई बार कहां था, कि रात को कोई मेरा दरवाजा बजाता है, कभी घुंघरू की आवाजें आती हैं, जब बाहर आता हूँ, तो कोई भी दिखाई नहीं देता। मैंने उसे डांट दिया था कि तुम शायद ड्रिंक करके डयूटी करते हो, तुम्हे इसलिए ऐसा लगता है! मैं तो कभी-कभी यहां देर रात तक काम करता हूँ, मुझे आवाजें क्यों नहीं आती! बच्चों व अध्यापिकाओं ने भी मुझसे कहा था, कि गैलरी में जहां बच्चों के टायलेट बने हैं। वहां पर कई बच्चों ने शिकायत की है कि वहां कभी-कभी दोपहर में एक ''बुढि़या'' दिखाई देती है। मैंने टीचर्स व बच्चों को भी बहुत डांटा था। कि तुम अपने 'वहम' की वजय से स्कूल को बदनाम कर रहे हों। परन्तु उस दिन, मेरे सामने वह ''बुढि़या'' प्रत्यक्ष हो गई थी मानों मुझे 'चैंलेज' कर गयी हो।
-लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)



      ऐसे ही वाकये मेरे साथ सिविल परीक्षा की तैयारी के समय घटे थे। रात को 12 ये 2 बजे के बीच में मुझे अपने एक 'मृतक मित्र' की आवाजें सुनायी देती थीं, जो करीब 10 साल पहले 'सुसाईड' कर गया था। वह अदृश्य रूप में मुझसे ऐसे बातें करता था, जैसे बिल्कुल मेरे सामने खड़ा हो, विशेष रूप से उस 'नाम' से पुकारता था, जिस नाम से 'वह' कभी मुझे जीवित अवस्था में पुकारता था। पाठकगण सोचेंगे-''शायद मैं उस समय, उस के बारे में सोच रहा होऊंगा'' पाठकगण सोचें रात में मैं 3-4 बजे तक पढ़ता था, क्या मैं उसके बारे में सोचने के लिए जागूंगा। जबकि 10 साल के लम्बे समय में व्यकित का चेहरा भी याद नहीं रहता, आवाज तो बहुत दूर की बात है। उसकी आवाज भी मैं तब पहचाना जब उसने मुझे अपना 'नाम' बताया। -लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.) 
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भूत?होते हैं
    पहले दिन तो मैं घबराकर अपने तीसरी मंजिल के स्टडी रूम से नीचे, अपने बेडरूम में आकर सो गया। परन्तु उसका रोज-रोज का नियम सा बन गया था, वह मुझे परेशान तो नहीं करता, केवल उन परिसिथतियों को बताने की कोशिश करता जिसमें उसने 'सुसाईड' किया था। मेरी पढ़ाई डिस्टर्ब होने लगी, अन्त में मैंने इस वजय का गहराई से अध्ययन करने की ठानी। मैंने ज्योतिष, वास्तु, मन्त्र विज्ञान, परामनोविज्ञान आदि की पुस्तकों को पलटा, तब मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा-


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भूत?होते हैं
''हम जितना स्थूल में देख रहे हैं, उससे लाखों-करोड़ों गुना सूक्ष्म में व्याप्त है। भूत-प्रेत होते हैं इसमें दो राय नहीं! क्योंकि ये सूक्ष्म शरीर धारी होते हैं, अत: उन्हें केवल सूक्ष्म आंखों से देखा व सूक्ष्म कानों से सुना जा सकता है। ध्यान-पूजा के समय, सोकर उठते समय, या एकाग्रता से कोई कार्य या अध्ययन करते समय, हमारी ''सूक्ष्म ज्ञानेनिद्रयां'' हमारी ''क्षमतानुसार'' जाग्रत हो जाती हैं, और उसी जाग्रति की अवस्था में, हम सूक्ष्म सत्ताओं को अनायास ही ''प्रत्यक्ष'' (देख लेना) कर जाते हैं। अचानक उन्हें देखकर घबराहट में, या ध्यान भंग होने पर वे हमें गायब दिखाई देती हैं। जबकि वे गायब नहीं होती, वरन हमारी सूक्ष्म ज्ञानेनिद्रयां अपना काम करना बन्द कर देती हैं।'' -लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)


      मेरा मानना है कि 'प्रेत योनि' में केवल उद्विग्न, विक्षुब्द, अशांत, कामनाग्रस्त, अतृप्त लोगों को ही प्रेत बनना पडता है, उपरोक्त प्रकृति के विपरित मनुष्यों को केवल जन्म-मरण की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
यदि इसे अंधविश्वास न बनाया जाये, तो भूत-प्रेतों का अस्तित्व यह साबित करता है कि, आत्मा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, एक अवस्था विशेष है, जो ''विशेष मानसिक सिथती'' के साथ मरने वाले और पुन: जन्म लेने के बीच की सिथती है। भूत-प्रेत के यथार्थ होते हुए भी यह तथ्य स्मरणीय है कि भूत-प्रेत के किस्से-कहानियों में लगभग तीन-चौथाई गप्प होती है।

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भूत?होते हैं
दूसरे शब्दों में, काल के अनंत प्रवाह में बह रही जीवन धारा का 'प्रेतयोनि' एक नया मोड मात्र है। भूत-प्रेतों से डरने वालों को मेरी सलाह है 'कि इनसे डरे नहीं, ये तो केवल भूत (past) होते हैं। इन्सान से बड़ा कोई भूत-शैतान नहीं होता। भूत तो स्वयं इन्सानों से डरते हैं, अन्यथा किसी की हत्या करने वाले इन्सान को, ये मरने वाला, भूत बनकर ही, मार डालता।

      भूत-प्रेत केवल कमजोर इच्छा शक्ति वाले, या इष्ट (ईश्वर) के प्रति अविश्वासी व्यक्तियों को ही डरा सकते हैं, इससे अधिक कर गुजरने वाली आत्माएं देव-स्तर की होती हैं और वे मनुष्यों का अधिकतर भला ही करता चाहती हैं। ये बातें मैं नहीं कह रहा मेरा तजुर्बा कह रहा है, क्योंकि जब मैं टेन्शन या कुछ परेशानी में होता हूँ तो ''श्मशान घाट'' में ही जाकर बैठता हूँ, क्योंकि वहां जाकर मुझे आत्मिक शान्ति प्राप्त होती है। वहां जलती चिताएं शरीर की नश्वरता का, व सूक्ष्म से आने वाली आवाजें व चीखें आत्मा की अमरता का, व कर्मफल की अटलता के सिद्धांत को प्रस्तुत करती प्रतीत होती हैं।
अन्त में एक शेर के साथ ब्लॉग समाप्त करता हूँ-
                                     ऐश की छाव हो या गम  की धूप,
                                     जिन्दगी  को  कही  पनाह  नहीं,
                                     एक   वीरान    राह  है     दुनिया
                                     जिसमें  कोई  कयामगाह*  नहीं।          
                                                 (कयामगाह-विश्रामग्रह)
-लेखक-संजय कुमार गर्ग sanjay.garg2008@gmail.com (All rights reserved.)
(चित्र गूगल-इमेज से साभार!)